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उत्तम बुद्धि वाले ज्ञानवान बनें

                 ( ऋग्वेद प्रथम अध्याय तृतीय सूक्त के आधार पर )

वेद स्वत: प्रमाण-परमपिता परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में चार वेद का ज्ञान चार पवित्र ऋषियों ( जिनके नाम अग्नि , वायु , आदित्य और अंगीरा थे) के माध्यम से जीव मात्र के कल्याण के लिए दिया.  हमारी अथवा हमारे जीवन की कोई भी समस्या हो, उसका समाधान तो वेद देते ही हैं किन्तु इसके साथ ही साथ किसी समस्या के समाधान सम्बन्धी किसी प्रमाण की आवश्यकता हो तो, उसका समाधान वेद से ही मिलता है, अन्यत्र नहीं. हमारे किसी भी कार्य के सम्बन्ध में मूल स्रोत का पता लगाना हो तो उसका समाधान भी हम वेद से ही करते हैं. हमें क्या करणीय है तथा क्या नहीं?,  इसके लिए भी हमें वेद की ही शरण में जाना होगा. इसलिए ही हम कहते हैं कि वेद स्वत-प्रमाण हैं.

वेद की शरण आवश्यक-जब तक विश्व वेद के आदेशों का पालन करता रहा, जब तक विश्व में वेद ज्ञान का पालन होता रहा, तब तक विश्व में शांति रही, सब में विश्वास रहा, सब लोगों में भ्रात्रिभाव बना रहा, सब लोग एक दूसरे का आदर करते रहे, विश्व धन-धान्य से संपन्न रहा, विश्व में किसी प्रकार का संकट नहीं खडा हुआ किन्तु ज्यों ही हम में से कुछ लोगों ने वेद के मार्ग को छोड़ा, ज्यों ही अपने मन के आधीन हो कर स्वाधीन रूप से कार्य किया,  त्यों ही विश्व के सामने संकट के बादल आ खड़े हुए-लड़ाई-झगड़े, कलह-क्लेश, अभाव, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ और सूखे आदि की ही भाँति प्रकृति के अनेक प्रकोप हमें निगलने के लिए, हमें ग्रसने के लिए आ खड़े हुए.

        मनुष्य मात्र इन संकटों से उबरने का आज तक प्रयास कर रहा है किन्तु उसे कोई मार्ग दिखाई नहीं दे रहा. मार्ग दिखाई दे भी क्यों?  क्योंकि जिस वेद में इस संकट का समाधान है, वह उस वेद की शरण में जाते ही नहीं, जाना तो क्या उन्होंने वेद नाम के ग्रन्थ को देखा ही नहीं, जिस में सृष्टि के उदय के साथ ही परम पिता परमात्मा ने हमारी प्रत्येक समस्या का समाधान दिया है. जब तक हम वेद की शरण में नहीं जावेंगे न तो हमें हमारी समस्या का ही ठीक से ज्ञान होगा और न ही हम उसका समाधान ही खोज सकते हैं. इसलिए सुख के अभिलाषी प्राणी के लिए वेद का ज्ञान आवश्यक है, वेद की शरण आवश्यक है.

वेद सब के लिए प्राचीन काल से ही मार्ग दर्शक जब हम हमारे प्राचीन साहित्य को देखते हैं तो हम पाते हैं कि यह सब साहित्य भी एक स्वर से हमें इंगित कर रहा है कि सब समस्याओं का समाधान वेद में है और वेद ही स्वत: प्रमाण हैं. अन्य कोई ग्रन्थ स्वत: प्रमाण नहीं है. भी उपनिषद्कार हुए हैं, वह भी सब, इस सब के अतिरिक्त हमारे इतिहास ग्रंथकार ( रामायण, महाभारत, श्रोत्र सूत्रकार, धर्मसूत्र तथा गृह्यसूत्र आदि, इन सब के लेखकों ने स्पष्ट रूप से ) वेद को ईश्वरीय ज्ञान स्वीकारते हुए, इन्हें स्वतरू प्रमाण माना है. वेद के अतिरिक्त यह सब लेखक अन्य सब ग्रन्थों को परत: प्रमाण मानते हैं. जब हम इन सब ग्रंथों का अवलोकन करते हैं तो हमें इस सम्बन्ध में अनेक श्लोक मिलते हैं, जिनमें वेद को स्वतरू प्रमाण होने का दावा किया गया है.

        मनु महाराज ने तो अपने अमर ग्रन्थ मनुस्मृति में यह स्पष्ट स्वीकारते हुए इसके १२.१७ श्लोक में संकेत किया है कि “वेद सब के लिए प्राचीन काल से ही मार्ग – दर्शक रहे हैं” वेद ने मानव के लिए नेत्र का कार्य किया है. वेद की महिमा को पूरी भाँति समझ पाना हमारे चार वर्ण, चार आश्रम, तीन काल तथा तीन लोक सम्बन्धी जितना भी ज्ञान है, यह सब वेद से ही हमें प्राप्त होता है. वृह्दारण्यक उपनिषद् तो यह मानता है कि वेद उस महान् प्रभु के निरूश्वास रूप हैं द्य इस प्रकार के ही शब्द हमें हमारे अन्य ग्रन्थों में मिलते हैं.

        इस सब से एक तथ्य निकल कर आता है कि अन्य ग्रंथों में यदि कोई प्रसंग इस प्रकार का आ जावे, जिसमें वेद के आदेशों के विरोध का आभास आता हो तो वह वचन अप्रमाणिक ही होंगे.

वेद सार्वकालिक उपदेश- हम जानते हैं कि वेद ही सार्वकालिक उपदेश हैं. यह इस सृष्टि के किसी भी भाग में तथा किसी भी समय में एक समान काम आते हैं. यह न कठिन हैं न कभी पुराने ही होते हैं और न ही कभी कालातीत होते हैं. इस कारण इनका सदा तथा प्रत्येक स्थान पर समान प्रभाव होता है तथा समान रूप से काम में आते हैं. इन मन्त्रों के मनन चिंतन से मानव मात्र की सब समस्याओं का समाधान होना स्वाभाविक ही है.

          परम पिता परमात्मा बालक का इस प्रकार पालन करता है, जिस प्रकार पिता अपने बालक की अंगुली पकड़ कर उसे चलना, दूसरे का सम्मान करना आदि क्रियाओं को सिखाता है. ठीक उस प्रकार ही परमपिता भी पिताओं का भी पिता है.

         जब यह छोटा सा सांसारिक पिता अपनी संतान की उन्नति के लिए प्रयास करता है तथा उसे आगे ले जाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहता है तो फिर प्रभु तो संसार के समग्र प्राणियों का ही पिता है. संसार का अधिष्ठाता, संसार का जन्मदाता प्रभु फिर इसे उन्नति पथ पर क्यों न ले कर जावेगा?, अवश्य ले जावेगा. वह ज्ञान का भंडारी अपनी इस प्रजा को वेद ज्ञान का भण्डार देने से क्यों पीछे हटेगा? निश्चय ही नहीं. प्रभु सब प्राणियों को सुख बांटता है. प्रभु सब प्राणियों को समान रूप से वेद का ज्ञान बांटता है. प्रभु सब प्राणियों को आगे बढ़ने के साधन उपलब्ध कराता है किन्तु …..

कर्म व पुरुषार्थ पूर्ण प्रयत्न परमपिता यह सब उन्नति के मार्ग जीव को देता है किन्तु ठीक वैसे जैसे पिता अपनी संतान को देता है. प्रत्येक पिता चाहता है कि उसकी संतान सच्चरित्र, आज्ञाकारी, बड़ों का आदर-सत्कार करने वाली,  गुणवान व पुरुषार्थी हो द्य परमपिता परमात्मा तो एक दो का नहीं, पूरी सृष्टि का पिता होता है, उसने एक परिवार की नहीं, पूरे संसार की व्यवस्था करनी होती है. इसलिए प्रभु उस का ही सहयोग करता है, जो पुरुषार्थ के द्वारा अपना सहयोग स्वयं करते हैं. इसलिए प्रभु का आशीर्वाद पाने के लिए पुरुषार्थी होना आवश्यक होता है.

डा. अशोक आर्य

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