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स्कर्ट पहनकर क्यों स्कूल आ रहे हैं पुरुष टीचर्स ?

Rajeev choudhary

स्पेन देश का नाम सुनते ही सबसे पहले हमारे दिमाग में आता बूल फाइट लेकिन आज के स्पेन में बुल नहीं बल्कि स्कर्ट फाइटिंग चल रही है। डेली मेल की एक रिपोर्ट के अनुसार कुछ दिनों पहले की बात है। स्पेन के एक स्कूल में पढ़ने वाले 15 साल के माइकल गोमेज स्कर्ट पहनकर पहुंचे। ये स्कूल स्पेन के बिलबाओ सिटी में था. माइकल को ऐसा करते देख उसे निष्कासित कर दिया गया और एक सायकोलॉजिस्ट के पास भेज दिया गया। माइकल ने इसके बाद एक टिकटॉक वीडियो भी डाला था, जिसमें बताया था कि फेमिनिज्म और डाइवर्सिटी को सपोर्ट करने के लिए उसने स्कर्ट पहना।

हम भारतीयों के लिए ये थोडा सा अजीब विषय है लेकिन यकीन मानिये विषय दिलचस्प है, जो पुरुष और और स्त्री के बीच की दुरी को कपड़ों से मापता है।  क्या कभी आपको किसी लड़की को पेंट-शर्ट या कुर्ते पजामे में देखकर हैरानी हुई! शायद नहीं, क्योंकि ये तो कॉमन सी बात है। लेकिन अगर कोई लड़का साड़ी बांधकर सूट सलवार पहनकर सडक पर निकल जाये तो शायद मजमा लग जायेगा। लोग रुक-रुककर और मुड-मुड़कर देखेंगे। हो सकता है, बहुत सारे लोग तो इस विहंगम दृश्य का विडियो भी बनाने लगे क्योंकि नजारा ही बिलकुल अलग है, लड़का होकर लड़की के कपडे जो पहने है।

बस यही हुआ भारत से हजारों किलोमीटर दूर जब स्पेन के स्कूलों में जब पुरुष टीचर्स लड़कियों की स्कर्ट्स पहनकर बच्चों को पढ़ाने जाने लगे और देखते ही देखते ये स्पेन का एक आन्दोलन बन गया। लेकिन इस आन्दोलन की शुरुआत कहाँ से हुई टीचर्स माइकल गोमेज के निष्कासन से? नहीं! असल में ये है जून 2017 की बात ब्रिटेन के डेवोन में कुछ लड़के स्कूल प्रशासन के पास गये और कहा सर हमें फुल पेंट में गर्मी लगती है, क्या हम हाफ पेंट पहनकर स्कूल आ सकते है? मसलन लड़कों ने यूनिफॉर्म बदलने की गुजारिश की जिसे स्कूल प्रशासन ने नकार दिया। बस फिर क्या था अगले दिन करीब 30 लड़के जो हाईस्कूल में थे वो सब अपनी क्लास में स्कर्ट पहनकर आये। स्कूल में खलबली मच गयी, लड़कों ने कहा अगर लड़कियां स्कर्ट पहनकर स्कूल बुलाई जाती है तो हमारी हाफ पेंट से दिक्कत क्या है? छात्रों द्वारा किये विरोध के तरीके को कुछ लोगों ने शर्मनाक बताया तो कुछ लोगों ने इसकी सराहना करते हुए कहा कि हमें गर्व है कि बच्चों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई, अगर लोग महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों की बात करते हैं तो स्कूल यूनिफॉर्म अलग-अलग क्यों हो?

अब ऐसा ही कुछ स्पेन में हुआ जैसे ही स्कर्ट वाले टीचर माइकल का निष्कासन हुआ तो स्कूल के कई सारे टीचर्स और स्टूडेंट्स उनके सपोर्ट में आए और स्कर्ट पहनकर स्कूल पहुंचे। अपनी एक तस्वीर भी उन्होंने ट्विटर पर डाली और ट्वीट के साथ लिखा “क्लॉथ हेव नो जेंडर” और देखते देखते एक मूवमेंट की शुरुआत स्पेन में हो गयी की। कई सारे स्टूडेंट्स और टीचर ने इस मूवमेंट को सपोर्ट किया। डेली मेल की रिपोर्ट की मानें, तो सोशल मीडिया पर अब कई सारे लोग इस मूवमेंट को सपोर्ट कर रहे हैं। स्पेन के एक टाउन में यहाँ तक कि स्कूल के कुछ पुराने स्टूडेंट्स महीने की हर चार तारीख को स्कर्ट पहनकर इकट्ठा हो रहे हैं। कई सारे स्टूडेंट्स के पैरेंट्स भी इस मुहीम को सपोर्ट कर रहे हैं।

देखा जाए तो विवाद स्त्री और पुरुष पहनावे को लेकर गहराया। मुझे नहीं पता अन्य लोग इस घटना को किस तरह से लेंगे पर जिस भारतीय समाज में हमारा जन्म हुआ वहां इस तरह से विरोध जताने को एक बेहूदा तरीका ही कहा जायेगा।  क्योंकि अन्य देशों की तरह ही यहां भी सामाजिक रूप में औरतों की बराबरी की बात तो की जाती है लेकिन यदि कोई पुरुष जनाना हरकत करें तो उसे किन्नर ओरत या नामर्द कहकर उसका तिरस्कार किया जायेगा। 2013 रामलीला मैदान की ही चर्चा को ले लीजिये, कहा जाता है कि बाबा रामदेव सूट-सलवार पहनकर वहां से निकले थे लेकिन उस समय की परिस्थिति को समझकर कई लोग आज भी बाबा जी का मजाक और मिम्स बनाते है।

अब भले ही मंचो से फेमिनिस्ट कितनी भी बराबरी की बात करें पर महिलाओं को पुरुष से कमतर ही समझा जाता है। पहनावे में, सोच-विचार में, चाल-ढाल में और यहां तक कि लड़ने में भी। तभी तो झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि कुछ यूं कहकर मनाई जाती है कि “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी” क्या दुनिया सिर्फ मर्दानगी ही पसंद है? क्या हम लोग झांसी की रानी का सम्मान सिर्फ इस वजह से ही करते हैं क्यूंकि वह मर्दों की तरह लड़ी थी? यदि नहीं! तो फिर एक महिला क्रान्तिकारी का सम्मान कुछ इस तरह भी किया जा सकता है कि “खूब लड़ी जनानी वो तो झांसी वाली रानी थी”  कोई लड़की छेड़छाड़ का विरोध करे या अराजक तत्वों के सामने डट जाए तो आमतौर पर उस जुझारू महिला को मर्दानी कहने का प्रचलन सा बन गया है। यानि मर्द ही लड़ सकता है महिला नहीं। जबकि इतिहास में बहुत सारी उन महिलाओं के नाम है जिन्होंने दुश्मन से डटकर लोहा लिया।

अब पता नहीं स्पेन के ये टीचर हो या ब्रिटेन के वो स्कर्ट पहने बच्चें ये सब विरोध कर रहे है या वैश्विक समाज को कोई आइना दिखा रहे है कि यदि महिलाओं के वस्त्र पहनना शर्म का काम है, तो महिला इन वस्त्रों को पहनकर सदियों से कितनी शर्मशार हो रही होंगी।

ऐसा नहीं है कि पहले महिलाऐं कमजोर थी या अब कमजोर हैं। दरअसल इस पितृसत्तात्मक समाज में लड़कों को कोमलता दिखाने से मना किया जाता है। बहुत कम उम्र में ही उनसे कह दिया जाता है कि रोना या भावनाओं का प्रदर्शन करना पुरुषों का काम नहीं है। लड़कों को ताकतवर और मर्दाना दिखाया जाता है, जबकि लड़कियों को मृदुभाषी और कोमल बताया जाता रहा है।

बहरहाल इस उधेड़बुन में घुसे रहने के बाद मुझे समझ में आया कि समस्या शायद महिलाओं के लैंगिक व्यवहार या उनके पहनावे के बजाय असल में इस माहौल में ही है। इसका अंदाजा हम न्यूज से लेकर सामाजिक माहौल में भी लगा सकते हैं, मसलन खेल की ख़बरें आती हैं तो क्रिकेटर या फुटबॉलर का मतलब ही होता है पुरुष खिलाड़ी। जब झूलन गोस्वामी एक टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाली क्रिकेटर बनीं तो उनके नाम के आगे लिखना पड़ा महिला क्रिकेटर। पर यदि भुवनेश्वर कुमार यही रिकॉर्ड बनाते हैं तो क्या उनके नाम के आगे या पीछे पुरुष क्रिकेटर लिखा जाता?

प्राकृतिक क्षमता का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, इसमें चाहें पुरुष हो या महिला- समान मौका, समान इज्जत सभी को मिलनी चाहिए। दोनों की बराबरी में कोई संदेह नहीं है, मगर एकरूपता को पागलपन ही कहा जायेगा। ना हमें महिला को पुरुष और ना पुरुष को महिला बनाना चाहिए। जो जैसे हैं, प्राकृतिक हैं। बस सामान रूप से स्वीकार करने के लिए आगे आना चाहिए।

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