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आत्महत्या! कितना खतरनाक है मानसिक तनाव

मार्च महीने में 24 घंटे के अंदर गौतमबुद्ध नगर में कुल 7 लोगों ने खुदकुशी की। सुसाइड के सभी सातों मामले नोएडा के अलग-अलग इलाकों से सामने आए। पुलिस का कहना है कि कुछ मामलों में शुरुआती पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी है. सुसाइड के सभी मामलों में मृतक किसी न किसी मानसिक परेशानी या तनाव से जूझ रहे थे। मामला अभी रुका नहीं है देश भर से ऐसे मामले बड़ी तेजी से हर रोज सामने आ रहे है लेकिन राजनितिक खबरों के शोर में कहीं ना कहीं दबकर रह जाते है।

पिछले साल जब बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने सुसाइड की थी, तो उसके बाद डिप्रेशन और मानसिक तनाव को लेकर चर्चा भी शुरू हो गई थी। कहा गया था कि अगर ऐसे सफल इन्सान भी जीवन में तनाव नहीं झेल सकते तो फिर आम इन्सान को कैसे समझाए! हालाँकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की रिपोर्ट के मुताबिक, दुनियाभर में 26 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी मानसिक बीमारी से जूझ रहे हैं। 15 से 29 साल की उम्र के लोगों में आत्महत्या करने की दूसरी सबसे बड़ी वजह मानसिक तनाव या डिप्रेशन ही है।  वहीं, नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि 2015 से 2019 के बीच 43,907 लोगों ने मानसिक बीमारी से तंग आकर आत्महत्या कर ली। अभी 2020 के आंकड़े आने बाकी हैं. एनसीआरबी डाटा प्रकाशित होने के बाद भी सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई हैय यह दुर्भाग्यपूर्ण है। लगता है कि आंकड़े जारी कर देना एक रूटीन मामला बनकर रह गया है। अधिक-से-अधिक यह एक मीडिया इवेंट बनकर रह जाता है। टीवी चैनलों में आंकड़े पेश किये जाते हैं और कुछ खबारों में 2-3 दिनों तक समीक्षाएं छप जाती हैं। अगले साल फिर यही प्रक्रिया दोहराई जाती है।

भारत में आत्महत्या के रुझान देखें तो उनका वैश्विक रुझान से सामंजस्य साफ नजर आता है।  दोनों 6 अंकों में हैं। विश्व में प्रतिवर्ष 800,000 लोग आत्महत्या करते हैं। इसके मायने है हर 40 सेकेंड में एक आत्महत्या होती हैं। यह डब्लूएचओ द्वारा 9 सितम्बर 2019 को जारी रिपोर्ट में उपलब्ध नवीनतम आंकड़े हैं। 10 सितम्बर को विश्व आत्महत्या निवारण दिवस था। आत्महत्या से मृत्यु आज युद्ध और संघर्ष में मरने वालों से अधिक है। उदाहरण के लिए यह 800,000 की संख्या 11 सितम्बर 2001 (9ध्11) से लेकर 13 नवम्बर 2019 तक अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, यमन और पाकिस्तान में युद्ध और संघर्षों में मारे जा रहे लोगों के बराबर है। यह संग्रह ब्राउन विश्वविद्यालय ने किया है। आत्महत्याओं की इतनी बड़ी संख्या इस बात के बावजूद है कि आत्महत्या निवारण यूएन के सतत विकास लक्ष्यों या एसडीजीज में से एक है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में आत्महत्या की दर 100,000 लोगों में 16.5 है। यह दक्षिण और पूर्वी एशिया क्षेत्र का डब्लूएचओ का सबसे ऊंचा आंकड़ा हैं। एनसीआरबी का आंकड़ा 10.4, इससे काफी कम है, पर इसका कारण स्पष्ट नहीं है। क्या एनसीआरबी आंकड़ों को घटाकर दिखा रहा है? फिर, इस वर्ष कुछ नई जटिलताएं भी हैं। आशंका है कि कोविड-19 भी वार्षिक आत्महत्या दर को काफी बढ़ा सकता है। परंतु, भारत में इस वित्तीय वर्ष के पहले क्वाटर में अर्थव्यवस्था एक-चैथाई सिकुड़ चुकी है, और 100 वर्षों में पहली बार देश सबसे बुरे आर्थिक मंदी की ओर बढ़ रहा है। दसियों लाख लोगों की नौकरियां जाने को हैं और दसियों हजार बिजनेस बन्द हो रहे हैं। ये ऐसी परिस्थितियां हैं जिनके कारण आत्महत्या का दर और भी बढ़ सकता है तो सरकार को गंभीरता से इस मुद्दे पर काम करने की जरूरत है।

चलिए हम देखें कि सरकार ने बढ़े हुए आत्महत्या दर और भविष्य में उसके और बढ़ने की संभावना के प्रति क्या रिस्पांस दिया है। भारत ने नीतिगत स्तर पर केवल किसान आत्महत्या को संज्ञान में लिया है। इसके अलावा आत्महत्या को न ही मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा माना गया और न ही सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर की चुनौती के रूप में  तो सरकार का इसे समझ पाना दूर की बात है। यद्यपि एनसीआरबी केंद्रीय गृह मंत्रालय का हिस्सा है, उसका काम केवल जिला हेडक्वाटरों से आंकड़े जुटाकर अकादमिक रिर्पोर्ट पेश करना बना हुआ है। भारत में एनसीआरबी या कोई भी अन्य डेडिकेटेड संस्था शोध के आधार पर आत्महत्याओं के रोकथाम के तरकीब नहीं सुझाता न ही रियल-टाइम आत्महत्या जांच पैनेल के रूप में काम करता है। तो आत्महत्याएं कैसे रुकें?

इसे छोड़ भी दें तो कुछ और परेशान करने वाले तथ्य 2019 के एनसीआरबी डाटा में सामने आए हैं। पहला है ‘विकास का विरोधाभास’ यानी जितना अधिक कोई राज्य विकसित होता है, उतनी ही अधिक आत्महत्याएं उस राज्य में होती हैं। महाराष्ट्र सूची में सबसे ऊपर था क्योंकि उसमें 13.6 प्रतिशत आत्महत्याएं हुईं। ठीक दूसरे नम्बर पर एक और विकसित राज्य तमिलनाडु आता है, जहां 9.7 प्रतिशत आत्महत्याएं हुई थीं। क्या हम कह सकते हैं कि विकसित राज्यों में लोगों की आकांक्षाएं काफी बढ़ी हुई होती हैं और पूरी न होने के चलते वे जीवन से निराश हो रहे हैं?

दूसरा चैकाने वाला पहलू है घरेलू महिलाओं की आत्महत्या का आंकड़ा। इसे आप ‘परिवार के स्थायित्व का विरोधाभास’ कह सकते हैं। कामकाजी महिलाओं से अधिक घरेलू महिलाएं आत्महत्या करती हैं। पर यह शोध करने की बात है कि क्या घरेलू महिलाओं को अन्य करणों से उत्पीड़ित कर मार डालने पर भी कई मामलों में हत्याओं को भी आत्महत्या करार दिया जाता है? कुल मिलाकर भारत में ये आत्महत्या के रुझान गहरी जांच और व्याख्या की मांग करते हैं।

यंग इंडिया यानी युवा इंडिया खुशहाल नहीं है- यही संदेश हमें एनसीआरबी रिपोर्ट से मिलता है। 2019 में 18 से कम उम्र के नाबालिगों की आत्महया का आंकड़ा 9613 था। और 18-30 उम्र वालों का आंकड़ा 48774 है, जो काफी अधिक है, और हम देख रहे हैं कि हर तीसरा व्यक्ति जो आत्महत्या करता है, वह युवा वर्ग का है! हर कोई जानता है कि सिद्धान्ततः आत्महत्या करना गलत है और इससे हमेशा बचने के उपाय उपलब्ध हैं। पर सबसे दुखद और क्रूर होता है किसी युवा का उस समय अपने जीवन को खत्म कर देना जब वह समाज को बहुत कुछ दे सकता है। यदि युवाओं को समाज जीने लायक नहीं लगता तो यह गंभीर बात है।

समाज को अपने भीतर झांककर उस सामाजिक पारिस्थितकी को बदलने की जरूरत है जो आत्महत्या की परिघटना को पैदा करती है। युवा आत्महत्या को परखें तो दोनों ऊपरलिखित ग्रुपों में 18748 अपने को ‘पारिवारिक समस्याओं’ के चलते खत्म करते हैं। 5398 युवा प्रेम में विफलता के चलते, 1428 बेरोजगारी की वजह से और 1577 परीक्षा में अपेक्षित परिणाम न मिलने से अपनी जान ले लेते हैं। हालाँकि सुसाइड या आत्महत्या, जान-बूझकर खुद की जान लेने की कोशिश का नाम है। ज्यादातर लोगों की आत्महत्या के लिए कई तरह मेंटल डिसऑर्डर जिम्मेदार होते हैं। इसके अलावा बहुत से लोग ज्यादा शराब पीने या नशे के शिकार होने के कारण भी आत्महत्या कर लेते हैं। कुछ आत्महत्या के मामलों के पीछे इंसान की बेकाबू भावनाएं जिम्मेदार होती हैं। कई बार लोग स्ट्रेस, आर्थिक समस्याओं, रिलेशनशिप की समस्याओं जैसे ब्रेकअप या प्रताड़ना से तंग आकर सुसाइड जैसे कदमों को उठा लेते हैं। सुसाइड का सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिन्होंने पहले कभी खुदकुशी की कोशिश की हो।

सुसाइड रोकने का सबसे कारगर उपाय यही है कि समय रहते बच्चों को उनकी सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारी का अहसास कराया जाये। उन्हें जीवन निराशावादी नहीं बल्कि आशावादी बनाये। उन्हें जीवन के प्रति संघर्षशील बनाये उन्हें उन लोगों की जीवनी पढने को दी जाये जिन्होंने जीवन के अंतिम पल तक भी हार नहीं मानी यदि कोई हताश महसूस कर रहा है अथवा आत्महत्या करने की सोच रहा है, तो उसकी मदद करने की कोशिश की जाए।

विनय आर्य

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