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पेरियार सिर्फ सनातन संस्कृति का विरोधी था

राजनीति में धर्म का तड़का हो या फिर देवी देवताओं का अपमान। देश की सियासत में ये नया बिलकुल नहीं है. उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक समय समय पर कई लोग आये एक विशेष तबके को खुश करने के लिए हिन्दुओं के अराध्य देवी देवताओं का अपमान कर अपनी राजनीति के फर्श को खूब चमकाने की कोशिश की। अभिनेता से नेता बने रजनीकांत ने दक्षिण भारत में बौधिक आतंकवाद के जन्मदाता पेरियार पर हमला करते हुए कहा कि पेरियार ने 1971 में सलेम में आयोजित एक रैली में भगवान राम और सीता की वस्त्रहीन तस्वीरों का इस्तेमाल किया था। पेरियार हिंदू देवताओं के कट्टर आलोचक थे। लेकिन उस समय किसी ने पेरियार आलोचना नहीं की जबकि पेरियार ने उन मूर्तियों को चप्पल की माला भी पहनाई थी।

जब पेरियार ने यह सब किया तो उस समय देश में एक भी एफआईआर या कोई तहरीर पेरियार के खिलाफ लिखी गयी। जबकि आज इस मामले से पर्दा उठाने वाले रजनीकांत पर तमिलनाडु की मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके ने आईपीसी की धारा 153 (ए) के तहत मामला दर्ज  कराया है। हालाँकि रजनीकांत ने माफी मांगने से इंकार कर दिया है और इस मामले में सबसे बड़ी बात ये रही कि कभी रजनीकांत के आलोचक रहे सुब्रह्मण्यम स्वामी रजनीकांत के साथ आ खड़े हो गए हैं।

अगर वामपंथियों की लीला देखें तो ये लोग किस तरह पेरियार जैसे सनकी, बौद्धिक रूप से समाप्त व्यक्ति को नायक बना देते है, बल्कि महानायक बना देते है। मार्क्सवादी वामपंथी कलमकार ऐसे लोगों का नामकारण कुछ यूँ करते है कि इन्हें दलित, चिन्तक दलित विचारक, नारीवादी तथा सामाजिक कार्यकर्ता लिखा जाने लगता है। जबकि पेरियार ने जिस जस्टिस पार्टी का गठन किया था उसका मूल सिद्धांत स्वाभिमानी हिन्दुत्व समाज का विरोध था। जबकि यह सबसे बड़ी साम्प्रदायिकता थी।

जो पेरियार आज टुकड़े-टुकड़े गैंग का कुल देवता क्यों बना हुआ है क्योंकि कभी ये भी इस भारत के टुकड़े टुकड़े करना चाहता था और एक द्रविड़स्तान बनाना चाहता था। अगर पेरियार का किस्सा पूरा समझे तो कुछ यूँ है कि इरोड वेंकट नायकर रामासामी जिसे लोग पेरियार के नाम से जानते है, कभी ये महात्मा गांधी के शिष्य रहे थे। शायद यही से इन्होने हिन्दुत्व का विरोध सीखा हो? बताया जाता है एक बार जब ये जवान थे काशी विश्वनाथ के मंदिर में उन्हें प्रसाद देने से मना कर दिया तो सिर्फ इस कारण यह हिन्दू धर्म से नफरत करने लगे थे। समझिये सिर्फ इतनी सी बात पर नफरत!

अगर किसी परिवार में एक आदमी गलत है क्या इस कारण पूरे परिवार से नफरत करेंगे या उसे सुधारने की दिशा में काम करेंगे? वैदिक संस्कृति असंख्य वर्षों पुरानी है समय के साथ कुरुतियाँ आना स्वभाविक है, जब मूर्ति पूजा पर स्वामी दयानन्द ने देखा तो उन्होंने अपने धर्म से अपने लोगों से नफरत नहीं की बल्कि एक जागरूक आन्दोलन चलाया। लोगों को सही राह पर लाये अपनी असली संस्कृति का बौद्ध कराया। क्योंकि स्वामी जी जानते थे कि अंधविश्वास हो या जाति-प्रथा या छुआछुत इनके खिलाफ लड़ाई जरुरी है लेकिन वह काम ईश्वर और धर्म में विश्वास रखकर भी हो सकता है।  दूसरा मिसाल के तौर पर डॉ अम्बेडकर ने कहा था कि भारत में धर्म ही उसकी आत्मा है और सारे सामाजिक सुधार धर्म की सहायता से ही होंगे। लेकिन इसके उलट पेरियार और उनके चेले पहले धर्म को समाप्त करना चाहते वो भी सिर्फ हिन्दू धर्म को, इस्लाम और ईसाई मत का कोई विरोध नहीं किया। जबकि स्वामी श्रद्धानन्द जी ने कन्या शिक्षा से लेकर छुआछुत व दलितोंउद्धार किया लेकिन अपने धर्म का विरोध नहीं किया।

पेरियार ने नारा दिया कि सांप और ब्राह्मण जहाँ दिखे पहले ब्राह्मण को मारों। लेकिन इसके बाद पेरियार और उनके भक्तो के लिए रावण देवता बन जाता है और श्री राम जी अपमान। एक समय खुद पेरियार और उनके समर्थक रामायण को झूठ और ब्राह्मणों की कल्पना बताते थे लेकिन फिर कहते थे कि रावण एक द्रविड़ राजा था वह शुद्र था और उसकी हत्या राम द्वारा उसकी कर दी गयी। सन 1974 को पेरियार की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी मनाम्मई  ने राम लीला के विरोध में रावण लीला का ढोंग किया और बाद में राम लक्षमण और सीता की मूर्तियां जलाई और कहा द्रविड़ियन राजाओं की आर्यन राजाओं द्वारा हत्या का हम विरोध करते हैं। जबकि मनाम्मई के बारे में कहा जाता है कि पेरियार द्वारा गोद ली गयी बेटी पर बाद में इसे से शादी रचा ली।

असल में पेरियार, वामपंथी, वामन मेश्राम की बामसेफ समेत आज ये कई गिरोह इस हिन्दुस्तान में ऐसे पैदा हो गये जिन्होंने अपनी सोचने की क्षमता इतनी खो दी कि अब इनके लिए किराये के लोग सोच रहे है कि ये लोग क्या बोले। एक दिन कहते है धर्म अफीम है अगले दिन कहते है दलितों तुम बौद्ध धर्म अपना लो। इनके बयान सुनकर लगता है जैसे यह लोग खुद गांजे का सेवन करते हो। इनके चेलों की करामात देखिये एक ओर ये लोग कहते है की बाबा साहब आंबेडकर और पेरियार बहुत अच्छे मित्र थे। दोनों का लक्ष्य एक था। लेकिन जहाँ आंबेडकर जी ने संविधान बनाकर इस देश को दिया। दूसरी ओर पेरियार और उनके चेलों ने 1957 में संविधान की प्रतियां ये कहते हुए जलाई थी कि यह आज भी जातिवाद को जिंदा रखे हुए है। हालांकि यही संविधान सबको समान अधिकार देता है इसी संविधान के तहत दलितों को आरक्षण भी मिला और मताधिकार भी जिसे वे अपने नेताओं को अपनी आवाज बनाकर संसद भेज सकें, जिससे आगे उनका ही फायदा हुआ लेकिन पेरियार ने संविधान जलाकर आंबेडकर जी का भी अपमान किया और देश विरोधी काम भी किया था।

1924 में पेरियार ने कहा था कि रामायण और भागवत गीता दोनों जातिवाद को बढ़ावा देती है, जबकि यह सच नहीं है क्योंकि, रामायण में राम एक शूद्र औरत सबरी के साथ बैठकर बेर खाकर उसे सम्मान देते हैं और गीता में वर्णव्यस्था की सही सोच दर्शाई गयी है जिसमें साफ लिखा है कि इंसान का वर्ण उसकी काबिलियत से तय होगा। इसी से इनकी सोच समझी जा सकती है कि वैदिक धर्म और संस्कृति की समझ इन लोगों कि न्यून थी इसी कारण इन लोगों ने अपने जैसे लोग पकड़े और विरोध को अपनी आजीविका बना डाला। कुरीतियो का विरोध करो धर्म का विरोध गलत है और देश में फैली हुई बुराई का विरोध करो देश का विरोध गलत है। हो सकता है पेरियार ने एक आध कोई अच्छा कार्य किया हो लेकिन उनकी लिखी किताब सच्ची रामायण और उनके आन्दोलन से लगता है कि एक सत्ता का लालची सनकी ही ऐसा लिख सकता है।

RAJEEV CHOUDHARY

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