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महाशय धर्मपाल: उड़ चला हंस उस देश 98 वर्ष की आयु में अमर हुई आत्मा

यूँ तो इस पृथ्वी पर हर वक्त अरबों जीव जन्म लेते हैं और अरबों जीव शरीर त्याग देते हैं, लेकिन इन सब में एक कोई ऐसा होता है जो प्रेम सदाचार सदगुण और प्रेरणा का सितारा बन जाता है. जीवन के 98 बंसत देखने वाले महाशय धर्मपाल जी आज भले ही हमारे बीच न हो पर ये बुलंद सितारा समाज सेवा के एक के बाद एक आदर्श प्रस्तुत करते हुए हमेशा टिमटिमाता रहेगा.

आज दुनिया में एमडीएच मसालों का नाम लेते ही हर कोई कह उठता है असली मसाले सच सच एमडीएच अपनी शुद्धता और स्वाद के लिए प्रसिद्ध इस मसाला कम्पनी के मालिक महाशय जी को दुनिया जानती है लेकिन क्या आपको मालूम है कि उनका यहाँ तक पहुंचने का सफर कितना चुनौतीपूर्ण रहा. आखिर कैसे 5वीं फेल एक साधारण से इन्सान ने पूरी दुनिया को अपने काम और मेहनत के बल पर जीत लिया.

27 मार्च 1923 सियालकोट जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है को महाशय चुन्नीलाल और माता चानन देवी के घर एक पुत्र का जन्म हुआ नाम रखा गया धर्मपाल यानि धर्म का पालन करने वाला और यही बालक आगे चलकर बना महाशय धर्मपाल गुलाटी लेकिन इस नाम के पीछे बड़ी लंबी कहानी है. कोई व्यक्ति एक दिन में ही इतना बड़ा नहीं हो जाता कि उसके बड़प्पन के आगे सारी दुनिया सिर झुकाये. बड़ा होने के लिए काफी बड़े संघर्ष भी करने पड़ते हैं. महाशय धर्मपाल गुलाटी ने अपने जीवन में होने वाले उतार-चढ़ाव को कभी किसी से छुपाया नहीं. नकारात्मक परिस्थितियों ने उन्हें कभी भी विचलित नहीं किया और उनकी यही सोच थी, कि वे सिर्फ सफलता की राह पर आगे बढ़ते रहे. आज उनकी बदौलत हिन्दुस्तान की आधी से ज्यादा आबादी के घरों की रसोईयां महकती हैं.

इनके पिताजी की इच्छा थी कि ये खूब पढ़ें-लिखे, महाशय जी के पिता उन्हें बहुत समझाते थे, लेकिन फिर भी महाशय जी का ध्यान पढ़ाई में कभी नहीं लगा. जैसे-तैसे इन्होंने चैथी कक्षा तो पास कर ली लेकिन पांचवी कक्षा में फेल हो गये, इसके बाद से महाशय जी ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया. पिताजी ने इन्हें एक बढ़ई की दुकान में लगवा दिया जिससे कि ये कुछ काम सीख सकें लेकिन कुछ दिन बाद काम में मन न लगने की वजह से महाशय जी ने काम छोड़ दिया. धीरे-धीरे बहुत सारे काम करते-छोड़ते वो 15 वर्ष के हो चुके थे अब तक वो करीब 50 काम छोड़ चुके थे. उन दिनों सियालकोट लाल मिर्च के लिए बहुत प्रसिद्द हुआ करता था. तो इसी वजह से पिताजी ने इनके लिए एक मसाले की दुकान खुलवा दी. धीरे-धीरे धंधा अच्छा चलने लगा था. उन दिनों सबसे ज्यादा चिंता का विषय था आजादी की लड़ाई. चूँकि महाशय जी का परिवार आर्य समाज से जुड़ा है और उत्तर भारत में आर्य समाज का एक अर्थ आन्दोलन बन गया था आजादी की लड़ाई उन दिनों चरम पर थी, कुछ भी कभी भी हो सकता था 1947 में आजादी के बाद जब भारत आजाद हुआ तब सियालकोट पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. पाकिस्तान में हिन्दुओं की हालत बद-से बद्तर हो रही थी, तो महाशय जी ने परिवार के साथ सियालकोट छोड़ना ही उचित समझा.

उस वक्त उनके पास सिर्फ 1500 रूपये थे और कोई धंधा या रोजगार भी नहीं था. किसी तरह से महाशय जी ने रुपए जोड़ कर एक श्तांगाश् खरीद लिया. सियालकोट का एक मसाला व्यापारी अब दिल्ली का एक तांगा चालक बन चुका था. दो महीने तक तांगा चलने के बाद उन्होंने तांगा चलाना छोड़ दिया.  तांगा चलाना छोड़ने के बाद महाशय जी फिर से बेरोजगार हो गये. और कोई काम उन्हें आता नहीं था, सिवाय मसाला बनाने के. काफी सोच-विचार के उन्होंने घर पर ही मसाले बनाने का काम शुरू करने का मन बनाया. बाजार से मसाला खरीद कर लाते, घर में पीसते और फिर इसे बेचते. चूँकि ईमानदार होने के कारण ये मसाले में कुछ गड़बड़ नहीं करते थे तो इनके मसालों की गुणवत्ता अच्छी होती थी. धीरे-धीरे उनके ग्राहक बढ़ने लगे. बहुत सारा मसाला घर में पीसना आसान बात नहीं थी. अब महाशय घर में मसाला पीसने की बजाय चक्की पर जाकर मसाला पिसवाने लगे. एक बार उन्होंने चक्की वाले को मसाले में कुछ मिलते हुए देख लिया। ये देख उन्हें काफी दुख हुआ. और यही वो वक्त था जब महाशय जी ने मसाला पीसने की फैक्ट्री खोलनी चाही.

दिल्ली के कीर्तिनगर में महाशय जी ने अपनी पहली मसाला फैक्ट्री लगाई. इसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. दिल्ली के बाद देश में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में उनके मसाले की महक फैल गयी. उनकी इस प्रसिद्धि की केवल यही एक वजह नहीं है और न ही महाशय जी कार्यों और प्रसिद्धी का उल्लेख कागज के कुछ टुकड़ों पर किया जा सकता है. क्योंकि महाशय जी ने सार्वजनिक जीवन के दायित्व का पालन तो बखूबी किया ही साथ ही समाज में गरीब, बेसहारा लोगों के अनाथालय, स्कूल, अस्पताल जैसे न जाने कितने संस्थानों का निर्माण कराकर समाज को समर्पित किये, जिनकी सूची काफी लम्बी है. गरीबों आदिवासियों के सच्चे मसीहा, भारतीय संस्कृति , संस्कार , सभ्यता को अपने पवित्र धन से सींचने वाले महाशय जी ख्याति यही समाप्त नहीं होती यह टीवी विज्ञापन में आने वाले दुनिया के सबसे अधिक उम्र के स्टार के रूप में भी जाने गये. उन्होंने इस कहावत को सच साबित किया कि इतने छोटे बनों की हर कोई आपके साथ बैठ सके और इतने बड़े बनों की आप खड़े हो जाओ तो कोई बैठा ना रहे, ये किसी व्यापारी की स्तुति नहीं अपितु कामयाबी की बुलंदियों पर काबिज एक महामना के प्रति समर्पण है. एक इंसान अपनी ज़िंदगी में चाहे तो क्या कुछ नहीं कर सकता है, बस ज़रूरत है दृढ़निश्चय और ईमानदारी की बेशक आज ये महान आत्मा हमारे बीच नहीं है लेकिन देश और दुनिया युवाओं उनकी कहानी जरुर प्रेरणा देती रही कि अपनी मेहनत और लग्न से आकाश की ऊंचाई पर पहुंचे, सफलता और शोहरत को छुआ जिंदगी के आखिरी समय तक समाज सेवा में कदम चलते रहे, और कवि की उन पंक्तियों को भी अमर कर गये जो कहती है कि लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती .

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती

नन्ही चींटी जब दाना लेकर चलती है

चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है

मन का साहस रगों में हिम्मत भरता है

चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है

मेहनत उसकी बेकार हर बार नहीं होती ।

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती…

एक पूज्य अमर आत्मा को हमारा शत शत नमन कोटि कोटि प्रणाम

आर्य समाज

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