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धारा 370 बलिदान रंग लाया

देश की आजादी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु सरकार की सबसे बड़ी गलतियों में एक गिने जाने गलती धारा 370 कही जाती रही है। अगर इसके इतिहास में जाएं तो साल 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन के वक्त जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे। लेकिन बाद में उन्होंने कुछ शर्तों के साथ भारत में विलय के लिए सहमति जताई। इसके बाद भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 का प्रावधान किया गया जिसके तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार दिए गए थे. अनुच्छेद 370 के प्रावधानों के अनुसार, रक्षा, विदेश नीति और संचार मामलों को छोड़कर किसी अन्य मामले से जुड़ा कानून बनाने और लागू करवाने के लिए केंद्र को राज्य सरकार की अनुमति चाहिए थी।

अब 5 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में इसका फैसला हुआ गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में जिसका एलान किया। इसके बाद जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने वाला विधेयक जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल दोनों सदनों पारित करवा कर मोदी सरकार ने इतिहास रच दिया है। यानि जम्मू-कश्मीर अब राज्य नहीं रहेगा। जम्मू-कश्मीर की जगह अब दो केंद्र शासित प्रदेश होंगे। एक का नाम होगा जम्मू-कश्मीर, दूसरे का नाम होगा लद्दाख। दोनों केंद्र शासित प्रदेशों का शासन उपराज्यपाल के हाथ में होगा। जम्मू-कश्मीर की विधायिका होगी जबकि लद्दाख में कोई विधायिका नहीं होगी। कश्मीर के अलग झंडे के बजाय अब वहां तिरंगा ही देश का झंडा माना जायेगा। जम्मू -कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल जो 6 वर्षों का होता था वह भी अब भी पांच वर्ष का ही होगा।

यह एक बहुत बड़ा बदलाव है इस कड़े फैसले के सरकार की प्रशंसा की जाये कम है। क्योंकि कई दशकों से कश्मीरी हिन्दू कश्मीर में भारतीय संविधान की बाट जोह रहे थे। या ये कहे लम्बे कालखंड से विस्थापित हिन्दू कश्मीर में भारतीय सविंधान और केंद्र शासित क्षेत्र का दर्जा मांग रहे थे। सरकार ने जो किया इसके पीछे एक नहीं बल्कि अनेक कारण ऐसे थे जो धीरे-धीरे कश्मीर को भारत से अलग कर रहे थे। दिसम्बर 2016 को श्रीनगर हाइकोर्ट ने तिरंगे की जगह कश्मीर राज्य का झंडा वहां के सवेंधानिक पदों पर लगाये जाने का आदेश दिया था। उस समय भी हमने कश्मीर में केंद्र द्वारा शासन की मांग उठाई थी। ये मांग उठाने के पीछे तथ्य ये दिए थे कि 1990 में एमबीबीएस दाखिलों में जम्मू का 60 प्रतिशत कोटा था जो 1995 से 2010 के बीच घटाकर सिर्फ 17 से 21 प्रतिशत कर दिया गया था। यही नहीं धारा 370 और 35ए के चलते जम्मू कश्मीर की ओबीसी जातियों को आरक्षण का लाभ भी नहीं मिलता है। यानि मुख्यमंत्री हमेशा घाटी क्षेत्र से चुनकर आते रहे और जम्मू और लद्दाख के साथ भेदभाव करते रहे हैं।

समय के साथ सरकारें बदलती रही पर किसी सरकार ने इसे हटाने की हिम्मत नहीं की। इस कारण जम्मू कश्मीर में कभी भी लोकतंत्र प्रफुल्लित नहीं हुआ। धारा 370 के कारण भ्रष्टाचार फला-फूला, पनपा और चरम सीमा पर पहुंचा भारत सरकार ने हजारों करोड़ रुपये जम्मू और कश्मीर के लिए भेजे, लेकिन वो भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गए, 370 को हथियार बनाकर वहां भ्रष्टाचार को कंट्रोल करने वाले कानून भी कभी लागू नहीं होने दिए गए।

370 के कारण लम्बे अरसे से लद्दाख क्षेत्र विकास के लिए तरस रहा है। जबकि 29 हजार वर्ग किमी. में फैला लद्दाख क्षेत्र प्रकृति की अनमोल धरोहर है जहाँ दुनिया के कोलाहल से दूर शांति का अनुभव किया जा सकता है। अब यहाँ के निवासियों के लिए रोजगार के अनेकों अवसर भी खुल सकते है। दूसरा प्रशासनिक स्तर पर भी लद्दाख क्षेत्र से भेदभाव था। वहां से अभी तक (आई.ए.एस.) के लिए कुल चार से छ: लोग ही चुने गये है। अगर साल 1997 -98 का ही उदहारण देखे तो कश्मीर राज्य लोक सेवा आयोग ने परीक्षा आयोजित की गयी थी। इस परीक्षा में 1 इसाई, 3 मुस्लिम तथा 23 बौद्ध मत को मानने वालों ने लिखित परीक्षा पास की किन्तु मजहबी मानसिकता देखिये इनमें मात्र  1 इसाई और 3 मुस्लिम सेवार्थियो को नियुक्ति दे दी गयी। जबकि 23 बोद्ध धर्म के आवेदकों में से सिर्फ 1 को नियुक्ति दी गयी इस एक उदहारण से वहां कि तत्कालीन सरकारों द्वारा धार्मिक भेदभाव का अनुमान लगाया जा सकता है।

अन्याय की चरम स्थिति तब भी देखने को मिलती है जब बोद्ध और हिन्दुओं को पार्थिव देह के अंतिम संस्कार के लिए भी मुस्लिम बहुल इलाकों में अनुमति नहीं मिलती। शव को हिन्दू या बौद्ध बहुल इलाकों में ले जाना पड़ता है। आज महबूबा मुफ्ती लेकर फारुख परिवार और गुलाम नबी आजाद इस बिल को कश्मीर के धोखा और संविधान की हत्या बता रहे है कश्मीरी संस्कृति और इस्लाम का राग अलापा जा रहा है। जबकि कश्मीर का मतलब सिर्फ मुसलमान नहीं है। आज जम्मू क्षेत्र की 60 लाख जनसँख्या में करीब 42 लाख हिन्दू है इनमे तकरीबन 15 लाख विस्थापित हिन्दू है। जो धारा 370 के चलते गुलामों जैसा जीवन जीवन जीने को मजबूर है। हमने कभी कश्मीरी नेताओं की जुबान से से घाटी के पंडितों का दर्द नहीं सुना जो अपना बसा बसाया घर छोड़कर आज दर-दर की ठोकर खाने को मजबूर है। जबकि इसके उलट घाटी में सेना पर पत्थर बरसाने वालों की पैरोकारी संसद मैं हर रोज सुनाई दी।

आज जम्मू कश्मीर में एक लंबे रक्तपात भरे युग का अंत धारा 370 हटने के बाद होने जा रहा है। सरकार ने अब हिम्मत दिखाकर और जम्मू कश्मीर के लोगों के हित के लिए यह फैसला लिया है। कश्मीर को भारत से जोड़ दिया अब वहां भारतीय संविधान भी लागू हो जायेगा। यह निर्णय यह सुनिश्चित करेगा कि जम्मू-कश्मीर में दो निशान-दो सविंधान और दो झंडे नहीं होंगे। यह निर्णय उन सभी देशभक्तों और भारत माता के उन सभी वीर सैनिकों के लिए एक श्रद्धांजलि है जिन्होंने एक अखंड भारत के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया हैं।

-विनय आर्य

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