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श्राद्ध पूर्वजों का यह कैसा सम्मान

एक पंक्ति में एक छोटा वाक्य है कि आत्मा अजर-अमर है। शरीर जन्म लेता है और अंत में महायात्रा पर निकल जाता है। यह जीवन का एक ऐसा कटु सत्य है जिसे प्रत्येक व्यक्ति जानता है किन्तु इसके बावजूद भी अंधविश्वास की एक दुनिया है जो कहती कि पाखंड भी अजर है। इस अलग दुनिया के अपने-अपने पाखंड और अंधविश्वास है जो परम्पराओं के नाम पर और भय के आधार पर खड़े किये गये हैं। हर वर्ष आश्विन मास में पितृपक्ष एक ऐसा चरण है जिसमें आत्मा को तृप्त करने की और पितरों को खुश करने की क्रिया का कार्य होता है। पूर्वजों के सम्मान के नाम पर यह रस्म बड़े सम्मान से अदा की जाती है जिसे श्राद्ध कहा जाता है। इस माह में कर्मकांडी पंडित इस महाअभियान में व्यस्त हो जाता है।

कर्मकाडी जमात का प्रचार है कि श्राद्ध के महीने में परलोक सिधार चुके पितर अपनी संतान को आशीर्वाद देने पृथ्वी पर आते हैं, ये अदृश्य अपनी संतान या पीढ़ी को देखते हैं आनंद मनाते हैं। स्वादिष्ट पकवान खाते हैं और चले जाते हैं। ये पितर पशु-पक्षी बनकर कई रूप में आते हैं पर कर्मकांडी पंडितों के अनुसार अधिकांश कौवे ही बनकर आते हैं। इस मौसम में दान, ब्राह्मण भोजन आदि का बड़ा महत्त्व बताया जाता है। आजकल कुछ लोग अपने पित्तरों को खुश करने के लिए आधुनिक संसाधनों का दान भी करने लगे हैं। मतलब पितरों को गर्मी न लगे उसके लिए एसी, ठंडा पानी पिए इसके लिए फ्रिज, वाशिंग मशीन से लेकर मोबाइल तक दान कर रहे हैं।

वैसे हमारे धार्मिक शास्त्र कहते हैं कि यह शरीर तो सिर्फ एक चोला है, इन्सान का पुनर्जन्म होता है, मृत्यु अटल सत्य है तो उसके बाद जीवन भी उतना ही अटल सत्य है अब प्रश्न यही है कि जब मृत्यु के बाद जीवन है तो फिर कौन और कैसे भटक रहा है जिसका मैं श्राद्ध करूँ? और अगर जन्म नहीं लिया तो मतलब आत्मा की मोक्ष प्राप्ति हो गयी तो फिर आधुनिक संसाधनों से लेकर भोजन तक किसे और क्यों प्रदान किया जा रहा है? अगर आत्मा ने जन्म ले लिया तो वह भी मेरे जैसे इन्सान होंगे कहीं ऐसा तो नहीं जब मैंने जन्म लिया मेरे पिछले जन्म का बेटा मेरा अभी तक श्राद्ध कर रहा हो?

क्या ऐसा हो सकता है कि  कैलकुलेटर से नम्बर डायल कर हम किसी को फोन मिला देंगे? यदि नहीं तो फिर स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था, जीवित प्राणियों पर कैसे काम कर रही हैं? किन्तु सदियों से पंडे-पुजारी अपनी कुटिल बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं को देवता एवं पूजयनीय बताते हुए अपनी सेवा कराते आ रहे हैं। इनका कहना है कि पितृपक्ष के दौरान कुछ समय के लिए यमराज पितरों को आजाद कर देते हैं ताकि वे अपने परिजनों से श्राद्ध ग्रहण कर सकें।

सत्यार्थ प्रकाश में स्वामी दयानन्द सरस्वती जी श्राद्ध के असल रूप को प्रकट करते हुए पितृयज्ञ के दो भेद बताये हैं एक श्राद्ध और दूसरा तर्पण। श्राद्ध यानि जिस क्रिया से सत्य का ग्रहण किया जाय उस को श्रद्धा और जो श्रद्धा से कर्म किया जाय उसका नाम श्राद्ध है तथा जिस-जिस कर्म से तृप्त अर्थात् विद्यमान माता-पिता प्रसन्न हों उसका नाम तर्पण है। परन्तु यह जीवितों के लिये है। मृतकों के लिये नहीं है। किन्तु इसके विपरीत पितृपक्ष के दौरान हमारे घरों में कई तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं। उन पकवानों को पत्तों पर सजा कर रखते हैं, जिन्हें कुछ देर बाद कौए आ कर खा लेते हैं। तब उनकी आत्मा को शांति मिलती है वरना पूरा साल घर में परेशानी रहती है।

ऐसा न करने से यदि पूर्वज नाराज हो गए तो उन्हें जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे धनहानि, संतान पक्ष में समस्याएं, बने काम बिगड़ जाते हैं  इत्यादि। शास्त्रों का हवाला दे देकर धर्मगुरुओं और कर्मकांडी लोगों ने हजारों सालों से यह बात आमजन के दिमाग में बैठा रखी है, उनके मन में आत्माओं का डर पैदा कर रखा है, जिसका वे हजारों वर्षों से फायदा उठा रहे हैं।

विचारहीन समाज में जागरूकता की कमी के कारण कभी सच जानने का प्रयास नहीं किया जाता अतः नुकसान का डर लोगों में इस कदर फैला है कि वे किसी भी तरह का खतरा मोल लेना ठीक नहीं समझते, न ही किसी भी वैज्ञानिक तर्क को स्वीकार करते हैं। एक तरफ अशुभ होने का भय तो दूसरी तरफ सांसारिक सुखों की तलाश में दिखावा करने के हथकंडे सहज ही अपना लेते हैं। चाहे वह कौओं को खाना खिलाना हो या ब्राह्मणों में देवता के प्रवेश की बात हो। लोग सवाल और तर्क करने के बजाय जैसे चल रहा है वैसे ही स्वीकार कर लेने को उचित समझते हैं, जिसे एक तरह की मूर्खता और अंधविश्वास ही कहेंगे।

 पढ़े-लिखे और शिक्षित परिवारों में ऐसी मूर्खतापूर्ण और विरोधाभाषी चीज सिर्फ विश्वगुरु के पास ही मिल सकती है। एक तरफ तो ये माना जाता है कि पुनर्जन्म होता है, मतलब कि घर के बुजुर्ग मरने के बाद अगले जन्म में कहीं पैदा हो गए होंगे। दूसरी तरफ ये भी मानेंगे कि वे अंतरिक्ष में लटक रहे हैं और खीर पूड़ी के लिए तड़प रहे हैं क्या यह अंधविश्वास नहीं है यदि आपको श्रद्धा से श्राद्ध करना है तो माता-पिता या परिवार का कोई बुजुर्ग आपके साथ रहता है तो आप सच्चे दिल से उनकी सेवा करिये। पारिवारिक विषयों पर उनसे सलाह लें। उनका सम्मान करें। बुजुर्गों द्वारा दिए गये आशीर्वादों में बहुत शक्ति होती है। जब आपकी संतान आपको अपने माता-पिता की सेवा करते हुए देखेगी तो वह भी आपकी सेवा करेगी।

परिवार और समाज के बुजुर्ग लोगों की सेवा सर्वोत्कृष्ट मानवीय कार्य है। सेवा हमेशा कृतज्ञता और सद्भावना की सुगंध समाज को तृप्त करती है। ध्यान रखिये! श्रद्धा , कृतज्ञता और सेवा हमारे धार्मिक जीवन का मेरुदण्ड है। जो संतानें श्रद्धापूर्वक अपने माता-पिता तथा बुजुर्गों की सेवा करती हैं उन्हें सुख, सम्रद्धि यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है न कि मृतक के नाम पर किये श्राद्ध से।

राजीव चौधरी

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