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देवों को मोक्ष की प्राप्ति

नृचक्षसो अनिमिषन्तो अर्हणा बृहद्देवासो अमृतत्वमानशुः। ज्योतीरथा अहिमाया अनागसो दिवो वर्ष्मणं वसते स्वस्तये।। ऋग्वेद 10/63/4

अर्थ-(नृचक्षसः) मनुश्यों को ज्ञान का दर्षन कराने वाले (अनिमिशन्तः) सावधान, सदा जागरूक रहने वाले (अर्हणा) सबके पूज्य, योग्य (देवासः) विद्वान् (बृहत् अमृतत्वम् आनषुः) महान् अमृततत्व-मोक्ष सुख को प्राप्त करते है। (ज्योतिरथाः) देव ज्ञान के रथों पर आरूढ़ रहते हैं (अहिमाया) उनकी बुद्धि क्षीण न होकर ऋतम्भरा प्रज्ञा बन गई हैं (अनागसः) वे सर्वथा निश्पाप हो गये हैं। वे (दिवः वश्र्माणम्) ज्ञान से दीप्त, परम धाम मोक्ष को स्वस्तये कल्याणार्थ (वसते) धारण, आच्छादन करते हैं।
सत्य, अहिंसा, परोपकार और ज्ञानादि गुणों से युक्त देव कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त उनमें मन्त्रोक्त निम्न गुणों की प्रधानता भी रहती है जो उन्हें मोक्ष पद की प्राप्ति तक ले जाती है।
1. नृचक्षसः- देव अन्य लोगों के ज्ञान चक्षुओं का उद्घाटन कर उन्हें भी सत्यमार्ग का पथिक बना देते हैं। उन्हें मनुश्यों की पहचान करनी आती है। योग बल से वे दूसरे के मन की बात भी जान लेते हैं। उनके कृपा-कटाक्ष से कितने ही जनों का उद्धार हो गया है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल जैसे खूंखार डाकू भी उनके दर्षन कर सन्त न गये। षराबी, जुआरी, वेष्यागामी, महता अमीचन्द भक्त अमीचन्द बन गया। ऐसे बहुत सारे उदाहरण है। महर्शि दयानन्द के अन्तिम दर्षन कर नास्तिक गुरुदत्त ऋशि का दीवाना हो गया। ऐसा इसलिये होता है कि उनके नेत्रों से उत्सर्जित प्राण ऊर्जा उनके सम्पर्क में आने वाले और जो उनकी कृपा के पात्र बन गये हैं उनके ज्ञान-चक्षुओं को खोल देती हैं।
2. अनिमिशन्तः- देव सदा जागरूक रहते हैं। उन्हें अपने कर्तव्य का बोध रहता है और वे सांसारिक मोहमाया के बन्धन से मुक्त होने के प्रयास में रहते हैं। वे परोक्षप्रिय होते हैं। जहां असुर इस लोक को ही सत्य मान खाने-पीने और मौज उड़ाने में मस्त रहते हैं वहां देव इस लोक के साथ परलोक अर्थात् अगले जन्म के लिये षुभ कर्मों का आचरण करते हैं। उन्हें अपने गन्तव्य मोक्ष का भी ध्यान रहता है। गीता कहती है-
या निषा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निषा पष्यतो मनुः।। गीता 2.69।।
सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि के समान है, उसमें नित्य-ज्ञान-स्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में योगी जागता है और जिस सांसारिक सुख की प्राप्ति हेतु सब प्रयत्नषील है, परमात्म तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है।
3. अर्हणा- अपने तप, त्याग औश्र सद्गुणों से वे सबके प्रिय बन गये हैं। अहिंसा की सिद्धि से उनके मन में से सब प्राणियों के प्रति वैरभाव की समाप्ति हो गयी है और उसके सम्पर्क में आने वालों का भी हिंसक स्वभाव छूट गया है। सत्य की प्रतिश्ठा से उनकी वाणी अमोघ बन गई है। मन, वचन, कर्म से चोरी का सर्वथा परित्याग करने से सब लोग उन्हें भेंट में विविध वस्तुओं को देने लगे हैं।
4. ज्योतीरथाः- रमण करने के साधन को रथ कहते है। अब वे देव ज्ञान के रथ पर सवार हो आत्मा-परमात्मा का चिन्तन करते हैं। बुद्धि में ज्ञान का प्रकाष हो जाने से इन्हें दिव्य विभूतियों के दर्षन होने लगे है। ज्ञानान्मुक्तिः- मोक्ष की प्राप्ति ज्ञान से होती है। वे जान गये हैं कि चित्त में जो षब्द, स्पर्ष, रूप, रस, गन्ध के विशयों की अनुभूति होती है, उन्हें अज्ञानवष मैं अपने में जान सुखी-दुःखी हो रहा था। मैं षुद्ध-बुद्ध चेतन-स्वभाव-युक्त आत्मा हूँ जिसका इनसे कोई भी सम्बन्ध नहीं है। यह दृष्य अर्थात् भोग और द्रश्टा-भोक्ता आत्मा का परस्पर सम्बन्ध ही बन्धन का कारण है। जब विवेक ज्ञान हो जायेगा तब इस सम्बन्ध की समाप्ति हो मोक्ष ही मिलेगा।
5. अहिमायाः रजोगुण और तमोगुण का आवरण हट जाने से उनकी बुद्धि में सत्व का प्रादुर्भाव हो गया है और सम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति में उनकी बुद्धि ऋतुम्भरा बन गई है जो उन्हें वस्तु का यथार्थ ज्ञान इन्द्रियों के बिना भी करा देती है। ऐसी बहुत-सी अतीन्द्रिय सिद्धियों के वे स्वामी बन गये है।
6. अनागसः वे सर्वथा निश्पाप हो गये हैं। षरीर से किये जाने वाले पाप हिंसा, चोरी और परस्त्रीगमन से वे सर्वथा पृथक हो गये हैं। परस्त्री माता के समान, परधन मिट्टी के सदृष और सभी प्राणियों में अपने जैसी ही आत्मा को जान वे पाप कर्मों से सर्वथा पृथक् और षुद्ध पवित्र बन गये हैं। वाणी से किये जाने वाले पाप-असत्य, चुगली करना, कठोर बोलना, अनर्गल प्रलाप करना उन्होंने छोड़ दिया है। इसी भांति मन से किसी का अनिश्ट चिन्तन, किसी के स्वत्व का ग्रहण और नास्तिक भाव का परित्याग कर दिया है। ज्ञान की अग्नि ने उनके सब पापों को भस्मसात् कर उन्हें पवित्र बना दिया है।
इन गुणों को धारण कर वे दिवो वश्र्माणम् अमृतत्वमानषुः ज्ञान से आलोकित परमपद मोक्ष को प्राप्त हुये हैं। मनुश्य जीवन का कल्याण इसी में है। अयं तु परमो धर्मां यद् योगेनात्म दर्षनम् (याज्ञ.स्म.) योग से आत्मा-परमात्मा का साक्षात्कार ही मानव जीवन का परम कर्तव्य, धर्म है।
यद्यपि अब इन्हें इस संसार में कुछ भी करना षेश नहीं रह गया है परन्तु वे स्वस्तये जनहित के कार्यों में दिनरात संलग्न रहते हैं। जैसे फल आने पर वृक्ष की षाखायें नीचे की ओर झुक जाती हैं वैसे ही अब उनकी विनम्रता बालकों जैसा निरीह, निश्कपट व्यवहार जीवमात्र के ऊपर करूणा दृश्टि और अन्य लोगों को भी मुक्ति पथ का पथिक बनाना ही उनका कार्य है जिसे वे बिना किसी सम्मान की अपेक्षा के करते रहते हैं। इन देवों के दर्षन मात्र से ही मन में समत्व का भाव और सुखद षान्ति की अनुभूति होने लगती है।

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