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गोरखपुर हादसा जिम्मेदार कौन?

कल परसों हम अपनी स्वतंत्रता का 70 वां जश्न मना रहे थे. लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी जी ने एक बार फिर अच्छा भाषण दिया किन्तु यदि देश की आजादी के 70 वर्ष बाद भी हम अपने नागरिकों को इलाज और दवा समय पर उपलब्ध न करा पाए तो इसका मतलब यह कि आजादी अभी अधूरी है. हालाँकि दुख-सुख तो जीवन भर का मसला है, इनसे किसी के काम में बाधा तो नहीं पड़नी चाहिए. बस हम ख़ुद को यही कहते रह जाते हैं कि इतने बड़े देश में अब किस-किस घटना पर रोएं. हमारे सिस्टम में छोटी-छोटी कमियां रस्सी की तरह बुनते बुनते इतना बड़ा रस्सा बन जाता कि इस रस्से से किसी को भी फांसी दी जा सकती है. खुद की तस्सली के लिए कितने बड़े भी कारण घड ले सब कारण इन हत्यारों के काम ही आते है.

गौरखपुर बी.आर.डी अस्पताल इस महीने शायद इसी वजह से सुर्खियों में आया है. 30 से ज्यादा बच्चों समेत सिस्टम की नाकामयाबी करीब 60 लोगों को लील गयी. विपक्ष की गाज सत्ता पक्ष पर और सत्ता की गाज कुछ अधिकारियों पर गिरकर कुछ दिन बाद लोग मामले को भूल जायेंगे. ष्सब कुछ हो जाएगा. पर उनकी जिंदगी नहीं लौटेगी. जिन्होंने इस लापरवाही में अपने लाडलों को खोया है. अब कुछ भी जांच करवा लें, लेकिन क्या सरकार उस मां के आंसू लौटा पाएगी जिसने अपना बच्चा खोया है. उनकी खुशी लौटा पाएगी. नहीं न?ष्

किसी का अकेला लाल अस्पताल प्रसाशन की लापरवाही से तो किसी के जुड़वाँ बच्चें अब इस दुनिया में नहीं रहे. एक बार फिर साबित हुआ कि समाज हिंसा या प्राकृतिक आपदा से ही नहीं बल्कि लापरवाही के इंजेक्शन से भी मरता है. कुछ बड़े अखबारों में तो यहाँ तक लिखा कि पहले माता पिता को ख़ून, दवाओं और रूई के लिए दौड़ना पड़ा अब उन्हें पोस्टमॉर्टम के लिए दौड़ना पड़ रहा है बस अब है इंतजार है तो अपने बच्चों के डेथ सर्टिफिकेट समय पर मिल जाये. ताकि वो साबित कर सकें की इस अस्पताल प्रसाशन की इस सवेदनहीनता में हमने ही अपने बच्चें खोये है.

योगी सरकार के आक्रामक रुख के कारण गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल में बच्चों की मौत के बाद कार्रवाई शुरू हो गई है. बीआरडी अस्पताल के सुपरिंटेंडेंट और वाइस प्रिंसिपल डॉक्टर कफील खान को हटा दिया गया है. कफील को अस्पताल की सभी ड्यूटी से हटा दिया गया है. डॉ कफील बीआरडी मेडिकल कॉलेज के इन्सेफेलाइटिस डिपार्टमेंट के चीफ नोडल ऑफिसर हैं लेकिन वो मेडिकल कॉलेज से ज्यादा अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस के लिए जाने जाते हैं.

इस बड़े हादसे के बाद जो सच सामने आ रहे है वो हिला देने वाले है ही साथ में यह भी सोचने को मजबूर कर रहे है कि एक छोटे से सरकारी क्लीनिक से लेकर ऊपर बड़े अस्तपालों तक किस कदर भ्रष्टाचार डूबे है. शुरूआती जाँच में मीडिया के हवाले से आरोप है कि कफील खान अस्पताल से ऑक्सीजन सिलेंडर चुराकर अपने निजी क्लीनिक पर इस्तेमाल किया करता थे, जानकारी के मुताबिक कफील और प्रिंसिपल राजीव मिश्रा के बीच गहरी साठगांठ थी और दोनों इस हादसे के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं. हालाँकि राज्य में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भरोसा दिलाया है कि इस अपराध में लिप्त पाए गये लोगों के लिए सजा एक मिसाल बनेगी.

लेकिन सजा से बड़ा सवाल यह है कि आजादी के 70 सालो बाद भी अगर मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए जान गवांनी पड़ती है की वहाँ अच्छा अस्पताल और अच्छे डॉक्टर नहीं है ये तंत्र की बिफलता नहीं तो क्या? ऐसा नहीं है कि देश में अस्तपालों की कमी है आपको हर चंद कदम की दुरी पर एक दो निजी नर्सिंग होम जरुर दिखाई देंगे किन्तु महंगी फीस और महंगे इलाज के कारण अधिकांश लोग इनका खर्चा नहीं उठा पाते. रही सरकारी अस्पताल की बात तो वहां जाना और इलाज कराना इस से बड़ी चुनोती बनकर रह जाती है. सरकारी अस्पताल में जाने से पहले यदि अस्पताल में आपका कोई जानकर नहीं है तो इलाज से पहले लम्बी-लम्बी कतारें आपका इंतजार कर रही होती है. अस्पताल में जाकर डॉक्टर तक पहुंचना सिर्फ आशा और ईश्वर के भरोसे ही होता है. इन 70 सालों में भारत ने खुब तरक्की की कोमन वेल्थ जैसे गेम भी हुए और 2 जी जैसे बड़े घोटाले भी. हर वर्ष आई पी एल में विदेशी खिलाड़ियों पर ऊंची बोलियां भी लगती है जिसमें पैसा पानी की तरह बहाया जाता है इस आपा धापी में देश का वास्तविक विकास कहीं पीछे छूट गया स्कूल कालेज अस्पताल जैसी बुनियादी चीजें भी जनसंख्या के हिसाब से नहीं बड़ सकी शहरों की अपेक्षा ग्रामीण क्षेत्रों का विकास बहुत धीमी गति से हुआ.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने 2 साल पहले भाषण में कहा था कि ये बात सही है देश के सामने समस्याएं अनेक हैं, लेकिन ये हम न भूलें कि अगर समस्याएं हैं तो इस देश के पास सामर्थ्य भी है और जब हम सामर्थ्य की शक्ति को लेकर के चलते हैं, तो समस्याओं से समाधान के रास्ते भी मिल जाते हैं. लेकिन आज सवाल इससे बड़ा यह है कि  तंत्र की बिफलता बदहाल ब्यवस्था का खामियाजा भुगत रहे आम आदमी के साथ ऐसा क्यों होता है, आखिर गोरखपुर जैसे इन घटनाओं में हुई इन मौतो की जिम्मेदारी किसकी बनती है यह भी तय होना जरुरी है?..विनय आर्य

 

 

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