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नारी का शिक्षित होना नर से कहीं अधिक उपयोगी

जब कोई मनुष्य ईश्वर के निकट बैठ कर उसकी स्तुति करता है तो उस की सब पवित्र मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. जिस व्यक्ति की इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है तो उसे एक विशेष प्रकार की मस्ती का आभास होता है. यह ईश भक्ति का सरूर कहा जा सकता है, नशा कहा जा सकता है. प्रभु प्राप्ति के लिए इस प्रकार के नशे की इच्छा सब भक्त लोग सदा किया करते हैं. इस प्रकार की मस्ती सब लोग पाने की इच्छा करते हैं. ऋग्वेद तथा सामवेद के मन्त्रों मे इस प्रकार की चर्चा मिलती है. :-

तं वरू सखायो मदाय पुनानमभि गायत|

शिशुं  न  यज्ञेरू  स्वदयंत  गूर्तिभी:   ||ऋग्वेद ९.१०५.१ सामवेद ५६९||

प्रभु नाम की खुमारी

मन्त्र प्राणी मात्र के लिए उपदेश करते हुए कह रहा है कि हे मित्रो! ( परमपिता परमात्मा हमारे साथ जो अनेक सम्बन्ध रखता है, उनमें से एक सम्बन्ध मित्र के नाम से भी है, इसलिए ही यहाँ मित्र का संबोधन किया गया है ) वह परमपिता परमात्मा हमें मस्त करने वाला है. (प्रभु नाम के खुमार से हमें खुमारी आ जाती है और हम मस्त हो जाते हैं) वह परमेश्वर सब को पवित्र करने वाला भी है. जब हम उस के गुणों का गान करते हैं तो हम में सदा पवित्र भावनाएं ही प्रवाहित होती हैं. इस प्रकार से हमें मस्त व पवित्र बनाने वाले प्रभु के निकट आसन लगा कर हम ह्रदय व मन से चारों दिशाओं में वेद में आदर्श स्त्री शिक्षा हम अपने गीतों के द्वारा परमपिता के नाम को उसके लिए प्रार्थना रूप गीतों को गाते हुए सब दिशाओं को गुंजा देवें

शुभ कर्मों से उसे प्रसन्न करो

हम जानते हैं कि बालहठ के सामने बड़े बड़े योद्धा भी खड़े नहीं हो पाते.  जब बालक अपने हठ पर डट जाता है तो बड़े बड़े योद्धा भी उससे शांत करने में अपने आप को अक्षम हो जाते हैं. लाख यत्न से, डराने धमकाने से भी वह उस बालक को शांत नहीं कर पाते किन्तु हम उस की इच्छा का कोई खाद्य पदार्थ ( गोली आदि ) दे कर उसके हठ को उसकी प्रसन्नता में बदल सकते हैं.  उस प्रकार ही वह ईश्वर ,जिसे बड़े बड़े भोग्य पदार्थ प्रसन्न नहीं कर सकते,  उसकी प्रसन्नता के लिए हमारा छोटा सा उपाय भी व्यवहारिक सिद्ध होता है और यह उपाय है, हम अत्यंत परिश्रम पूर्वक शुभ कर्म करें. शुभ कर्मों से ही ईश्वर प्रसन्न होते हैं, शुभ कर्मों से ही ईश्वर का आशीर्वाद पाने में हम सफल होते हैं. इसलिए हम सदा शुभ कर्म करते रहें और ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करते रहें.

नारी का शिक्षित होना नर से कहीं अधिक उपयोगी

यह सब करने के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि हमें उन सब विधियों का समुचित ज्ञान हो, जिन विधियों से ईश्वर को प्रसन्न किया जा सकता है.  यह सब विधियां वेद में ही दी हैं.  इसलिए वेद का स्वाध्याय प्रत्येक नर व नारी के लिए आवश्यक होता है किन्तु नर तो व्यवसाय के लिए चले जाते हैं, इस कारण ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति के पश्चात् चिंतन करने के लिए स्वाध्याय कर सकें. अब शेष रह जाती है नारी का तो कार्य ही सर्वकल्याण का होता है, सब के मंगल का होता है. फिर परिवार को सुखी बनाने के कार्य के लिए भी मुख्य भूमिका तो नारी को ही निभानी होती है. इसलिए नारी का शिक्षित होना कहीं अधिक उपयोगी होता है.

परमेश्वर के गुणों का गान

ऊपर हमने बताया है कि सर्वकल्याण के कार्यों को करने का अधिक अधिभार नारी को ही होता है , इसलिए नारी का शिक्षित होना नर से कहीं अधिक उपयोगी होता है तथा गृह – कार्य के पूर्ण होने के पश्चात् उसके पास बहुत सा समय खाली भी रह जाता है.

वेद में आदर्श स्त्री शिक्षा

गुणों का ही गुणगान करे अपितु अपनी शिक्षा को बढाने के लिए उस प्रभु की अमर वाणी वेद का भी नित्य स्वाध्याय करते हुए अपने ज्ञान को पुरुषार्थ पूर्वक बढाये. इस से जब उसके ज्ञान का खजाना भर जावेगा तो वह इस ज्ञान के एश्वर्य को अपने परिजनों में बांटना आरंभ करे, इससे उसका अपना कल्याण तो होता ही है , इसके साथ ही उसके परिजन भी प्रगति मार्ग पर अग्रसर हो कर अपने धन एश्वर्य को बढाने में सफल होते हैं.  यह ही कल्याण का मार्ग है. यह ही उन्नति का एकमात्र मार्ग है. इस मार्ग को निरंतर पकडे  रखना नारी के लिए , माता के लिए आवश्यक होता है. इस मार्ग पर बढे बिना न तो सफलता मिलती है और न ही एश्वर्य, फिर प्रसन्नता का तो प्रश्न ही नहीं और बिना प्रसन्नता के कोई भी कार्य संपन्न नहीं हो सकता. इसलिए हमें सदा परमेश्वर के गुणों का गान करते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ाना चाहिए.

डॉ अशोक आर्य

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