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सूडान ने शरीअत को क्यों छोड़ा ?

राजीव चौधरी

पिछले करीब तीस वर्षों से उत्तरी पूर्वी अफ्रीका के देश सूडान के लोग सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे उनका एक ही नारा था कि हमें शरियत नहीं लोकतंत्र चाहिए, लेकिन हमारा आज का ये एपिसोड उन लोगों के लिए है जो भारत के लोकतंत्र और संविधान को समाप्त करके यहाँ इस्लामिक शरियत हकुमत लागु करने का सपना देखते है साथ ही सेकुलर लड़कियों को भी सूडान की इस दर्दनाक दास्तान सुन लेना चाहिए कि इस्लाम में महिलाओं की जिन्दगी क्या होती है इसी का परिणाम है कि आज कई इस्लामिक देशों में शरियत के विरोध में महिलाएं उठ खड़ी हुई है.

1 जनवरी 1956 को आजाद होने के बाद सूडान के लोगों ने भी स्वतंत्रता का सपना देखा होगा उन्होंने भी स्वतंत्रता की खुली हवा में साँस लेने की सोची होगी उनकी भी चाह रही होगी कि वो अब अपने कानून और संविधान के तहत अपने फैसले लिया करेंगे. आधुनिक शिक्षा के लिए स्कुल होंगे और उनकी पूजा प्रार्थना पर उनका अधिकार होगा. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि उनकी आजादी अब उनकी बेड़ियाँ बनने वाली है और देखते ही देखते सूडान विश्व का सबसे गरीब बन गया..इतना गरीब की सूडान की गरीबी की फोटोग्राफी से लोगों ने पुलित्जर अवार्ड भी जीते और इसका सबसे कारण है, इस देश में लागू कड़े इस्लामिक शरीयत कानून जिनके कारण ना वहां कभी कोई निवेशक आया और ना लोगों के पास रोजगार रहे

लोकतंत्र की चाह लिए सूडान और उसके लोग ऐतिहासिक परिवर्तनकाल से गुजरे हैं. एक समय अफ्रीका के सबसे बड़े देश रहे सूडान में 2011 में विभाजन हुआ और दक्षिण सूडान नामक एक नया देश बन गया. लेकिन यह विभाजन की लकीर 19वीं सदी से कई दशक पहले खिंच चुकी थी.

सूडान के उत्तरी हिस्से पर कभी तुर्क साम्राज्य का शासन रहा. 18वीं सदी में पूरे सूडान पर मिस्र ने शासन किया. इस वजह से सूडान के उत्तरी हिस्से में बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी हो गई और इन्हें आधे अरबी कहा जाता है जबकि दक्षिणी हिस्से में बाद में ईसाई बहुसंख्यक हो गए.

20वीं सदी में ब्रिटेन ने मिस्र के साथ मिलकर सूडान पर राज किया और यही वह दौर था जब उत्तर और दक्षिण सूडान के बीच विरोध और हिंसा की खाई चौड़ी होती चली गई.

जिस समय ब्रिटेन ने सूडान पर राज करना शुरू किया तो उन्होंने वहां देखा कि मिस्र की सीमा से लगे उत्तरी सूडान में विकास हुआ है जबकि दक्षिणी हिस्से में कोई विकास नहीं हुआ है. तो दक्षिणी हिस्से को उन्होंने 1920 में बंद क्षेत्र घोषित करके चर्च को उसके विकास का जिम्मा सौंप दिया. आप जानते हैं कि चर्च में पहली चीज क्या होती है. उन्होंने वहां के लोगों को ईसाई बनाना शुरू किया क्योंकि उनके धर्म और परंपराएं स्थानीय थे. इनको विकास की जगह बाइबिल दे दी गई. और दूसरे हिस्से ने विकास की जगह शरियत हकुमत

यानि एक तरफ सूडान के गरीब लोगों के हाथों में रोटी की जगह बाइबल थी तो दूसरे हिस्से में शरिया कानून

हालाँकि जनवरी 1956 में सूडान आजाद हो गया लेकिन उससे पहले अप्रैल 1955 में उत्तर और दक्षिण में गृह युद्ध शुरू हो गया. 1969 में पहले सैन्य तख़्तापलट के बाद जाफर मुहम्मद निमेरी 1969 से 1985 तक देश के राष्ट्रपति रहे.

1986 में सादिक अल महदी प्रधानमंत्री बने लेकिन 1989 में ब्रिगेडियर ओमर हसन अल-बशीर ने उनका तख़्तापलट कर दिया और सूडान की सत्ता पर कब्जा कर लिया था। उसने देश की शासन में इस्लामी कानून को शामिल कर लिया। इसके जरिए देश के कई हिस्सों में कठोर शरिया कानून लागू कर दिया गया. जिसके बाद सूडान के कई कबीले सरकार के खिलाफ हो गए थे. बशीर के सत्ता पर कब्जा करने के बाद से सूडान को अंतरराष्ट्रीय अलगाव का सामना करना पड़ रहा था.

लेकिन इसका सबसे बड़ा दर्द यहाँ की महिलाएं झेल रही थी क्योंकि शरियत कानून के अनुसार यहाँ महिलाओं का खतना किया जाना एक तो गरीबी दूसरा इलाज की कमी इस कारण खतना से हर वर्ष एक बड़ी संख्या में मासूम बच्चियां दर्द से तडफ तडफ कर दम तौड देती है. यह प्रक्रिया दर्दनाक होती है बल्कि बेहद खतरनाक भी. अमूमन यह घर पर किया जाता है बिना अनेस्थीसिया दिए, हालाँकि भारत के मुस्लिम बोहरा समुदाय में भी यह प्रथा प्रचलित है. खैर इसके अलावा कोई सूडानी महिला बिना किसी पुरुष रिश्तेदार के साथ सफर नहीं कर सकती. उन्हें अब बुर्के यानि काले कफन में जिन्दगी गुजारनी पड़ती है, इसके अलावा सबसे बड़ा नरक ये है कि इस्लाम में इनकामिंग तो मुफ्त है लेकिन आउटगोईंग की कीमत मौत है, यानि अगर कोई इस्लाम में भूल से भी आ गयी तो उसे जीवन भर उसी में दम तोडना पड़ता है क्योंकि इस्लामिक कानून शरियत के तहत इस्लाम को त्यागने पर मौत की सजा भी हो सकती है.

लेकिन लम्बे संघर्ष और हजारों महिलाओं के बलिदान के बाद अब सूडान की महिलायों को इनसे मुक्ति मिलती दिख रही है क्योंकि वहां लोकतंत्र स्थापित हो रहा है या कहो लोगों ने इस्लाम को बाय बाय कह देने के लिए खुद को तैयार कर लिया है.

खैर अब सूडान की सरकार ने शासन से धर्म को अलग करने का फैसला किया है, इसे लेकर सुडान के प्रधानमंत्री अबदुल्ला हमदोक और सूडान पीपुल्स लिबरेशन मूवमेंट-नॉर्थ विद्रोही समूह के नेता अब्दुल-अजीज अल हिलू के बीच इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा में एक समझौते पर हस्ताक्षर भी किए गए हैं, अब यहां लोगों को आत्मनिर्णय का अधिकार होगा कि वो किस धर्म मत का चुनाव करते है, लेकिन इसमें खास बात ये है कि जिस देश की 99 प्रतिशत जनता शरियत हकुमत के खिलाफ हो, इस्लामी शाशन के खिलाफ बगावत कर रही हो उस देश के कितने लोग अब इस्लाम में रहना चाहेंगे आप खुद अनुमान लगा सकते है.

ये केवल एक सूडान की बात नहीं दरअसल भारत के इस्लाम को छोड़ दे तो दुनिया के इस्लामिक मुल्कों में पिछले कुछ सालों में सातवी सदी के इस्लामिक कानून शरियत के खिलाफ आवाज उठ रही है, साल 2017 का दिसम्बर का अंतिम भला महीना कौन भूल सकता है जब ईरान में महिलाएं हिजाब हाथ में लेकर शरियत कानूनों से आजादी मांग रही थी, जिसके बाद पुरुष नौजवान प्रदर्शनकारी मौलवियों की हुकूमत को सत्ता से बेदखल करने लिए बड़ी तादात में सड़कों पर निकले थे ताकि उनकी दैनिक जीवन शैली से मुल्ला मौलवियों के इस्लामिक फरमान राजनितिक तौर पर खत्म हो. इन विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए बड़ी संख्या में महिलायों की गिरफ्तारी हुई और जबरन विद्रोह कुचल दिया गया.

क्योंकि ईरान के इन प्रदर्शनों में कुछ लोगों के हाथ में पोस्टरों पर लिखा था. हम आर्यन है. शायद इस्लामी कट्टरता से ऊबे हुए लोग अपने मूल धर्म की मांग भी कर रहे थे. दरअसल इस्लाम के आगमन से पहले ईरानी अपने को आर्य कहते थे. उनके धार्मिक ग्रन्थ अर्थवेद से निकले अवेस्ता में भी उन्हें आर्य कहकर पुकारा गया है. प्रसिद्ध ईरानी सम्राट् दारा ने अपनी समाधि पर एक शिलालेख अंकित करवाया है कि हम आर्य है.

ईरान ही नहीं 15 अप्रैल वर्ष 2007 को पाकिस्तान के बड़े शहरों में शुमार कराची में भी अनुमानत एक लाख मुसलमानों ने इस्लामी कानून व्यवस्था शरियत का विरोध करते हुए शरियत कानून को ना जैसे नारों की गर्जना की. मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट के नेता अल्ताफ हुसैन ने घोषणा की थी कि हम धार्मिक आतंकवाद और धार्मिक कट्टरवाद का कड़ा प्रतिवाद कर रहे है हम इस्लाम का शाशन नही चाहते इसके बाद अल्ताफ को भी पाकिस्तान छोड़कर भागना पड़ा वरना ईशनिंदा का आरोप लगाकर उनका भी वही हाल होता जो पिछले दिनों मसाल खान समेत करीब 77 लोगों का हो चूका है इनमें शिक्षक, गायक, वकील और सताए गए अहमदी संप्रदाय के लोग शामिल हैं.

अल्ताफ के बाद तुर्की के बड़े शहर अंकारा में अनुमानित तीन लाख मुसलमानों ने अपने हाथ में गणतंत्र के संस्थापक मुस्तफा कमाल अतातुर्क के बैनर उठा रखे थे और नारा लगा रहे थे कि हम इमाम को राष्ट्रपति नहीं चाहते हम शरियत हकुमत नहीं चाहते. इसी दौरान दूसरा विरोध प्रदर्शन 29 अप्रैल को इस्ताम्बूल में हुआ और दावा किया गया कि इस प्रदर्शन में 7 लाख मुसलमानों ने भाग लिया था. तथा  तुर्की सेक्यूलर है और सेक्यूलर ही रहेगा जैसे नारे लगा रहे थे. शायद सड़कों पर अचानक उमड़ी यह भीड़ इस्लामिक कट्टरपंथ से अपने गणतंत्र को बचा रही थी. हालाँकि ताकत के बल पर ये प्रदर्शन कुचल दिए गये लेकिन लोगों के मन में अभी विरोध ज्यों का त्यों बना हुआ है, बस उन्हें मौके की तलाश है आज तार्किक मुस्लिम वर्ग आसमानी किताब की हकीकत समझ चूका है ईरान पाकिस्तान और तुर्की और अब सूडान में घटित घटनायें ये बताने के लिए काफी है कि वामपंथी और फर्जी सेकुलर लोग नरमपंथी मुसलमानों के रास्ते से हट जायें ताकि ये लोग इस्लामवाद को इतिहास के कूड़ेदान में आसानी से डाल सके

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