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पाकिस्तान में मंदिर को लेकर तकरार

खबर है पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बनने वाले पहले भगवान श्री कृष्ण जी के मंदिर को कुछ मजहबी गुटों ने ढहा दिया। नवनिर्मित मंदिर की नींव को उखाड़ फेंका, कमाल देखिये भारत में हुए जरा से मामले पर एक साथ 50 ट्वीट ठोकने वाले इमरान खान ने इनके फतवों के आगे घुटने ठेक दिए है। जबकि इस मंदिर का निर्माण पाकिस्तान की कैपिटल डिवेलपमेंट अथॉरिटी कर रही थी। अब इमरान की सरकार कह रही है कि इस मामले पर इस्लामिक विद्वानों से सलाह ली जाएगी कि मंदिर बनाया जाये या नहीं और फिलहाल मंदिर के निर्माण पर रोक लगा दी गयी है।

यह कोई अवेध निर्माण नहीं था बल्कि खुद पाकिस्तान सरकार ने जमीन दी थी और निर्माण को मंजूरी भी। लेकिन अब वो भी मुल्लाओं से सलाह लेंगे और वो क्या सलाह देंगे इस पर दुनिया जानती है क्योंकि उनके फतवे को बड़े बड़े मुफ्तियों का समर्थन हासिल है। खुद मुफ्ती मुहम्मद जकारिया ने अपने फतवें में साफ लिखा है कि हम कुरान और सुन्नत के जरिए लोगों का मार्गदर्शन करने की कोशिश करते हैं। हम अपने मन से कुछ भी नहीं बोलते। मेरी समझ है कि एक इस्लामी मुल्क में नए मंदिर और या कोई अन्य धर्मस्थल बनाना गैर-इस्लामी है। तो मंदिर का सवाल ही पैदा नहीं होता है, अगर मंदिर बना शव कुत्तों के आगे डाल देंगे।

असल में ये पहली घटना नहीं है इससे पहले भी पाकिस्तान में हिन्दू मंदिरों और गुरुद्वारों को तोडा जाता रहा है, और जो ऐसा करता है उन्हें पाकिस्तान में सम्मान के साथ देखा जाता रहा है। भारत में भी 800 साल ये क्रम चलता रहा और मजहबी किताब के अनुसार वो लोग बराबर सम्मान पाते रहे।

अब पूरा मामला समझिये कि भारत में कैसे मस्जिदों की भरमार और पाकिस्तान में क्यों मंदिरों की दुर्दशा हुई कि आज एक मंदिर की नीव भी वो लोग बर्दास्त नहीं कर पाते, किस्सा केवल नफरत भर का ही नहीं है बल्कि एक सोची समझी राजनीती का भी है।  क्योंकि कभी पाकिस्तान में भी हजारों ऐतिहासिक मंदिर हुआ करते थे, पाकिस्तान की भूमि आर्यों की प्राचीन भूमि हुआ करती थी। सिंधु, सरस्वती और गंगा नदी के किनारे ही भारतीय संस्कृति और सभ्यता का उत्थान और विकास का आरम्भ होना बताया जाता है।

कभी बंटवारे के समय पाकिस्तान में करीब 1130 मंदिर और 517 गुरूद्वारे थे, आज उन 1130 मंदिरों में से सिर्फ 30 मंदिर खोले गए हैं, बाकी के 1100 मंदिर अभी भी बंद हैं। वहीं, 517 गुरुद्वारों में से सिर्फ 17 गुरुद्वारे चल रहे हैं, बाकी 500 गुरूद्वारे अभी भी बंद हैं।

बंद क्यों है बंद होने के पीछे का कारण सिर्फ हिन्दू या सिखों का कम और मुस्लिम समुदाय ज्यादा होना नहीं है बल्कि एक जो बड़ा कारण वो है एक समझौता। दरअसल पंडित जवाहर लाल नेहरू और लियाकत अली ख़ान के बीच समझौते के तहत पाकिस्तान में ईटीपीबी यानि इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड का गठन हुआ था और भारत में मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की स्थापना हुई थी। अब जैसे भारत में मस्जिदों और इस्लामिक संस्थाओं का अध्यक्ष समेत सभी लोग मुसलमान बना दिए गये लेकिन पाकिस्तान में इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड में हिन्दू नहीं लिए गये। समझोते के तहत एक बोर्ड का तो गठन हुआ लेकिन उसमें एक भी सिख या हिन्दू नही लिया गया। बोर्ड के चेयरमैन से लेकर सभी पदों पर मुस्लिम रहे उन्होंने अपने लालच में सम्पतियों को या बेच दिया या फिर उन्हें मस्जिदों में तब्दील करा दिया।

कुछ मंदिर और गुरूद्वारे शान के साथ एक वक्त तक खड़े भी रहे लेकिन छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद पाकिस्तान और बांग्लादेश में इसकी प्रतिक्रिया होने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। बाबरी मस्जिद के बाद पाकिस्तान में तक़रीबन 100 मंदिर या तो जमींदोज कर दिए गए या फिर उन्हें भारी नुकसान पहुँचाया गया। बंद पड़े मंदिरों से भी इस्लाम को खतरा हो गया था और पञ्च वक्त के नमाजियों द्वारा उन्हें तोड़ डाला गया जबकि इनमें से कुछ मंदिरों में 1947 में हुए बंटवारे के बाद पाकिस्तान आए लोगों ने शरण तक ले रखी थी।

आठ दिसंबर, 1992 को लाहौर के एक जैन मंदिर को उन्मादियों ने ढहा दिया। जहां अब केवल इसके धूल फांकते खंडहर बाकी रह गए हैं। रावलपिंडी के कृष्ण मंदिर में आज भी हिंदू पूजा-पाठ करने आते हैं। इस मंदिर का शिखर बाबरी विध्वंस के बाद तोड़ दिया गया था. जो आज तक उसी हाल में खड़ा है, ये तस्वीर रावलपिंडी के कल्याण दास मंदिर की है। फिलहाल इसमें नेत्रहीन बच्चों के लिए एक सरकारी स्कूल चलता है। लाहौर के अनारकली बाजार के बंसीधर मंदिर को 1992 में क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। लाहौर के ही शीतला देवी मंदिर भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद पाकिस्तान में मुल्लाओं के गुस्से का शिकार बनने वाले मंदिरों में से एक है।

इसके अलावा लाहौर के प्रसिद्ध अनारकली बाजार के बंसीधर मंदिर को 1992 में क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। कराची के मालीर इलाके में एक मंदिर हुआ करता था। आर्किटेक्चर के लिहाज से यह एक शानदार मंदिर था। मंदिर में हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियों पर बहुत ही बारीकी से नक्कासी का काम किया गया था। जब मंदिर पर हमला हुआ तब लोगों ने यहाँ की मूर्तियां भी तबाह कर दी थी, जिसे देखकर पाकिस्तान में मानवाधिकार संगठन के उपाध्यक्ष अमरनाथ मोतुमल ने एक बार कहा था कि ये लोग सोचते हैं कि हिंदुओं पर और मंदिरों पर हमला कर के इन्हें जन्नत नसीब होती है।

सिर्फ 1992 ही नहीं इसके बाद भी कट्टरपंथी तंजीमों को जन्नत जाने के लिए जब भी जहाँ भी मौका मिलता है वो अपनी नफरत बाहर निकालने से नहीं चुकते जो उनके अन्दर मस्जिदों और मदरसों से बराबर भरी जाती है। 27 जनवरी को पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार नायला इनायत ने सोशल मीडिया पर मंदिरों की कुछ तस्वीरे शेयर की थी नायला ने लिखा था कि पहले सिंध में अब एक और हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई, थारपरकर के चाचरो में भीड़ ने माता रानी भातियानी मंदिर में पवित्र मूर्ति और हिन्दू ग्रंथों को नुकसान पहुंचाया है और पाकिस्तान सरकार मौन है। ये नफरत सिर्फ मंदिर तक सिमित नहीं है पाकिस्तान में 500 गुरुद्वारे भी हैं जो आज भी बंद हैं। गुरुद्वारों की देखभाल करने वाला कोई नहीं बचा. जिनके आज कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बना दिए गये।

पिछले दिनों पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में नारोवल जनपद में गुरुनानक देव जी का चार सौ साल पुराना ऐतिहासिक महल है, इस महल की देखरेख की जिम्मेदारी पाकिस्तान सरकार की है, महल में गुरुनानक के जीवन काल से जुड़ी अहम वस्तुओं को संरक्षित करके रखा गया था लेकिन मजहबी गुंडों ने गुरुनानक देव के महल में भी तोड़फोड़ कर क्षतिग्रस्त कर दिया और उनसे जुडी चीजे चोरी कर ली थी।

यानि बंटवारे के बाद से पाकिस्तान में सैंकड़ों मंदिर ध्वस्त किए गए, हालाँकि पुरे आंकड़े किसी के पास नहीं है 1130 मंदिर और 517 गुरुद्वारों का आंकड़ा भी वो है जो कागजों में लिखित रूप से शामिल है। इसके अलावा छोटे मोटे मंदिरों और गुरुद्वारों का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया और आज जो बचे हैं वे भी उपेक्षा का शिकार हैं। वहां कि हिन्दू आबादी न अपनी पूजा कर सकती न प्रार्थना। यहाँ तक कि उनकी युवा और नाबालिग बच्चियां तक उठा ली जाती है और इस सबके बाद यहाँ सवाल किया जाता है कि सीएए कानून क्यों लाया गया और मुस्लिम इसमें क्यों शामिल नही किये गये ? जबकि सवाल ये होना चाहिए था कि मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड में एक भी हिन्दू क्यों शामिल नहीं किया जाता?

लेख-राजीव चौधरी

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