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हम जायेंगे तो वहां मजबूत करेंगे आर्य समाज

जब किसी अँधेरे मकान में रहने वाले लोग उस अँधेरे को सत्य माने बैठे हां और पीढ़ी दर पीढ़ी बीतने के बाद उस अँधेरे के प्रति आस्था बनाकर उसे अपना भाग्य समझ लेते हों, उसकी पूजा करने लगते हों पर तब अचानक एक दिन कोई एक महानुभाव दीपक लेकर उस अँधेरे मकान के अन्दर जाये तो एक पल को उसके प्रकाश से भगदड़ मचना लाजिमी है। लेकिन यदि उस मकान के अन्दर रहने वाले एक भी शक्स ने प्रकाश का नाम सुना होगा तो वह वहां जरूर डटा रहेगा और अन्य को भी उस प्रकाश के प्रति जागरूक ही नहीं करेगा बल्कि बतायेगा यही पूर्ण सत्य है और वह अँधेरा हमारा भाग्य नहीं था।

कुछ  इसी तरह आप सभी को यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज से लगभग 140 साल पहले मानव और उसके धार्मिक मूल्यों की रक्षा हेतु महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा स्थापित आर्य समाज महज अपनी 20 वर्ष की आयु में केरीबियाई द्वीपों से लेकर भारत समेत अनेक देशां में अपनी पकड़ बना चुका था। बिना मीडिया और बिना सोशल मीडिया के। न टेलीवजन थे और न लोगों के हाथों में आज की तरह इंटरनेट और मोबाइल। पर फिर भी अज्ञानता को मिटाने की यह धार्मिक क्रांति अपने सर्वोच्च शिखर को छू रही थी। अँधेरे को मिटाने के लिए प्रकाश का यह दीपक देश और विदेश में अज्ञानता और पाखंड के अँधेरे को मिटा रहा था।

गौर करने वाली बात यह है कि यह कार्य कोई एक अकेला व्यक्ति नहीं कर रहा था। अपितु बच्चा-बच्चा दयानन्द का सिपाही बन इस कार्य को आगे बढ़ाने में लगा था। दानी महानुभाव दान द्वारा तो अनेक लोग इसमें तन-मन-धन से साथ दे रहे थे। जिस कारण यह ज्वाला भारत के अलावा नेपाल मॉरीसश सहित अनेक देशों के अलावा बर्मा में पहुँच गयी थी। वहां अचानक बड़ा परिवर्तन हुआ स्थानीय स्तर पर धड़ाधड़ आर्य समाजें बनने लगीं। मचीना, रंगून, माण्डले, लाशियो, मोगोग, जियावाड़ी, मानैवा, काम्बलू, नामटू आदि शहरों में भवन तैयार होने लगे। कई सत्संग मंडलियां मिलकर दिन रात वेद प्रचार का कार्य करने लगीं। शहर के जियावाडी बाजार में आर्य गुरुकुल स्थापित कर बर्मा के आर्य वीरों ने बर्मा को पुनः ब्रह्मदेश बनाने का संकल्प धारण कर लिया।

जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है कि जिस समय आर्य समाज के आन्दोलन से प्रभावित होकर देश विदेश में धार्मिक परिस्थिति बदलती जा रही थी। सबको साथ लेकर वेद का आदेश और महर्षि दयानन्द के सपने कृणवन्तो विश्वार्यम को लेकर उत्साहित आर्य वीर आगे बढ़ रहे थे ठीक उसी समय विश्व के राजनैतिक माहौल ने समूचे विश्व की मानवता को विश्व यु( की ओर धकेल दिया। मानवता के साथ-साथ ये आर्य समाज के कार्यों को भी एक धक्के जैसा था। बर्मा में बौ( सैनिक शासन ने आर्य समाज की अनेक जमीनों पर कब्जा कर लिया। आर्ष साहित्य मिटाने का कार्य हुआ। एक बार पुनः बताना चाहेंगे कि इसके बाद भी आर्यजनों के साहस ने घुटने नहीं टेके बल्कि नवीन साहित्य की कमी के बावजूद भी फटे पुराने वैदिक साहित्य को जोड़-तोड़कर उसे लेकर ही आगे बढ़ते गये।

कहते हैं प्रकाश अँधेरे से कभी नहीं हारता बस कई बार कुछ पल को ग्रहण लग जाता है। इस सबके बाद आज भी वहां बर्मा ;म्यांमारद्ध में पुरोहित, प्रचारक हिन्दी के साक्षरता स्तर पर कविता प्रशिक्षण सत्र, सर्व शिक्षा अभियान जो गर्मियों की छुट्टियों में गांवों में आयोजित क्लासों के माध्यम से चलते रहे है। इसके अलावा विभिन्न सत्रों में चरित्र निर्माण शिविर अनुशासन आदि पर विशेष बल दिया जाता रहा है। हवन आदि से लेकर वैदिक विचाधारा के कार्यों को वहां के आर्ष विद्वानों द्वारा गाँव-गाँव में सत्र चलते रहते हैं। वैदिक धर्म की परीक्षा भी वहां सालाना मई माह में कराई जाती है। कुल मिलाकर वहां आर्य समाज बड़े विशाल भवनों से लेकर टूटे-फूटे भवनों तक में चल रहा है।

देश की राजधानी दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर बर्मा के शहरों और गाँवों के इन आर्य समाजों में चल रही यह गतिविधियां भले ही मन को सुकून और राहत देती हां किन्तु इस सबके पीछे एक हल्का सा दर्द भी है जिसे किसी एक व्यक्ति से साझा न कर सामूहिक रूप से आप सभी के समक्ष रखना चाहेंगे। दरअसल पूर्व के आर्य विद्वानों, महानुभावों ने आर्य समाज के लिए जो किया वह )ण हम कभी नहीं उतार पाएंगे किन्तु आज वर्तमान आर्य समाज की जिम्मेदारी का भार हम सबके ऊपर है। पिछले दिनों हमने वहां के आर्य समाज से जुड़े लोग दिल्ली बुलाये यहाँ उन्हें महीनों शु( रूप से वैदिक हवन संध्या से परिचित कराया। उनके खाने ठहरने के अलावा आर्ष विद्वानों द्वारा लिखित नवीन साहित्य भी दिया।

चूँकि पिछले 120 वर्षों में वहां आर्य समाज का नवीन साहित्य नहीं पहुंचा था और न अधिक संख्या में आर्य महानुभाव वहां गये। इस कारण कुछ जगहों पर वहां आर्य समाज की वैदिक विचाधारा कमजोर हुई इसी कारण वहां आर्य महासम्मलेन होना समय की मांग के साथ स्वामी के सपने का भार खुद के कन्धों पर उठाने बीड़ा हम सभी आर्यों ने उठाया। लेकिन हम फिर कहते हैं यह कार्य किसी एक व्यक्ति का नहीं है आप सभी लोगों द्वारा जो साहस और प्रेरणा पूर्व के महासम्मेलनों शिकागो, हॉलैंड, मॉरीशस, सूरीनाम, बैंकाक से लेकर दक्षिण अफ्रीका सिंगापुर, आस्ट्रेलिया और नेपाल में मिलती रही उसी की आकांशा में बर्मा की भूमि आपकी राह देख रही है कुछ इस विश्वास के साथ कि आप आयेंगे तो वहां मजबूत होगा आर्य समाज।

-विनय आर्य

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