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नेपाल फिर बनेगा हिन्दू राष्ट्र ?

नेपाल में चीन के तलवे चाटने वाले प्रधानमंत्री ओली की सत्ता की डोली अब उठने वाली है, पिछले कुछ दिन से नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग को लेकर देशव्यापी प्रदर्शन किये जा रहे है. नेपाल के सभी प्रमुख शहरों में हजारों लोग सड़कों पर उतर कर देश को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं..

दरअसल, प्रदर्शनकारियों की मांग है कि नेपाल में संघीयता को खारिज कर फिर से राजसंस्था की बहाली की जाए. बिना किसी राजनीतिक दल के सभी स्थानों पर नागरिक समाज बनाकर देश को धर्मनिरपेक्ष के बदले हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाये.. इससे पहले राजशाही के दौरान साल 2008 तक नेपाल एक हिंदू राष्ट्र हुआ करता था. नेपाल में अस्सी प्रतिशत से ज्यादा हिंदू आबादी रहती है.

नेपाल का हिन्दू राष्ट्र से निकलकर सेकुलर और अब फिर हिन्दू राष्ट्र की मांग होना कई चीजों की ओर इशारा कर रहा है. असल में एक शब्द है धर्मनिरपेक्षता इस शब्द का निर्माण हिन्दुओं को समाप्त करने के उद्देश्य से किया गया था. सबसे पहले इस शब्द कहो या कीड़े को आजाद होने के बाद भारत के हिन्दुओं के दिमाग में छोड़ा गया. थोड़े ही दिन बाद इस कीड़े के अंडे और लार्वा बाहर निकलने लगा. फिर ये कीड़े संख्या में बढ़ने लगे और कुछ लोगो ने इन कीड़ों का फायदा उठाना सीख लिया. इसमें ध्यान देने के बात ये है कि भारत सेकुलर देश नहीं है यहाँ सिर्फ हिन्दुओं को सेकुलर बनाया गया. क्योंकि अगर भारत और उसका संविधान सेकुलर होता तो यहाँ मुस्लिमों के लिए अलग से शरिया कानून ना होता.

धर्मांतरण से लेकर लव जिहाद तक जब इस कीड़े को भारत में परम सफलता मिली तो ठीक यही कीड़ा उठाकर पड़ोसी देश के घर में भी डाल दिया गया और वहां का हिन्दू भी सेकुलर बना दिया गया. नेपाल को सेकुलर बनाने के पीछे उद्देश्य क्या था इसे अतीत से कुछ इस तरह समझ सकते है..

नेपाल, हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा खूबसूरत देश, जहां ज्योतिर्लिंग भी है शक्तिपीठ भी है. वर्ष 2011 की सरकारी जनगणना के अनुसार, ईसाई नेपाल की 29 मिलियन की आबादी का 1.5 प्रतिशत से भी कम हिस्सा थे, परंतु रिपोर्ट्स में कई ईसाई समूहों का कहना है कि इस समय देश में ईसाई धर्म को माननेवालों की आबादी 10 लाख पहुंच चुकी है. अगर कुछ साल पहले देखे तो वर्ष 1951 में नेपाल में एक भी ईसाई सूचीबद्ध नहीं था और वर्ष 1961 में सिर्फ 458 लोग ही ईसाई थे. वर्ष 2001 में लगभग 102,000 से अधिक ईसाई हो चुके थे. एक दशक बाद यह संख्या 375,000 से अधिक हो गई जो नेपाल की आबादी का बड़ा हिस्सा बन चूकी है.

ये खेल कुछ इस तरह खेला गया नेपाल में 1990 के दशक में माओवादी ने गृह युद्ध शुरू किया और वर्ष 2008 में राजशाही का अंत हुआ. राजशाही के अंत होने से  यह देश एक हिंदू साम्राज्य से कम्युनिस्ट धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बन गया. और किसी को पता भी नहीं चला ईसाई मिशनरी नेपाल के गांवों तक पहुंच गए, वर्ष 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल जैसे छोटे से देश में उस दौरान तक 8000 से अधिक चर्च मौजूद बन गये थे आज कितने होंगे यह आसानी से समझा जा सकता है. दा गार्जियन की एक खबर से आप समझ सकते है कि भूकंप के बाद मिशनरी संगठनों ने अपने नियंत्रण में लिया और सेवा के नाम पर बड़े स्तर पर धर्मांतरण का खेल खेला.

अब यह बीमारी नेपाल के तमाम अंचलों में तेजी से फैल गई हैं. नेपाल के बुटवल में कई चर्च बन चुके हैं. इसके अलावा नारायण घाट से बीरगंज के बीच कोपवा, मोतीपुर, आदि में हजारों लोगों ने इसाई धर्म स्वीकर कर छोटे छोटे चर्च स्थापित कर लिए हैं. जो अपना धार्मिक कारोबार इतना तेजी से विकसित कर रहे है, यदि इस बीमारी का कारण जाने तो हमें कुछ समय पहले के अतीत में झांक कर देखना होगा जून 2001 में नेपाल के राजमहल में हुए सामूहिक हत्या कांड में राजा, रानी, राजकुमार और राजकुमारियाँ मारे गए थे. उसके बाद राजगद्दी संभाली राजा के भाई ज्ञानेंद्र बीर बिक्रम शाह ने. फरवरी 2005 में राजा ज्ञानेंद्र ने माओवादियों के हिंसक आंदोलन का दमन करने के लिए सत्ता अपने हाथों में ले ली और सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. नेपाल में एक बार फिर जन आंदोलन शुरू हुआ और अंततः राजा को सत्ता जनता के हाथों में सौंपनी पड़ी और संसद को बहाल करना पड़ा संसद ने एक विधेयक पारित करके नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया.2007 में सांवैधानिक संशोधन करके राजतंत्र समाप्त कर दिया गया और नेपाल को संघीय गणतंत्र बना दिया. नेपाल की एकमात्र हिंदू राष्ट्र की चमक जून 2001 के नारायणहिती नरसंहार के बाद खोने लगी थी. अप्रैल 2006 में लोगों की इच्छा के अनुसार राजा की शक्तियों को सीमित कर दिया. और 2008 में सेकुलर कीड़े को संविधान में छोड़ दिया.

जैसे ही ये कीड़ा नेपाल में छोड़ा गया इसका सबसे बड़ा लाभ उठाया एक ईसाई संगठन सी फॉर सी क्लिम्बिंग फॉर क्रिस्ट इस संगठन ने अपना मिशन नेपाल शुरू किया और वर्ष 2011 तक इसने काठमांडू से 25 मील पूर्व में दापचा गांव में पहला चर्च स्थापित किया. आज, केवल 1000 परिवारों की आबादी वाले दपचा गांब में आधे दर्जन से अधिक चर्च हैं. इसी तरह एक दूसरा समूह पेंटेकोस्टल चर्च काम कर रहा है जिसका मुख्य उद्देश्य ही धर्म परिवर्तन करना है, इसने अपने उद्देश्य में ही लिखा है कि इसे 3000 से अधिक चर्च नेपाल में स्थापित करने हैं तथा 6000 से अधिक पादरियों को लोगों के घर घर भेजना है जिससे इनका मकसद पूरा हो सके. यही नहीं इनका मकसद स्कूल और कॉलेजों की स्थापना करना भी है जहां से ये दीक्षा दे सके. फिलहाल ये मिशनरी वहां के मगर, गुरुंग, लिंबू, राई, खार्की और विश्वकर्मा जातियों को अपना टार्गेट बना रही है.

इस एक  मात्र हिन्दू राष्ट्र के सेकुलर बनने के बाद यूरोप की ईसाइयत खुला शिकार मिल गया है यह सब जान गये है कि धार्मिक रूप संम्पन नेपाल आर्थिक रूप से उतना धनी नहीं है. यहाँ अभी भी बड़ी संख्या में गरीब और अशिक्षित लोग है. देवीय चमत्कार में भरोसा करना या यह कहो अंधविश्वास आदि का प्रभाव सामाजिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित करता है. वहां के बुद्धिजीवियों में चिंता व्याप्त है। वहां के समाज विज्ञानी रमेश गुरंग की मानें तो,  इसाई आबादी बढ़ने का यह सिलसिला अगर बना रहा, तो आने वाले 50 सालों में वहां हिंदू और बौद्ध आबादी अल्पसंख्यक होकर रह जायेगी. ऐसे में सिर्फ एक ही सवाल पैदा होता है यदि दुबारा हिन्दुत्व यहाँ कायम हुआ तो नेपाल महात्मा गांधी के हिंदुत्व को अपनाएगा या नाथूराम गोडसे और वीर सावरकर के हिंदुत्व को स्वीकार करेगा? खैर नेपाल के लोगों अब अक्ल आई तो लोगों ने ये सेकुलरिज्म कीड़ा भगाने के प्रयास शुरू कर दिए आन्दोलन और मांग के रूप काला हीट प्रयोग करना शुरू कर दिया है इस कारण वहां अब सेकुलर कीड़े बिलबिलाने लगे है किन्तु अब एक बार फिर बढती ईसाइयत के चलते हिन्दू राष्ट्र की मांग उठना अपने आप में कुछ सवाल खड़े कर रहा है कि आखिर नेपाल कब तक धर्मनिरपेक्ष बना रहेगा?  वेटिकन के पॉप के अधीन आने तक? क्या भविष्य के नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर की जगह किसी यूरोपीय पादरी के नाम पर चर्च होगा सवाल ये भी है कि बुद्ध की भूमि पर जीसस के गीत कब तक गुनगुनाये जायेंगे क्या जिस नेपाल ने कभी किसी की राजनेतिक गुलामी नहीं की अब कहीं वो वेटिकन की धार्मिक गुलामी करने जा रहा है या फिर नेपाल के लोग फिर से नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बना पाएंगे?

Rajeev Choudhary

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