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फिर गूंजा 26 आयत का किस्सा

राजीव चौधरी

साल था 1963 जर्मनी के एक लेखक थे कर्ट फ्रिस्च्लर इन्होने एक किताब लिखी आयशा बैरी एंड रॉकलिफ पब्लिकेशन ने इसे प्रकाशित किया ये पुस्तक इस्लामी नबी की एक पत्नी आयशा के ऊपर लिखी गई थी। हालाँकि इसका असली वर्जन जर्मन भाषा में था। किताब का पूरा नाम था आयशा मुहम्मद की सबसे पसंदीदा बीवी, जैसे ही यह पुस्तक बाजार में आई इस पर बहस हुई कि ये मुस्लिमों की भावनाओं को आहत करने वाली किताब है। मुहम्मद की पत्नी आयशा की कम उम्र होने की बात पर काफी विवाद पहले भी हुए हैं। इस किताब को बैन किया गया और इसके आयात पर भी पाबंदी लगा दी गयी।

आयशा पुस्तक को बेन इसलिए किया गया क्योंकि इससे उनकी भावनाएं आहत हुई थी, भावनाएं यानि इनके मन की एक धारणा जिसे आस्था से दिन में पांच बार महीने में 150 बार और साल में 1825 बार मजबूत किया जाता है जिसमें शुक्रवार को स्पेशल डोज दी जाती है, वो भावना आहत हो गयी।  इतने ही ग्रैंड लेवल का एग्रेशन होता है मुस्लिम समाज में। जहां कहीं भी इस्लाम का मसला आ जाता है, भावुकता के नाम पर हिंसक हो जाते है, अब हिंसक ना हो इसके लिए अब शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने कुरान की 26 आयतों को हटाने से संबंधित एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है।  इसके साथ ही रिजवी ने कुछ आयतों को आतंकवाद को बढ़ावा देने बताया है। उनका दावा है कि ये आयतें कुरान में बाद में शामिल की गई हैं। वसीम रिजवी के इस कदम से मुस्लिम समाज का भावुकता के नाम पर गुस्सा  भड़क गया है, कोई एक राहत मोलाई कोमी एकता संगठन है उसकी ओर से उसके पूर्व अध्यक्ष अमीरुल हसन ने वसीम रिजवी का सिर काटककर लाने वाले को 11 लाख रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है।

यानि आयतें ना हटाये जाने के विरोध में मुस्लिम समाज का एक बड़ा हिस्सा खड़ा हो गया है, ऐसे में सवाल उठ जाता है कि ये आयतें क्या है और इनसे इन लोगों को क्या लाभ है। पहले आयतें सुन लीजिये, हालाँकि इन आयतों को बोलने का एक किस्म से पेटेंट मौलाना लिए बैठे है वो बोले तो इस्लाम का प्रचार अगर कोई उनके अलावा इनकी व्याख्या करने की कोशिश करें तो भावना आहत हो जाती है।और  जब जब भावना आहत होती है तो फिर अमीरुल हसन खड़ा होकर वसीम रिजवी जैसे उदार मुसलमान का सिर काटककर लाने वाले को 11 लाख रुपए का इनाम देने का ऐलान कर देता है।

पर जब इन आयतों को देखते है तो सवाल खड़ा होता है कि आज के युग में इन आयतों का क्या रोल है या इनकी क्या और किसे जरूरत है? जैसे एक आयत में लिखा है कि फिर, जब हुरमत (रमजान ) के महीने बीत जाऐं तो मुश्रिको  को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घातकी जगह उनकी ताक में बैठो फिर यदि वे तौबा कर लें नमाज कायम करें और, जकात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। निःसंदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है। एक आयत है हे ईमान लाने वालो! मुश्रिक  यानि मूर्तिपूजक नापाक हैं, इसके अलावा एक और आयत है निःसंदेह काफिर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं, यही नहीं कुछ और भी आयत है जैसे हे ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) उन काफिरों से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं और चाहिए कि वे तुममें सखती पायें।

आगे देखें तो एक और भी आयत है जो कहती है जिन लोगों ने हमारी आयतों  का इन्कार किया, उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे, जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें, मसलन ऐसी ऐसी करीब 24 से 26 आयतें है जिन्हें पढ़कर कोई भी इन्सान अपने मूल स्वभाव से अलग हटकर हिंसक हो सकता है या वो हिंसा कर सकता है। शायद इसी कारण काइरो विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर हसन हनाफी ने एक बार इसे इस प्रकार कहा था कि मुसलमानों के नजर में कुरान एक सुपरमार्केट है जहाँ से जिसे जो चाहिये वह उठा लेता है और जो नहीं चाहिये वह छोड देता है। आतंकी संगठन भी यही से शिक्षा लेते है और सूफी भी वहाबी भी इसी से सीखते है और शिया भी।

शायद यही कारण है कि पिछले दिनों चाइना ने अपने देश के मुसलमानों को अपनी नमाज की चटाई और कुरान की प्रतियां सौंपने का आदेश दिया था। डेली मेल के मुताबिक, चेतावनी दी गई थी कि अगर बाद में चटाई और कुरान पाई गईं तो गंभीर सजा दी जाएगी. इससे पहले शिनजियांग के अधिकारियों ने पांच साल पहले प्रकाशित हुई सभी कुरानों को हटाना शुरू कर दिया था, जिनमें इन 26 आयतों को उग्रवादी सामग्री बताया था।

यही नहीं साल 2012 में तालिबान लड़ाकों द्वारा अफगानिस्तान में हर रोज मासूम लोगों की हत्या से दुखी होकर अफगानिस्तान और विदेशी सैन्य बलों की ओर से कथित तौर पर कुरान की प्रतियां जलाई गयी थी उनका दावा था कि यही वो आयतें है जो लोगों को हिंसा करने के लिए उकसा रही है। हालाँकि इसके बाद वहां बड़े तौर पर विरोध प्रदर्शन का दौर चला था। हालाँकि कुछ समय पहले अखिल भारत हिन्दू महासभा के तत्कालीन उपप्रधान इन्द्रसेन शर्मा जी ने कुरान की इन आयतों के पम्पलेट बटवाए थे, तब एक मुस्लिम बंधू ने उनके खिलाफ कोर्ट में याचिका डाल दी, तब उनका जवाब था कि जैसे आयत है कि फिर, जब हराम के महीने बीत जाएं तो मुशरिकों यानि मूर्ति की पूजा करने वालों  को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो नि:संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है।

मसलन जो हिंसक नहीं है हमलावर नहीं है उसको उकसाना उसके बाद लिख दिया नि:संदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है, तो क्या पहले अल्लाह क़त्ल करवाता है फिर दया वान और क्षमाशील भी बन जाता है? अब जो दयावान है वह हिंसक नहीं हो सकता और जो हिंसा के लिए उकसाता है वह कैसे दयावान हो सकता है? ये सवाल भी आधुनिक समाज में खड़ा होता है।

दरअसल अगर देखा जाये तो छठी सातवीं सदी में अरब में कबीलाई समाज था, जिसमें रहने वाले लोगों के अपने रीति रिवाज थे। पढ़े लिखे लोग नहीं थे कबीलों में रहते थे अधिकांश लूटपाट का कार्य था।  अचानक वहां इस्लाम के राजनीतिक विचारों को धार्मिकता का जामा पहनाकर कुरान के नियम इन कबिलाई समाज को संचालित करने लगे। यह रहस्य भी किसी से छिपा नहीं है कि इन तरीकों को थोपने या अपनाने के लिए हिंसा का भी इस्तेमाल किया जैसे कि वर्तमान में तालिबान, अल-शबाब, बोको हरम, इस्लामिक स्टेट समेत अन्य कट्टर आतंकी इस्लामिक संगठन इसी सातवीं शताब्दी के इस्लाम को आधुनिक दुनिया के ऊपर थोपने में हिंसा का रास्ता अपनाने से नहीं चूक रहे है।

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