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भगवान श्रीकृष्ण जी को सूली पर किसने चढ़ाया ?

पहली तश्वीर में भगवान श्रीकृष्ण जी क्रोस लिए खड़े है दूसरी में बैठे है और तीसरी तश्वीर में भगवान श्रीकृष्ण जी को ही सूली पर लटका दिया गया है, मतलब ईसाई पिछले 2500 सौ सालों से जो ईसाई जीसस को सूली से नहीं उतार पाए अब उन्होंने योगिराज भगवान श्रीकृष्ण जी को भी सूली पर चढ़ा दिया है, भगवान श्रीकृष्ण जी को सूली पर लटकाने का इनका उद्देश्य साफ है कि इस तस्वीर को दिखाकर ना जाने कितने भोले भाले आदिवासि भाई बहनों को ये लोग जीसस की सूली पर चढ़ाएंगे.

असल में जिसे हम आज झारखंड कहते है, एक समय यह बिहार का हिस्सा था, उस दौरान मिशनरीज ने एक अफवाह फैलाई कि आदिवासी हिन्दू नहीं बल्कि ईसाई है, उस समय कार्तिक उरांव नाम के एक प्रसिद्ध नेता हुआ करते थे राजनीती में उनका कद इंदिरा के समान था कार्तिक जी को आदिवासियों का मसीहा भी कहा जाता है, तो कार्तिक उरांव जी ने इसका बड़ा विरोध किया क्योंकि बिहार में उस दौरान मिशनरीज आदिवासियों को मूलनिवासी की घुट्टी पिलाना शुरू कर चुकी थी, तब कार्तिक जी ने सवाल उठाया कि पहले सरकार इस बात को सुनिश्चित करे कि बाहर से कौन आया था?  यदि हम यहाँ के मूलवासी हैं तो फिर हम ईसाई कैसे हुए..? क्योंकि ईसाई पन्थ तो यूरोप से निकला है, और यदि हम ईसाईयत को लेकर बाहर से आये है तो फिर हम यहाँ के मूलनिवासी नहीं है, आर्य ही यहाँ के मूलनिवासी है क्योंकि जिनका विस्वास यहाँ के वैदिक धर्म पर है वही यहाँ का मूलनिवासी है, इतना कहकर कार्तिक ने एक सवाल उछाला था कि यदि हम ही बाहर से आये तो फिर जीसस के जन्म से हजारों वर्ष पहले हमारे समुदाय में निषादराज, महर्षि बाल्मीकि, शबरी, कणप्पा उनका धर्म क्या था? क्या वह ईसाई थे मिशनरीज इस बात का जवाब दे कि जीसस से पहले उनका धर्म क्या था? इसके बाद कार्तिक उराव जी ने कहा था कि हम सदैव हिन्दू थे हिन्दू है और हिन्दू रहेंगे.

इसके बाद कार्तिक उराव जी ने बिना किसी पूर्व सूचना एवं तैयारी के भारत के भिन्न भिन्न कोनों से वनवासियों आदिवासियों के बुजुर्ग लोगों, वृद्ध तथा जादू टोना भगतों को बुलाया और यह कहा कि आप अपने जन्मोत्सव, विवाह आदि में जो लोकगीत गाते हैं उन्हें गाकर सुनाइए और फिर वहां सैकड़ों गीत गाये गए और सब लोकगीतों में यही वर्णन मिला कि यशोदा जी बालकृष्ण को पालना झुला रही हैं, सीता माता राम जी को पुष्पवाटिका में निहार रही हैं, कौशल्या जी राम जी को दूध पिला रही हैं, कृष्ण जी रुक्मिणी से परिहास कर रहे हैं, आदि आदि, साथ ही उरांव जी यह भी कहा कि हम एकादशी को अन्न नहीं खाते, जगन्नाथ भगवान की रथयात्रा, विजयादशमी, रामनवमी, रक्षाबन्धन, देवोत्थान जिसे उत्तर भारत में देव उठान भी बोला जाता है, होली, दीपावली आदि बड़े धूमधाम से मनाते हैं, तो हम ईस्टर क्यों मनाये.?

कार्तिक उराव जी यहाँ ही नहीं रुके उन्होंने वहां बैठी मिशनरीज से पूछा यदि हम ईसाई है तो यहाँ बैठा एक भी व्यक्ति कोई ऐसा गीत गा दे कि जिसमें मरियम ईसा को पालना झुला रही हो, और यह गीत हमारे परम्परा में प्राचीन काल से हहो है तो मैं अभी का अभी ईसाई बन जाऊंगा, अंत में उरांव जी कहा कि मैं वनवासियों के उरांव समुदाय से हूँ, हनुमानजी हमारे आदिगुरु हैं हम हिन्दू ही पैदा हुए है और हिन्दू ही मरेंगे, ना कि ईसाई बनकर जमीन में गाड़े जायेंगे.

कार्तिक उरांव जी अब नहीं रहे इसी का फायदा झारखण्ड जैसे राज्यों में जमकर उठाया जा रहा है, मिशनरीज ने कृष्ण जी को जीसस बनाकर सूली पर लटका दिया, माता मरियम के मंदिर बना डाले, और जीसस को आदिवासी जैसा दिखने वाला बनाकर नये रंग, नये रूप में रखकर बेच दिया. अभी तक इस काम के लिए विदेशों से मिशनरी लोग बुलाये जाते थे, वो यहाँ आकर जीसस का बखान करते थे किन्तु अब मुंबई के लोनावाला में बीटीसीपी यानि बाइबल ट्रेनिग सेंटर पास्टर खोला गया है, यहाँ एक से छरू महीने में धर्मांतरण करने के तरीके सिखाये जाते है, इसके बाद अपनों के खिलाफ अपने उतार दिए जाते है, हिन्दुओं से ही हिन्दुओं को कोसना, अपने भगवान महापुरुषों राम और श्रीकृष्ण को अपशब्द बकना सिखाया जाता है,

असल में ये एक हवा एक लहर होती है जो लहर आज ईसाई बनाने की भारत में दिखाई दे रही है कभी ये लहर दक्षिण कोरिया में भी चली थी 1940 के दशक में, दक्षिण कोरिया में सिर्फ 2 प्रतिशत ईसाई थे, 2014 में, ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या वहां 30 प्रतिशत से अधिक हो गई यानी कि तीन पीढ़ियों के अंतराल में 15 गुना वृद्धि, लेकिन अचानक, वहां के युवाओं ने इनका पाखंड झूट देखा पादरियों द्वारा किया जा रहा यौन शोषण देखा तो किनारा कर लिया और चर्च में जाना बंद कर दिया. आज वहां से झोला उठाकर ये लोग भारत नेपाल और म्यांमार जैसे देशों में निकल लिए.

निकल क्यों लिए क्योंकि हम लोग अहिंसा प्रेम दया मानवता सर्व धर्म समभाव में विश्वास करते है और वसुधैव कुटुम्बकम मतलब सारी दुनिया एक परिवार है जैसा हमारा नारा है जबकि अतीत की तो हम नहीं कहते लेकिन अब इस नारे ने हमें सबसे अधिक कमजोर किया, आंबेडकर जी ने कहा था कि मुस्लिम सिर्फ मुस्लिम को अपना भाई मानता है, दूसरों को नहीं, गीता में भी लिखा है कि धर्म की हानि करने वाला कभी अपना नहीं होता एक समय अर्जुन के मन में भी यही वसुधैव कुटुम्बकम वाली भावना खड़ी हो गयी थी कि ये तो मेरा परिवार है लेकिन भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन की इस कमजोरी को दूर किया और बताया कि धर्म को हानि करने वाले कभी अपने नही होते,

आज देखो क्या कोई मुस्लिम या ईसाई वसुधैव कुटुम्बकम का पालन करता है? इसलिए वसुधैव कुटुम्बकम एक सद्भाव का नारा हो सकता है, रणनीति नहीं, परिवार की भावनाओं का अभ्यास करना ठीक है किन्तु जब तक संबंधित व्यक्ति परिवार की तरह व्यवहार करता हो न कि तब जब वह आपको लूटने की योजना बना रहा हो, जैसे ये लोग आज लव जिहाद धर्मांतरण का कुचक्र रच रहे है और हम फालतू का नारा वसुधैव कुटुम्बकम लेकर बैठे रहे क्या ओचित्य है इस नारे का..?

इसके बाद कहा जाता है कि सब धर्म बराबर है जब सब धर्म बराबर है तो धर्मांतरण पर कानून आने पर मिशनरीज बिलबिला क्यों जाती है, जब सब धर्म बराबर है तो वेटिकन सिटी और मक्का में मंदिर क्यों नहीं है.? जैसे अयोध्या काशी मथुरा में चर्च और मस्जिद खड़ी है इसी तरह वहां भी मंदिर बनने चाहिए कि नहीं बनने चाहिए..?

इसका कोई जवाब नहीं आएगा ऐसे सवाल अगर हिन्दू करता है तो उनकी धार्मिक भावना को ठेस पहुँच जाती है और बहुसंख्यक वर्ग को साम्प्रदायिक कह दिया जाता है.

असल में बहुत पहले वेरियर एल्विन नाम का एक मिशनरीज भारत आया था वेरियर एक धर्मनिष्ठ ईसाई थे और एक मिशनरी के रूप में औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था, वे 1927 में एक मिशनरी के रूप में भारत आए थे तथा पुणे में क्रिश्चियन सर्विस सोसाइटी में शामिल हुए, वेरियर एल्विन ने लिखा कि जब मैं तेरह साल पहले पहली बार आदिवासीयों के संपर्क में आया था, तो मुझे यह लगता था कि ये आदिवासी हिंदू नहीं थे। परंतु आठ वर्षों के कठिन अध्ययन और शोध ने मुझे आश्वस्त किया है कि मैं गलत था. आदिवासियों के अन्दर बहुत गहरे तक हिन्दू धर्म जुडा हुआ है वो वेदों को मानने वाले लोग है लेकिन शिक्षा के अभाव और गरीबी के कारण ईसाई मिशनरीज उन्हें उनके मूल धर्म से अलग करने का काम कर रही है..

हालाँकि सब जगह ऐसा नहीं है जब कुछ समय पहले जब अंडमान निकोबार के द्वीप समूह के उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर सेंटिनल जनजाति समुदाय के लोगों ने अपने क्षेत्र में घुस रहे एक अमेरिकी ईसाई धर्म प्रचारक को तीर से मार डाला था. असल में सेंटिनल जनजाति के लोग अपने द्वीप पर किसी बाहरी को आने नहीं देते और अगर कोई बाहरी व्यक्ति अपनी वाँछित मर्यादा का उल्लंघन कर यहां आ भी जाए तो इस जनजाति के लोग उसे तीर की सहायता से मार देते हैं, इनके यहाँ कोई भाषाई जवाब नहीं है, न इनके यहाँ धर्मनिरपेक्षता के खोखले सिद्धांत, यह एक जनजाति है जिसकी अपनी परम्परा और संस्कृति है जिसकी रक्षा ये लोग तीर की सहायता से करते आये हैं. लेकिन इसके विपरीत आज कुछ जगह भगवान श्रीकृष्ण को सूली पर लटकाकर और माता मरियम के मंदिर बनाकर भोले भाले आदिवासियों का धार्मिक शोषण ये लोग कर रहे है..

लेख-राजीव चौधरी

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