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कठुआ रेप काण्ड : सच और झूठ के बीच झूलता देश

पिछले दिनों की दो घटनाएँ देश और दुनिया में प्रमुख चर्चा का विषय बनी। एक घटना में कठुआ में दुष्कर्म  की शिकार बच्ची थी तो दूसरी घटना उन्नाव में एक विधायक द्वारा नाबालिग लड़की के साथ दुष्कर्म का मामला। आखिर दोनों घटनाएँ इतनी चर्चा का विषय क्यों बनी? कहीं ऐसा तो नहीं उन्नाव की घटना राजनीति से जुड़ी थी और कठुआ में हुए दुष्कर्म को धार्मिक रंग दिया गया? क्योंकि कठुआ कांड और उन्नाव जैसे न जाने कितने ही शर्मनाक मामले आए दिन भारत में होते हैं। लेकिन नेता और मीडिया संज्ञान तब लेते हैं, जब उसमें कुछ वोट या एजेंडा या फिर हाई प्रोफाइल हो। इस कांड में भी उसकी दिलचस्पी इसी कारण जागी। एक घटना में आरोपी हिन्दू थे, बच्ची मुस्लिम और मंदिर से जुड़ा मामला था. दूसरी में वर्तमान सत्तारूढ़ पार्टी के विधायक. इसके बाद बड़ी न्यूज बनी, लाइव शो हुए, ऐसा नहीं था कि बीच में कोई और रेप की खबर नहीं आई! कभी बिहार के सासाराम से, कभी आसाम, कभी गुजरात से लेकिन किसी की दिलचस्पी नहीं थी। दोनों ही घटनाओं में पहली बार आरोपी नार्को टेस्ट और सीबीआई जाँच की मांग लगातार कर रहे है।

फिलहाल कठुआ में हुए दुष्कर्म के मामले की सुनवाई जम्मू-कश्मीर के बाहर चंडीगढ़ में कराने और वकीलों को सुरक्षा देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी कर दिया है। आरोपी पक्ष द्वारा इस मामले की सीबीआई जांच की मांग लगातार हो रही है। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन के साथ मामले की सुनवाई 90 दिन में खत्म करने की मांग की है। पर सवाल यह है कि पुलिस द्वारा चार्जशीट दायर करने के बाद अदालत में ट्रायल शुरू हो गया है, तो फिर इस मामले की सीबीआई जांच कैसे हो सकती है?

लोगों द्वारा सख्त कानून बनाने की मांग हो रही है। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष अनशन पर है उनकी मांग की है आरोपी को 6 माह के अन्दर फांसी होनी चाहिए। परन्तु कानून क्या करेगा जब पूरी कानूनी प्रक्रिया ही संदेह के दायरे में आ रही है। कुछ लोगों में गुस्सा है तो कुछ के पास सवाल भी कि एक कमरे के मंदिर में लगातार 7 दिनों तक एक बच्ची के साथ सामूहिक रेप हो सकता है? वे भी उस जगह जहाँ आस-पास के तीन गाँवां के लोग नित्य पूजा-अर्चना को आते हो। 17 जनवरी को उस मासूम बच्ची की लाश बरामद होती है। घटना के शुरू में यानि 18 जनवरी को बकरवाल समुदाय के स्थानीय नेता वकार भट्टी की अगुवाई में सभी धर्म पन्थों के लोग न्याय मांगते नजर आते है। इसके बाद भी कुछ समाचार पत्र पोस्टमार्टम की रिपोर्ट को लेकर इस बात का भी दावा कर रहे हैं कि रिपोर्ट में दुष्कर्म हुआ ही नहीं। कुछ भी हो अब नए सवालों के बीच पुराने जवाब उलझते जा रहे हैं।

मीडिया के अनुसार घटना के तीन महीने बाद हुर्रियत नेता तालिब हुसैन, जेएनयू की पूर्व उपाध्यक्ष शेहला रशीद समेत पूरी वामपंथ की सेना उग्र होती है रातों-रात बच्ची के नाम पर ऑनलाइन लाखों रुपये का चंदा जमा किया जाता है और अचानक लोगों में आक्रोश पैदा होकर रेप और दुष्कर्म जैसे घिनौने अपराधों के प्रति देश की सामूहिक चेतना जागती है। पीड़ित बच्ची की वकील दीपिका राजावत दिल्ली के जन्तर-मंतर पर खड़ी होकर ये कहती है कि मुझे आज हिन्दू होने पर शर्म महसूस हो रही है। अर्थात पूरा मामला धर्म से जोड़ा जा रहा है ये नहीं पता दोषी धर्म है या अपराधी।

हाँ यदि बात धर्म की ही हो रही है तो मुझे याद है बुलंदशहर में 35 वर्षीय हिन्दू महिला व उसकी नाबालिग बेटी के साथ हुए रेप के मुख्य आरोपी सलीम बावरिया, जुबैर और साजिद के नाम सामने आये थे। मुझे याद है इससे पहले मुंबई में एक हिन्दू महिला पत्रकार के साथ कासिम बंगाली, सलीम अंसारी, चांद शेख, सिराज रहमान ने बारी- लगातार बारी से महिला से रेप किया था। हाल ही बिहार के सासाराम में मेराज आलम ने एक नाबालिग हिन्दू बच्ची को अपनी हवस का शिकार बनाया। मुझे 16 दिसंबर 2012 को दिल्ली के बसंत विहार में हुआ वह भयावह मंजर भी याद है जिसमें निर्भया के साथ जिस शख्स ने सबसे ज्यादा बर्बरता की थी. शायद उसके मजहब से भी सभी परिचित होंगे बल्कि उसे उसके मजहब के हिसाब से बाहर आने पर पुरुस्कृत करने वाले नेता भी याद होंगे।

लेकिन मुझे याद नहीं हैं इससे पहले किसी रेप और हत्या के केस में समूचा धर्म, पंथ या समुदाय इस तरह निशाने पर लिए गये हो? शायद ही इससे पहले किसी अभिनेता या अभिनेत्री को हिन्दुस्तानी होने पर शर्म महसूस हुई हो। 2012 याद ही होगा सबको उस वक्त भी जनता सड़कों पर आई थी। विरोध और प्रदर्शन भी हुए थे बिना किसी नेता या राजनितिक दल के, बिना किसी के कहे। हर एक संवेदनशील शख्स इस करतूत के विरोध में खड़ा मिला था। वो प्रतिरोध की आवाज थी। लेकिन इस बार सड़कों पर आई जनता का मकसद अलग है। यहां अपराधी की सजा के बजाय मकसद है धर्म और धार्मिक स्थान को बदनाम किया जाये।

सवाल इस या उस दुष्कर्म का नहीं है। सवाल इस या उस धर्म-मजहब का भी नहीं है। सवाल इस या उस समुदाय से जुड़े लोगों भी का नहीं, सवाल है हिंसा और इस तरह के घिनौने दुष्कर्म का है। दुर्भाग्य से यह सब तेजी से बढ़ रहे हैं। आज लोगों को जागरूकता की जगह सस्पेंस चाहिए और मीडिया को नई खबर। यह सब अचानक नहीं है इसके बीच मीडिया और राजनीति की सनसनी दोनों एक हो गए हैं। पीड़ित लड़की के परिजनों को न्याय मिलना चाहिए बल्कि  ऐसे गुनाहों की सजा जल्द से जल्द मिलना सुनिश्चित होनी चाहिए। ऐसे सभी अपराध एक सभ्य समाज के माथे पर बदनुमा दाग है इनकी जितनी निंदा की जाए कम है पर सजा किसी निर्दोष को नहीं होनी चाहिए। लेख- राजीव चौधरी

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