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कश्मीर से कैराना तक, पलायन

किसी कवि ने कहा है कि हादसा वो नहीं जो हो चुका, हादसा ये कि फिर सब लोग चुपचाप हैं| सोमवार को कैराना से सांसदहुकुम सिंह ने कहा कि कैराना में रंगदारी की मांग पूरी न करने पर हिंदूव्यापारियों की हत्या कर दी जाती है। अब तक छह व्यापारियों की हत्या होचुकी हैं,जिससे भय का माहौल बना हैं और दो साल के भीतर करीब 250 हिन्दूपरिवार कैराना से पलायन कर चुके हैं। ज्ञात हो 2014 में शिवकुमार, राजेंद्र व् विनोद को रंगदारी न देने पर बेरहमी से मार दिया गया था| इसके बाद लूट, अपहरण की हत्या की घटनाएँ होती रही पर कश्मीर की तरह प्रशासन मूक बना रहा जिसका नतीजा यह हुआ कैराना की मिश्रित आबादी वाले मोहल्ले दरबार कलां, आर्यपूरी, गुंबद, घोसाचुंगी आदि से हिन्दू मकान दुकान बेचकर अन्य शहरों में विस्थापित हो गये| कई घर आज भी ऐसे है जिनके बाहर बोर्ड लगा है मकान बिकाऊ है| इसके अलावा अकबरपुर गांव सुन्हेटी में कश्यप समाज की महिला की गैंगरेपके बाद हत्या,अलीपुर गांव में कश्यप समाज के लोगों की पिटाई करके उनकेबिटौडे और खलिहान में आग लगा दी गई। जिस तरह कश्मीर से पंडितों पर जुल्मढहाकर उन्हें पलायन को मजबूर किया गया,वैसे ही हालात आज कैराना में बनाएजा रहे हैं,जिससे वहां के लोग पलायन कर जाएं। यह बताना प्रासंगिक होगा कि पलायन को मजबूर सभी व्यापारी और गरीब लोग हिन्दू थे इसका संदेश साफ है कि इस क्षेत्र में हिन्दुओं को या तो भय या आतंक के साएमें जीना होगा या वहां से पलायन करना पड़ेगा।
यदि इस संदर्भ में बात करे और कश्मीरी पंडितो पर हुई हिंसा, उनकी औरतो बच्चियों के साथ बलात्कार उसके बाद पलायन और पलायन के बाद उनके शरणार्थी जीवन से कौन परिचित नहीं है| शुरूआती दिनों में मजहबी उन्मादियों ने कश्मीरी पंडितो पर भी कुछ ऐसे ही छिटपुट हमले किये थे| धीरे धर्मिक उन्माद बढ़ाते गये और योजना बद्ध तरीके से बाकायदा मस्जिद की मीनारों से घाटी को खाली करने का आदेश दे दिया गया जिसका नतीजा करीब 4 लाख कश्मीरी पंडित आज अपने ही देश में दर-दर की ठोकर खा रहे है| वो भी उस देश में जिसे लोग गर्व से हिंदुस्तान कहते है| कश्मीर त्रासदी को एक हादसा कहने वाले राजनैतिक दल आज चुप क्यों है? कश्मीर में सेना के रिटायर जवानों के लिए मकान बनाने से धार्मिक समीकरण बिगड़ने की बात करने वाले दल कैराना से पलायन करने वाले हिन्दुओ के मामलों को राजनीति क्यों बता रहे है? बड़ा सवाल यह कि दादरी की एक घटना हो या महाराष्ट्र विधान सभा के अन्दर रमजान के दिनों एक मुस्लिम के रोटी खाने को लेकर इतना हो-हल्ला मचाने वाले औरउसको अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप देने वाली मीडिया और नेता ऐसी घटनाओं पर चुप्पी क्यों साध लेतेहैं?उनका अंदाज शतुरमुर्गी क्यों हो जाता है?
वैसे हकीकत भी यही है कि वहचाहे असम, केरल हो या बंगाल,वहां के मुस्लिम बहुल जिलों में हिन्दुओं को भय केसाए में ही जीना पड़ रहा है। जब वामपंथी कहते हैं कि धर्म एक अफ़ीम की तरह हैतो उनका मतलब सिर्फ़हिन्दू धर्म से होता है,मुसलमानों और ईसाईयों के सम्बन्ध में उनका यह बयानकभी नहीं आता। पश्चिम बंगाल के 22 से 24 जिलों में मुस्लिम आबादी को 50 से ऊपर वे पहले ही पहुँचा चुके हैं,अब नम्बर आया है केरल का। अब केरल में क्या हो रहा है,वहां से घबराये और डरे हुए हिन्दू लोग मुस्लिम बहुलइलाकों से पलायन कर रहे हैं,मलप्पुरम और मलाबार से कई परिवार सुरक्षितठिकानों को निकल गये हैं और दारुल-इस्लामबनाने के लिये जगह खाली होती जारही है। 580 किमी लम्बी समुद्री सीमा के किनारे बसे गाँवों में पोन्नानी से बेपूर तकके 65 किमी इलाके में एक भी हिन्दू मछुआरा नहीं मिलता,सब के सब या तो धर्मपरिवर्तित कर चुके हैं या इलाका छोड़कर भाग चुके हैं।
मलप्पुरम सहितउत्तर केरल के कई इलाकों में दुकानें और व्यावसायिक संस्थान शुक्रवार कोबन्द रखे जाते हैं और रमज़ान के महीने में दिन में होटल खोलना मनाहै। यदि कोई भूल से खोल लेता है कई जगह तो इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ती है| लोगों को वर्ष 2012 का वह मंजर याद होगा जब असम के बोडोलैण्ड क्षेत्र मेंबोडो और मुस्लिमों के मध्य दंगे के चलते बांग्लादेश से आये शरणार्थियों को लेकर हुए थे जो यहाँ आकर पहले से रह रहे हिन्दुओं पर इस्लामिक तौर तरीके थोपना चाह रहे थे हालाँकि ऐसा नहीं है कि सफल ना हुए हो काफी हद तक सफल भी हुए और असम के कई जिलों समेत बंगाल के सीमावर्ती जिले नादिया और चौबीस परगनामें से हिन्दू अपनी जमीन-जायदाद बेंचकर भागने को मजबूर हुए थे। किन्तु इन पर सब हादसों पर लोग सिसकते रहे और हमेशा सरकारे मौन रही जिस कारण पहले कश्मीर हुआ फिर असम, बंगाल आज यह सब कैराना में दोहराया गया, हो सकता है कल वहां से कश्मीर की तरह आवाज़ भी आये कि कैराना में लेंगे आजादी, किन्तु उससे पहले प्रश्न यह है कि विस्थापन और पलायन का सिलसिला हिन्दुओ द्वारा हिंदुस्तान में कब तक चलेगा?

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