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शादी, साजिश और सियासत

अभी तक यही सुना जाता था कि विवाह करना किन्ही दो व्यक्तियों का नितांत व्यक्तिगत मामला है. किन्तु बरेली जिले की बिथरी चैनपुर सीट से विधायक राजेश मिश्रा उर्फ पप्पू भरतौल की बेटी साक्षी ने एक युवक अजितेश कुमार के साथ विवाह कर लिया है यह मुद्दा जरुर राष्ट्रीय बन गया हैं। कारण विवाह के बाद साक्षी ने एक वीडियो बनाई सोशल मीडिया पर साझा की जिसमें वह कह रही है कि मेरा पति अजितेश दलित वर्ग से  आता है इस कारण उसके बाप और भाई ने उसके पीछे गुंडे लगा दिए हैं।  जो उन्हें जान से मारना चाहते हैं।  इसलिए उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए।  इसके बाद इलाहबाद कोर्ट में पेशी के दौरान अजितेश पर कथित तौर पर हमला होना इससे पता नहीं चल पा रहा है कि इसमें शादी कितनी साजिश कितनी और सियासत कितनी है।

देश में अंतरजातीय विवाह पहली बार तो हुआ नहीं है आखिर साक्षी के मामले में इतना रस, इतना स्वाद, इतना शोर क्यों? जहाँ इस मामले में चर्चा में विषय यह होना चाहिए था कि घर से भागकर विवाह करना कितना उचित और अनुचित है?  वहां इस मामले को इतना विकृत कर दिया है कि बिना कोई बात सुने ही विधायक पिता को एक जातिवादी विलेन बना दिया गया और मामले को मीडिया की तरफ से किसी छुपे एजेंडे की तरह जातिवाद का रंग देकर उछाल दिया गया।  आखिर इसे बार-बार प्रेम विवाह कहा जाना कहाँ तक उचित है?

असल में अपने मन मुताबिक विवाह को प्रेम विवाह भी कहा जाता है।  हम इसका विरोध नहीं करते।  बशर्ते इसमें विश्वास हो, दोनों में रिश्तों की समझ और गुजर बसर करने हेतु आर्थिक क्षमता भी हो।  प्रश्न ये नहीं है कि आप किस तरह से विवाह करते हैं।  अपनी से मर्जी से करते है या परिवार की मर्जी से! प्रश्न यह है कि आप अपने वैवाहिक जीवन को चलाते कैसे हैं? क्योंकि तलाक मांगने वालों में सबसे ज्यादा मामले प्रेम विवाह यानि अपनी पसंद से विवाह करने वालों के हैं।  आप महिला थाने में जाकर देखिये पता कीजिए तलाक के कुल मामलों में साठ प्रतिशत से अधिक कथित प्रेम विवाह करने वाले लोगों के हैं।  क्योंकि वास्तविकता के धरातल पर प्रेम विवाह में प्रेम का कहीं से कहीं तक स्थान नजर इसलिए नहीं आता, क्योंकि चार दिन के जज्बाती जुनून के सामने रोजी-रोटी का सवाल जब आ खड़ा होता है या जिंदगी में जब वास्तविक समस्याएं सामने आने लगती हैं, तब इन समस्याओं का जिम्मेदार दोनों एक दूसरे को ठहराने में लग जाते है, कई मामलों में तो अति हो जाती है यानि मामले हिंसा या हत्या तक भी पहुँच जाते है।

बेशक आज साक्षी और अजितेश के मामले में बहस चल रही हो, इनके पक्ष विपक्ष में लोग खड़े भी हो।  लेकिन रिश्तों की दुनिया एक दो दिन के प्रेम से नहीं चलती यह आजीवन प्रेम से चलती है। प्रेम विवाह उपरांत भी किया जा सकता है किन्तु फिल्मों के जरिये जो एक नई आधुनिकता को जन्म दिया गया यह उसी का परिणाम है कि पहले प्रेम किया जाये बाद में विवाह। यही इस नई परम्परा की असफलता का कारण है क्योंकि विवाह से पहले प्रेमी युगल सपनो की अपनी ही आभासी दुनिया में जीते हैं।  जहाँ उनका अपना बड़ा घर होता है, उनके सपने उनकी खुशी एक दूसरे के प्रति समर्पण होता है।  किन्तु विवाह के बाद जब व्यावहारिक, सामाजिक दुनिया से उनका आमना-सामना होता है तब वहां समस्याएँ आना स्वाभाविक है।  जो लोग इन वास्तविकताओं को झेल जाते है वह सफल रहते है।  वरना आप देखिये कि आम लोगों के अलावा डॉक्टर, इंजीनियर, अध्यापक आदि अपने रिश्तों का फैसला करने के लिए कोर्ट कचहरी में चक्कर लगा रहे हैं।

दूसरा क्या मान-मर्यादा, प्रतिष्ठा, सम्मान ये केवल शब्द भर है क्योंकि इन शब्दों के सहारे ही परिवार समाज में जीते है।  आगे बढ़ते है। प्रतिष्ठा एक दिन में नहीं मिलती, बहुत कुछ देकर समाज में सम्मान हासिल किया जाता है।  इसमें परिवार के सभी लोगों की जवाबदेही होती है कि अपने पारिवारिक मूल्यों, नियमों और आदर्शों की परंपरा पर चले।  हम प्रेम का विरोध नहीं कर रहे है रिश्तों की जीवन रेखा का सबसे मजबूत स्तम्भ ही प्रेम है।  किन्तु आधुनिकता के नाम पर आज प्रेम का एक नया अर्थ खड़ा किया जा रहा है कि माता-पिता, भाई-बहन व अन्य परिवार के लोगों को धता बताकर विवाह करने वाले लोगों को प्रेमी युगल या प्रेमी जोड़े कहा जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि प्रेम न करो, विवाह मत करो।  हम किसी जाति के जीवन साथी का भी विरोध नहीं करते।  किन्तु घर से बिना बताये निकल जाना एक बार पीछे मुड़कर यह भी नहीं देखना कि परिवार की हालत क्या होगी।  वह कल सुबह जब उससे कोई पूछेगा तो वह क्या जवाब देगा? उनके मन में बहुत कुछ टूटता-बिखरता जब किसी एक की गलती का खामियाजा कई-कई पीढ़ियां झेलती हैं।  सोचना चाहिए कि हमारी जिंदगी और कितनी जिंदगियों से जुड़ी हैं, उनके प्रति हम कौन सी जिम्मेदारी निभा रहे हैं,  केवल अपने व्यक्तिगत सुख पाने की यह कौन सी लालसा है कि पीछे परिवार सिसक रहा है।

ऐसा नही है कि घर परिवार से दूर भागकर आज हर एक लड़की दुखी है लेकिन जिन-जिन लडकियों ने ऐसा किया उनके परिवार जरुर दुखी है।  हो सकता है आज विधायक साहब का भी परिवार दुखी हो या हो सकता है विधायक साहब ने बेटी पर पैसे खूब लुटाए हो।  पर आज वीडियो देखकर लग रहा कि बेटी को संस्कारों का धन देने में पीछे रह गए।  क्योंकि परिवार में संवाद का अभाव, प्रतिष्ठा के नाम पर अभिमान का अतिरेक फ़िल्मी दुनिया के सुनहरे छलावे, अच्छा-बुरा समझाने की क्षमता का अभाव, उन्हें आधुनिक बनाने की होड़ में कई बार ऐसे ही परिणाम सामने आते है।  हालाँकि सभी जगह कारण अलग-अलग हो सकते है पर हर पीड़ित परिवार की कहानी लगभग एक सी ही है।  इस पर एक नये सिरे से चर्चा जरुर होनी चाहिए कि युवक युवती के चार दिन के प्रेम के सामने आखिर बीस से पच्चीस वर्ष का पारिवारिक प्रेम बौना क्यों पड़ता जा रहा है?

विनय आर्य

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