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50 फीसदी आबादी अछूत कैसे?

राजीव चौधरी

नेताओं के दिमाग से लेकर आम जनजीवन तक जातिप्रथा अपने पुरे चरम पर दिख रही है. भले ही हमें आज यह एक आध घटना लगे लेकिन भेदभाव के इस बीज को खाद बराबर मिल रहा है जो आने वाले दिनों एक विशाल वृक्ष बनकर खड़ा हो जायेगा. हाल ही में मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में जो हुआ वह किसी ने कभी सोचा नहीं होगा यहां बच्चों ने केवल इस बात पर मिड डे मील खाने से इनकार कर दिया क्योंकि वह एक दलित महिला ने अपने घर पर बनाया था. केवल 12 बच्चें ही खाना खाने आये. बाकि के बच्चों ने यह कहते हुए खाने का बहिष्कार कर दिया कि, यह खाना एक छोटी जाति की महिला ने अपने घर पर बनाया है जिसे हम नहीं खा सकते.

कुछ लोग सोचेंगे इस खबर से नये पाकिस्तान बनने का क्या अर्थ है! परन्तु अर्थ है और इतना ही गहरा है जितना एक बीज के अन्दर छिपे एक पेड़ का अस्तित्व. बस उसे मिटटी खाद पानी मिल जाये तो वो पनप जाता है. हम हिन्दू एकता के कसीदे पढ़ते है पर सवाल यह है यदि बच्चों को मिड डे मील परोसने वाली कोई मुस्लिम या इसाई महिला होती तो क्या बच्चे उस भोजन को खाने से इंकार करते? शायद नहीं! आखिर किसने सिखाया उन मासूम बच्चों को कि यह अछूत है इसके हाथ का बना खाना खाने से हम अछूत हो जायेंगे?जवाब शायद सबके मन में हो पर जबान पर आने से अटक रहा हो. क्या आपको नहीं लगता कि जाति प्रथा ने देश की 50 फीसदी आबादी को अछूत और सामाजिक स्तर पर कमजोर बनाकर रख दिया. यदि देश की सामाजिक दशा ठीक रही होती तो क्या बड़ी संख्या में धर्मांतरण होता? यदि धर्मांतरण नहीं होता तो क्या साम्प्रदायिक बटवारे का प्रश्न उठता? क्या पाकिस्तान बनता?

70 साल बीत गये पीढियां बदल गयी लेकिन हमारी सोच नहीं बदली कई जगह आज भी अगर किसी हैण्ड पम्प पे चले जाए पानी के लिए तो नल अछूत, बाल्टी पर हाथ लग जाये तो बाल्टी अछूत, हाँ यदि कोई इसाई या मुस्लिम आ जाये तो कोई बात नहीं उसका सत्कार करेंगे आखिर अपनों से यह फासला क्यों? स्वामी श्रद्धानन्द जी कहा करते थे कि मन की बुराइयों को मारो, तभी सारे समाज का उद्धार होगा. अगर आपने खुद को सुधार लिया तो समाज को और फिर देश को सुधरने में देर नहीं लगेगी. कुछ लोगों का मानना है कि भारत में इस्लाम का प्रचार-प्रसार बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में हुआ है. हिन्दुओं के इस्लाम ग्रहण करने का सबसे मुख्य कारण रहा जातिवाद, घोर अन्ध विश्वास और हिंसक बल प्रयोग. इस प्रकार, जातिवाद के कुचक्र के कारण अनेक स्थानों पर हजारों हिंदू वीरों को परिवार सहित जिन्दा रहने के लिए ऐसी घोर अपमानजनक शर्त स्वीकार करनी पड़ी. मुस्लिम आक्रान्ताओं ने पूरे हिंदू समाज पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति पर काम किया और उन्होंने समाज से बहिस्कृत जातियों को साथ लेकर भारत के धार्मिक आंकड़ो को बदलकर रख दिया

बहराल हम यहाँ हजार वर्षों से भी अधिक चले धर्मांतरण का वह सबसे अधिक मार्मिक और पीड़ाजनक अध्याय नहीं उठाना चाहते बस यह बताना चाहते है कि हमारी हजार वर्षो की गुलामी का कारण जातिवाद रहा भारतवर्ष के खंड-खंड बाँटने का कारण जातिवाद रहा. आज थोडा गंभीरता से अध्ययन करे तो जानेगें कि भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने का शोर करने वाले खुद को कहाँ पाएंगे! इस समय देश की हिन्दू आबादी लगभग 80 करोड़ है जिसमें 50 फीसदी से ज्यादा वे लोग है जिन्हें शुद्र मानसिकता के लोग अछूत मानते है. यदि यह लोग इसी तरह प्रताड़ित अपमानित होते रहे तो हिन्दू कहाँ रह जायेंगे? ध्यानपूर्वक देखे तो पूवोत्तर राज्य इसाई बहुल हो चुके है. केरल, कश्मीर, आंध्रप्रदेश, पश्चिम बंगाल, आसाम के एक बड़ा हिस्से समेत उत्तर प्रदेश के धार्मिक आंकड़े एक नजर में हिन्दू होने गुमान ढीला कर देते है.

कुछ लोग कहते है जातिवाद तो पुरातन काल से प्रभावी था इसमें किसी का क्या दोष! लेकिन यह बिलकुल सच नहीं है हिन्दुओं में आदिकाल से गोत्र और वर्ण व्यवस्था थी, परन्तु जातियाँ नहीं थीं. वेद सम्मत वर्ण व्यवस्था समाज में विभिन्न कार्यों के विभाजन की दृष्टि से लागू थी. यह व्यवस्था जन्म पर आधारित न होकर सीधे-सीधे कर्म पर आधारित थी. कोई भी वर्ण दूसरे को ऊँचा या नीचा नहीं समझता था. इसका सबसे बड़ा उदहारण अपने प्रारंभिक जीवन में शूद्र कर्म में प्रवृत्त वाल्मीकि जी जब अपने कर्मों में परिवर्तन के बाद पूजनीय ऋषियों के वर्ण में मान्यता पा गए तो वे तत्कालीन समाज में महर्षि के रूप में प्रतिष्ठित हुए. मर्यादा पुरषोत्तम राम के विवाह उपरांत सभी प्रतिष्ठित ब्राह्मणों को दान और उपहार देने के लिए श्री वाल्मीकि जी को ही विशेष आदर के साथ आमंत्रित किया था.

लेकिन समय के विसंगतिया पनपती गयी समाज पर प्रभुत्व स्थापित करने वाले लोगों ने धार्मिक सामाजिक ताना-बाना बिगाड़कर रख दिया. तत्कालीन सम्मान और आत्ममुग्धता के भूखे राजाओं ने भी इन्ही विसंगतियों और कुप्रथाओं को सच मान लिया. जिस कारण समाज के बड़े निर्धन वर्ग को अछूत करार दिया गया. परन्तु यह लोग फिर भी छुप-छुप कर अपने सभी उत्सव मनाते रहे और सनातन धर्म की पताका को अपने हृदयाकाश में लहराते रहे. जिन्हें उस समय एक बड़े वर्ग ने जाति के नाम पर प्रताड़ित किया तथा मुस्लिम आतातियों ने धर्म के नाम पर लेकिन वे लोग फिर भी अपने धर्म मार्ग पर डटें रहे क्या उनका यह त्याग कम रहा है? जिनका सब कुछ खण्ड-खण्ड हो चुका था, परन्तु, उन्होंने धर्म के प्रति अपनी निष्ठा को लेशमात्र भी खंडित नहीं होने दिया. जरा सोचिये, हिंदू समाज पर इन कथित अछूत लोगों का कितना बड़ा ऋण है. यदि उस कठिन काल में ये लोग भी दूसरी परिणति वाले स्वार्थी हिन्दुओं कि तरह ही तब मुसलमान बन गए होते तो आज अपने देश का इतिहास भूगोल क्या होता? और सोचिये, आज हिन्दुओं में जिस वर्ग को हम अनुसूचित जातियों के रूप में जानते हैं, उन आस्थावान हिन्दुओं की कितनी विशाल संख्या है, जो मुस्लिम दमन में से अपने धर्म को सुरक्षित निकालकर लाई है. क्या इनका अपने सनातन हिंदू धर्म की रक्षा में इनका पल-पल अपमानित होना कोई छोटा त्याग था? क्या इनका त्याग ऋषि दधिची के त्याग की श्रेणी में नहीं आता? यदि आता है तो अब यह छूत-अछूत का आडम्बर हटा देना होगा वरना धर्मपरिवर्तन के कुत्सित जाल में फंसकर आगे भी पाकिस्तान बनते रहेंगे…

 

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