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केरल में क्यों जरूरी है वैदिक शंखनाद?

दक्षिण भारत का एक प्रदेश केरल जो प्राकृतिक सुषमा के साथ देवताओं की भूमि के रूप में जाना जाता है आज वह केरल धर्मांतरण की भूमि बन चूका है. सम्पूर्ण भारत के किसी भी कोने में जाकर देख लीजिए. केरल से निकली ईसाई नन आपको ईसाई धर्मान्तरण करती दिख जाएगी. पिछले वर्ष सोशल मीडिया पर एक खबर चली थी कि केरल के स्कूलों में नर्सरी क्लास में पढ़ाया जाता है कि एक हिन्दू था जो बेहद गरीब था. वो कई मन्दिर गया लेकिन हिन्दू भगवान ने उसकी फरियाद नहीं सुनी.फिर वो चर्च गया तो ईसा मसीह ने उसे तुरंत अमीर बना दिया और फिर वो ईसाई बन गया! खबर में यदि जरा भी सत्यता है तो सोचिये! ईसाई मिशनरीज इन छोटे छोटे बच्चो के मन मस्तिष्क में कितना जहर भर रहे हैं? हालाँकि केरल के अन्दर बच्चों के कोमल-निश्च्छल मन में अपने धर्म के प्रति दुर्भावना भरने का यह खेल नया नहीं है.

फिलहाल केरल में जनसंख्या सन्तुलन की नजर से देखें तो लगभग 30 फीसदी ईसाई, लगभग 30 फीसदी  मुस्लिम और फीसदी हिन्दू हैं, बाकी के 30 फीसदी किसी धर्म के नहीं है यानी वामपंथी है जिन्हें धार्मिक आंकड़ों में हिन्दुओं में जोड़ा जाता है लेकिन उन्हें जब मौका मिलता है, जिधर फायदा होता उधर खिसक जाते हैं चाहे चुनावों में मदनी जैसो का साथ देना हो अथवा चर्च से चन्दा ग्रहण करना हो. वह कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते. समूचे भारत की तरह ही समूचे केरल में भी हिन्दू बिखरे हुए और असंगठित हैं, उनके पास चुनाव में वोट देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है, न ही नीति-निर्माण में उनकी कोई बात सुनी जाती है, न ही उनकी समस्याओं के निराकरण में! केरल में हिन्दुओं की कोई “राजनैतिक और धार्मिक ताकत” नहीं है, एक तरफ इस्लामियत तो दूसरी तरफ ईसाईयत बीच में हिन्दू समुदाय इसके बाद अगर कुछ बचता है मार्क्सवादी सेकुलर हिन्दुओं के हितों और धार्मिक अनुष्ठानो पर तंज कसते दिखाई देते है. हो सकता है जल्दी ही कश्मीर की तरह केरल भी उसी रास्ते पर चला जाये. जहाँ हिन्दुओं की कोई सुनवाई नहीं होगी तो यहाँ इस्लाम से जुड़ी बातों पर प्रवचन देनेवाले लोगों की बहुत पूछ है. उनके बड़े-बड़े पोस्टर और कटआउट सड़कों और चैराहों पर उसी तरह से लगे हुए होते हैं जैसे फिल्मी सितारों के लगे होते हैं. हर कुछ दिनों में धार्मिक सम्मेलन आयोजित कराए जाते हैं जिनमें अरब देशों से लौटे लोग भाषण देते हैं. मस्जिद के ऊंची मीनार हो या दुकानों के अरब शैली में लिखे नाम या फिर सड़क पर चलती बुर्कानशीं औरतें, माहौल किसी अरब देश जैसा लगता है.

दिल्ली एनसीआर तक सिमटी मीडिया यहाँ बैठकर गधे और पिल्लो पर बहस करा देती है लेकिन केरल आदि प्रदेशों में हिन्दू आदिवासियों को ईसाई बनाने के लिए निवेश किये रही धन राशि और खुलेआम होते धर्मांतरण पर मौन है. हरिद्वार से लेकर काशी तक बड़े-बड़े आश्रमों में बैठे मठाधीश अपनी ऐशोआराम की जिन्दगी में लीन है. यूँ तो आर्य समाज के 140 साल के इतिहास में एक से एक बड़े आयोजन कार्यक्रम हुए लेकिन दक्षिण भारत में होने वाले इस दक्षिण भारतीय वैदिक महासम्मेलन से आर्य समाज एक अनूठी गौरवगाथा लिखने जा रहा है. सर्वविदित है कि आर्य समाज अपने जन्म से ही वैदिक धर्म रूपी वृक्ष की जड़ें सींचता आया है. इसलिए अब जनजातीय समुदाय में शिक्षा का प्रचार-प्रसार कर रहा है. उस समुदाय में जहाँ से अन्य समुदाय की मिशनरीज को धर्मातरण के सबसे अधिक मौके मिलते है. मध्यप्रदेश, असम, नागालेंड समेत कई राज्यों के बाद आर्य समाज के परम अनुगामी महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनन्य भक्त, दानवीर महाशय धर्मपाल जी सहायता से ‘‘महाशय धर्मपाल (MDH) वेद रिसर्च फाउन्डेशन खोला जा रहा है ताकि धार्मिक असंतुलन से झूझते केरल जैसे प्रान्त से ईसाइयत और दारुल हरम बनाने की साजिश को नाकाम कर वैदिक सन्देश देने के लिए विश्व भर के लिए सत्य सनातन वैदिक धर्म की रक्षा के लिए आचार्य विद्वान पैदा किये जा सके.

उल्लेखनीय है कि केरल में इस वेद रिसर्च संस्थान में वेदों को उनकी यथार्थता एवं पवित्रता के अनुरूप बिना किसी (शब्द) व (स्वर) की त्रुटि के पारम्परिक रूप से पढ़ानें एवं संरक्षित करने के उद्देश्य से पूरी पवित्रता के साथ वेदों के संरक्षण की इस सनातन व अनूठी प्राचीन परम्परा से संस्कृत, मलयालम अंग्रेजी आदि भाषाओं के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है. वैदिक शिक्षा, वैदिक तकनीक, वैदिक विज्ञान, वैदिक समाज, योग, ध्यान आदि विषयों पर शोधपूर्ण कार्य के लिए इस संस्थान का निर्माण किया जा रहा है. वेद भारत की धरोहर है. दुर्भाग्यवश आज वैदिक ज्ञान, वैदिक शिक्षा, वैदिक तकनीक आदि की उपेक्षा भारत में ही हो रही है, जबकि विदेशों में वेद पर शोध हो रहे हैं आर्य समाज के इस प्रयोग से जो नई संस्कृति और विचार लेकर युवा बाहर निकलेंगे निकलेंगे निश्चित रूप से वही इस विश्व को शासित करेंगे, यह हमारा विश्वास है.

विनय आर्य

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