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राजनितिक जमीन तलाशने की जुगत में कश्मीरी नेता

विनय आर्य

6 अगस्त 2019 लोकसभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन विधेयक पर बहस चल रही थी इस दौरान सदन की कार्यवाही शुरू होते ही गृह मंत्री अमित शाह और लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी के बीच तीखी नोंक-झोक हुई थी। इससे एक दिन पहले यानि 5 अगस्त को जम्मू कश्मीर से धारा 370 समाप्त कर दी गयी थी। ये नोंक-झोक इतनी आगे बढ़ी कि गृह मंत्री अमित शाह ने अधीर रंजन चौधरी से एक सवाल पूछा था कि इस मामले में कांग्रेस को अपना रुख साफ करना चाहिए। कांग्रेस बताए कि क्या कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र मॉनिटर करे या भारत सरकार ?

भले ही इस बहस को एक वर्ष गुजर गया हो, अनुच्छेद 370 भी अब बीता अतीत बन चूका हो। लेकिन एक साल बाद एक नया सवाल खड़ा हो रहा है कि कश्मीर के राजनितिक परिवार क्या चाहते है? घाटी को आतंकी मॉनिटर करे या भारत सरकार? इस अनुच्छेद की वजह से जम्मू-कश्मीर के विकास को रोका गया और लोकतंत्र का गला घोंटा गया। वहां कांग्रेस सरकार में आए संविधान संशोधन भी लागू नहीं हुए क्योंकि वोट बैंक प्रभावित हो रहा था। तीन परिवारों की वजह से वहां का विकास नहीं हो सका।

दरअसल गृहमंत्री द्वारा एक वर्ष पहले कही गयी इन बातों असर आज हो रहा है। पिछले दिनों कश्मीर में तीन बड़े बदलाव देखने को मिले एक तो उपराज्यपाल जीसी मुर्मू की जगह मनोज सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर के दूसरे उप राज्यपाल के रूप में शपथ ली। दूसरा कश्मीर घाटी से अर्धसैनिक बलों की संख्या में दस हजार जवानों को कम करने की खबरें आयी और तीसरा नेशनल कांग्रेस व पीडीपी समेत कई दलों के नेताओं से नजरबंदी हटाई गयी। लेकिन इन बदलावों के बाद एक खबर भी आई कि भाजपा को छोड़कर वहां के सभी दलों ने मिलकर अनुच्छेद 370 को फिर से राज्य में बहाल करने के लिए साझा घोषणा पत्र को तैयार किया गया है। उसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की महबूबा मुफ्ती, जेकेपीसीसी के जीए मीर, माकपा के एमवाई तारीगामी, जेकेपीसी के सज्जाद गनी लोन, जेकेएएनसी के मुजफ्फर शाह के नाम शामिल हैं।

आखिर ऐसा क्या हुआ जो नजरबंदी हटते ही कश्मीर के सभी दल इस घोषणापत्र को लेकर खड़े हो गये तो इसका भी जवाब एक साल पीछे मिलेगा क्योंकि अधीर रंजन चौधरी के सवाल पर जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा था कि कश्मीर के तीन परिवारों ने कश्मीर को जमकर लूटा पूरे देश को पता है कि वो तीन परिवार कौन हैं। जन कल्याण का जो पैसा केंद्र से राज्य में भेजा गया उससे जनता का पूरा विकास नहीं हुआ क्योंकि 370 की वजह से भ्रष्टाचार चलता रहा। यह पैसा कहां गया, इसी 370 को ढाल बनाकर भ्रष्टाचार करने का काम वहां के नेताओं ने किया है।

असल में धारा 370 कश्मीर में एक अनुच्छेद ही नहीं बल्कि रोजगार का एक बड़ा साधन भी था हमेशा धारा 370 की आड़ में वहां आतंकवाद बढ़ता चला गया, लोगों को बरगलाया गया। परिणाम यह रहा कि वहां की जनता को गरीबी के अलावा कुछ नहीं मिला। देशभर के बाकी राज्यों में आतंकवाद क्यों नहीं पनपा क्योंकि वहां 370 नहीं थी जो अलगाववाद का मूल पैदा करती रही थी। दिल्ली हमेशा को श्रीनगर पैसा भेजती रही लेकिन श्रीनगर से दिल्ली को हमेशा जवानों के पार्थिव शरीर और धमकियां ही मिलती रही। अब जब पिछले वर्ष दिल्ली और श्रीनगर के बीच की दीवार 370 गिर गयी तो ये लोग अब दुबारा उसी दीवार की चाह में साझा घोषणापत्र जारी कर रहे है। घाटी में सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी से जुड़े नेताओं की हत्या तक की जा रही है। लोगों में खोफ पैदा कर राज्य को फिर से मजहबी आग में झोखना चाह रहे है।

दूसरा एक दूसरे के धुरविरोधी रहे ये आज सभी दलों के नेताओं को न तो जम्मू-कश्मीर की चिंता है और न ही 370 की। बल्कि अब ये लोग केन्द्रीय शासन में खुलने वाली फाइलों से परेशान हैं। उपराज्यपाल आते ही वहां ठंड में पसीने आने लगे हैं और अब फाइलें खुल रही हैं। परिणाम भी दिख रहा है अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से इस्तीफा दे दिया हैं, जम्मू कश्मीर का पुलिस बल सेना के साथ मिलकर आतंक से लड़ रहा है, अनुच्छेद 370 के हटने के बाद मुख्यधारा में लौटने लगा है।

अगर देखा जाए तो छिटपुट घटनाओं को छोड़कर कश्मीर में शांति बनी रही। लेकिन जम्मू कश्मीर के लिए एक ऐसी समस्या भी है जो फिलहाल खत्म करना बड़ी चुनौती है। दरअसल यह चुनौती स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया कराने का है। एक बात सच और भी है इससे जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि देश में बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। इसके अलावा जम्मू कश्मीर में विकास का मुद्दा भी काफी अहम है। सड़क, पानी, बिजली जैसी समस्या वहां खत्म करना वहां की सबसे बड़ी जरूरत है। मोदी सरकार उस दिशा में बढ़ भी रही है। सरपंच और पंचों के जरिए जम्मू कश्मीर में विकास के कार्य करवाए जा रहे हैं। केंद्रीय परियोजनाएं भी खूब शुरू हो रही हैं। युवा सरपंचों को महत्व दिया गया तथा सरपंचों को प्रतिमाह 2500 और पंचों को  1000 की प्रोत्साहन राशि भी दी जाने की शुरुआत कर दी गई है। ग्राम पंचायतों की बही खाते की देखरेख के लिए दो हजार से ज्यादा अकाउंटेंट की भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई है। इसके अतिरिक्त पुल सडकों, शोपिंगमॉल बन रहे है अलगावादियों की दुकाने बंद हो चूकी है तो इन लोगों को अब दुबारा अपनी राजनीती के लिए जमीन चाहिए और वो जमीन है अनुच्छेद 370 क्योंकि इसी अनुच्छेद की आड़ में ये लोग फिर से युवाओं को मजहबी घुट्टी पिलाकर उनके हाथों से कलम लेकर बारूद थमा देना चाहते है। इसलिए इनकी एकता का यह बेमेल घोषणापत्र राज्य के विकास के लिए नहीं बल्कि अपनी कट्टर मजहबी दुकानदारी का प्रमाण पत्र है। अपनी राजनितिक दुकान बंद होने का शोकपत्र है।

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