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क्या मदरसों का कायाकल्प जरुरी है ?

देश में इस समय मदरसों को लेकर संग्राम छिड़ा है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार मदरसों के कायाकल्प को लेकर सजग दिख है तो वहीं दूसरी ओर असम में उन मदरसों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है जो देश विरोधी या समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाए गए हैं। तीन मदरसों पर सरकार ने बुलडोजर चलाया तो एक मदरसे को स्थानीय लोगों ने इस आधार पर गिरा दिया कि उसके जरिए आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने का काम होता था।

ऐसे में सवाल उठ रहे है कि आखिर देश में मदरसों की जरूरत किसे है? क्यों कदम दर कदम नये नये मदरसे खुलते जा रहे है? हालाँकि ये ऐसा सवाल है कि इसका जवाब भारत में मिल पाना मुश्किल होगा। क्योंकि यहाँ धर्मनिरपेक्षता का चूरण चाटकर सवाल गोल गोल घुमाये जाते है। लेकिन इस सवाल का जवाब आज से पांच साल पहले पाकिस्तान में मिला था। आठ दिसम्बर, 2017 को बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा में एक यूथ कांफ्रेंस को संबोधित करते हुए पाकिस्तान सेना के प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने इस्लाम की शिक्षा देने वाले मदरसों की अवधारणा पर “फिर से गौर” करने को कहा था कि पाकिस्तान में कुकुरमुत्तों की तरह फैल रहे मदरसे युवाओं में कट्टरपंथ के बीज बो रहे हैं। बाजवा ने इससे भी आगे बढ़ते हुए कहा था कि मदरसे अकसर मस्जिदों के पास बनाये जाते हैं और इनके जरिए धार्मिक कट्टरपंथी अपनी विचारधारा का प्रसार करते हैं। कि जब मदरसे से पढ़कर एक छात्र बाहर की दुनिया में प्रवेश करता हैं तो उसके पास कुरान की आयतों, हदीस की हदीसों के अलावा कुछ नया नहीं होता, उसका बाहर की आधुनिक दुनिया से सामजस्य बैठाना बड़ा मुश्किल होने लगता हैं। ऐसे हालात या तो अब उसे जीने के लिए फिर एक मदरसा चाहिए या फिर छठी सातवीं शताब्दी वाला कथित गौरवशाली इस्लामिक इतिहास।

भारत की बात करें तो केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय के अनुसार, 2018-2019 में देश में कुल मदरसों की संख्या लगभग 24 हजार थी। इनमें तब लगभग 5 हजार मदरसे ऐसे थे, जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं थे। हालांकि ये संख्या सिर्फ उन मदरसों की है, जिन्होंने सरकारी मान्यता हासिल करने के लिए आवेदन किया। अनौपचारिक रूप से तो वैसे देश में लगभग एक लाख मदरसे हो सकते हैं और इनमें भी 30 से 40 हजार मदरसे केवल उत्तर प्रदेश में हैं।

अनुमानित संख्या इससे भी अधिक हो सकती है कारण अगर आप पिछले दिनों दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट देखेंगे तो चौक जायेंगे। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 के बाद नेपाल सीमा से सटे भारतीय क्षेत्र में बिना मान्यता वाले मदरसों की संख्या बढ़ती जा रही है। अकेले सिद्धार्थनगर जिले में वर्ष 2000 में 147 मदरसे थे, इस समय 597 हैं, जिनमें 145 का पंजीकरण नहीं है। महराजगंज जिले में मान्यता वाले 252 मदरसे संचालित हैं लेकिन 84 किमी नेपाल सीमा पर इनकी संख्या इससे डेढ़ गुनी अधिक है।

असल में वैसे तो भारत में तीन तरह के मदरसे हैं। पहले वो जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं और जिन्हें केन्द्र और राज्य सरकारों से फंडिंग मिलती हैं। दूसरे वो जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं लेकिन उन्हें फंडिंग इस्लामिक संस्थाओं और मुस्लिम समुदाय के लोगों से मिलती है। तीसरे मदरसे वो जो ना तो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं और ना ही इन्हें सरकार से फंडिंग मिलती हैं इन्हें आजाद मदरसे कहा जाता हैं।

अगर उत्तर प्रदेश की बात करें तो पहली और दूसरी श्रेणी के मदरसों की संख्या 16 हजार है, जिनमें 20 लाख बच्चे पढ़ते हैं। इनमें 558 मदरसे ऐसे हैं, जिन्हें सरकार से फंडिंग मिलती है। पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने इन मदरसों को 479 करोड़ रुपये दिए हैं। यानी औसतन एक मदरसे को 86 लाख रुपये की फंडिंग सालाना होती है।

अब मुद्दा ये है कि सरकार जिन मदरसों पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, उनका मुख्य उद्देश्य मुस्लिम बच्चों को इस्लामिक शिक्षा देना है। इन मदरसों में 12वीं कक्षा तक पढ़ाई होती है और सरकार से फंडिंग लेने के लिए इन मदरसों को गणित, विज्ञान, भूगोल और अंग्रेजी के विषय की पढ़ाई भी बच्चों को करानी पढ़ती है। लेकिन इसके साथ ही बच्चों की धार्मिक शिक्षा पर ज्यादा जोर दिया जाता है। मदरसों में बच्चों को छोटी उम्र से ही कुरान में कही गई बातों, इस्लामिक कानूनों और इस्लाम से जुड़े दूसरे विषयों के बारे में पढ़ाया जाने लगता है। और इससे कहीं ना कहीं बहुत से बच्चे एक धर्म की शिक्षा तक ही सीमित रहते हैं।

सवाल है कि जब देश का संविधान धर्मनिरपेक्षता की बातें करता है तो फिर सरकार के पैसों पर धार्मिक शिक्षा धर्मनिरपेक्ष कैसे हुई? असल मायनों में धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था स्कूलों में है, जहां बच्चों का धर्म और जाति देकर उन्हें सिलेबस नहीं पढ़ाया जाता। लेकिन मदरसों में ऐसी व्यवस्था नहीं है। बड़ी बात ये है कि भारत में ऐसे मदरसों की सही संख्या का अनुमान लगाना भी मुश्किल है, जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं हैं। यहां बच्चों को सिर्फ इस्लामिक शिक्षा ही दी जाती है।

एक अनुमान के अनुसार, मदरसों में पढ़ने वाले सिर्फ 2 प्रतिशत छात्र ही भविष्य में उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं, जबकि 42 प्रतिशत छात्रों का उद्देश्य भविष्य में मजहब का प्रचार करना होता है। 16 प्रतिशत छात्र शिक्षक मौलवी बनाना चाहते हैं। वो भी अपना मदरसा खोलकर 8 प्रतिशत छात्र मजहब की सेवा करना चाहते हैं, सेवा का मतलब जिहाद से लेकर आतंक तक सब कुछ हो सकता है। जबकि 30 प्रतिशत का मकसद मदरसों से शिक्षा हासिल करने के बाद सामाजिक कार्य करना होता है, मतलब तबलीग से जुड़कर या अन्य तरीको से भी हो सकता है। जबकि 2 प्रतिशत छात्र भविष्य में मजहबी गुरु बनना चाहते हैं। यानी मदरसों से पढ़ने के बाद विज्ञान या टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सफल होने की इच्छा नाम मात्र के छात्रों की होती है।

ऐसे में सवाल है कि जब मदरसों में पढने वाले इन छात्रों को अलग-अलग तरीकों से मजहब की ही सेवा करनी है, मजहब का प्रचार करना है तो क्यों आम भारतियों की मेहनत की कमाई जो वो टेक्स के रूप में सरकारों को देते है क्यों इस पर लुटाया जा रहा है?

भारत कहने के लिए तो एक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन यहां धार्मिक शिक्षा देने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ मदरसों को ही सरकार से फंडिंग मिलती है। देश में संस्कृत स्कूलों को भी सरकार से आर्थिक सहायता मिलती है और कई शिक्षण संस्थानों को भी अलग-अलग श्रेणी में मदद दी जाती है। लेकिन इन संस्थानों और मदरसों में फर्क ये है कि मदरसों की मूल भावना में इस्लाम को ही केन्द्र में रखा जाता है जबकि इन संस्थानों में धार्मिक शिक्षा के साथ साथ अन्य विषयों की पढाई पर भी जोर दिया जाता है। हाँ जो मदरसे आधुनिक होने का दंभ भी भरते तो वहां लगे अत्याधुनिक कम्प्यूटर की हार्डडिस्क में भी मध्यकाल की पुरातन कथा, लाइब्रेरी में गौरवशाली इस्लामिक इतिहास, कुरान-हदीश और अन्य इस्लामिक विद्वानों की पुस्तक ही मिलेगी। आखिर क्या कारण है भारत जैसे विविधता भरे समाज में जिन मदरसों में हिंदी और अंग्रेजी की तालीम के उलट अरबी, फारसी, उर्दू की तालीम दी जा रही है? साथ-साथ तकनीकी प्रशिक्षणों जैसे कंप्यूटर प्रशिक्षण, इंजीनियिरंग, मेडिकल, सीए, वकालत, आदि जैसे अन्य प्रकार के प्रोफेशनल शिक्षा की तालीम नदारद है? सिर्फ दीनी तालीम के भरोसे बैठे लोगों को मदरसे क्या देंगे इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। लेकिन प्रश्न के ये अक्षर जवाब के बजाय गुस्से और तुष्टीकरण की राजनीति से ढक दिए जा रहे है। इस विषयों पर बहसें होती है पर कभी हल नहीं निकलता। इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा मदरसे पाकिस्तान में हैं। वहां 60 हजार से ज्यादा मान्यता प्राप्त मदरसे हैं और इन्हीं मदरसों में तालिबान का कट्टर विचार भी जन्मा है। यानी यहां भारत के लिए सीख ये है कि मजहबी शिक्षा उस आरी की तरह है, जो भारत की मजबूत जड़ों को भी काट सकती है।

BY Rajeev Choudhary

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