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बांग्लादेश को इस तरह बनाया जा रहा है इस्लामिक मुल्क

शायद कोई ज्वलनशील पदार्थ उतना तेजी से आग नहीं पकड़ता जितना तेजी से मजहबी भावना. हाल में एक बार फिर बांग्लादेश सुलग उठा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए हैं. साम्प्रदायिक दंगे में पुलिस की गोली से चार लोगों की मौत भी हो गई. हिंसा का वजह एक हिंदू युवक बिप्लब चंद्र बैद्य की फेसबुक आईडी से एक टिप्पणी की गई थी, जिसमें कथित तौर पर पैगम्बर की निंदा की गई थी. इसके बाद करीब 20 हजार लोगों की भीड़ युवक को फांसी देने की मांग कर रहे थे.

इस घटना में आरोपी हिंदू युवक ने पुलिस को बताया कि उसका फेसबुक अकाउंट हैक हो गया था उसे खुद नहीं पता कब कहाँ किसने उसके अकाउंट से यह पोस्ट डाली गयी है. लोग इसे मानने को तैयार नहीं स्थानीय इस्लामिक और मदरसा संगठन सजा देने की मांग को लेकर सड़क पर प्रदर्शन करने लगे. इसे लेकर उन्होंने एक बड़ी पंचायत भी बुलाई थी.

देखा जाये तो बांग्लादेश में कोई नई घटना नहीं है वहां से अल्पसंख्यक हिन्दू और बौद्ध समुदाय को मिटाने का यह नाटक कई बार बांग्लादेश की सड़कों पर खेला गया है. पहले किसी अल्पसंख्यक युवा को निशाना बनाते हुए उसका सोशल मीडिया अकाउंट हैक किया जाता है और फिर पैगंबर के ख़िलाफ कोई पोस्ट करके भीड़ को इकट्ठा किया गया और अल्पसंख्यकों समुदायों के मंदिरों में तोड़फोड़ घरों में लूटपाट तथा व्यभिचार किया जाता है. बांग्लादेश में पहले भी इस तरह की घटनाएँ हो चुकी हैं

साल 2012 में कॉक्स बाजार के पास रामू नाम की जगह पर ऐसी ही घटना हुई थी. वहां बौद्ध आबादी अधिक रहती है. वहां उत्तम देव नाम के एक बौद्ध युवक की फेसबुक आईडी हैक हुई थी और इस मामले में भी ईश निंदा का इल्जाम लगाया गया था. इसके बाद कई बौद्धों के घरों में आग लगा दी गई और कई बौद्ध मंदिरों को नुक़सान पहुंचाया गया. इसी तरह 2016 में ब्रामन बारिया जगह पर एक हिंदू युवक के साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ था. ऐसी कई अन्य घटनाएं हुईं, लेकिन इन मामलों में किसी को सजा हुई हो ऐसा कभी नहीं सुना गया. ताजा घटना में भी अज्ञात लोगों के ख़िलाफ मामला दर्ज किया गया है.

सभी जानते है बांग्लादेश की 16.80 करोड़ की आबादी में 90 प्रतिशत लोग मुसलमान हैं. जिसे वहां के कट्टरपंथी नेता पूरा सौ फीसदी करना चाहते हैं पिछले दिनों 1971 के मुक्ति संग्राम बांग्लादेश के खिलाफ साजिश में जब एक इस्लामी नेता दिलावर हुसैन सईदी को मौत की सजा सुनाई गयी तो उसके शुरु हुई हिंसा में  तीन हिंदुओं के मंदिर, एक बौद्ध मंदिर, 15-16 बुद्ध की प्रतिमाएं, एक अनाथालय और एक उच्च विद्यालय को जलाया और तोड़फोड़ की गयी जबकि इस्लाम से जुड़े सभी धार्मिक स्थानों को इससे दूर रखा गया.

इस तरह के विचारों से बांग्लादेश में बढ़ता कट्टरपंथ दिखता है. बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष देश है. यहां मुस्लिमों का बहुमत है. बांग्लादेश में हजारों चरमपंथी समूह हैं जो वहां के अल्पसंख्यक वर्ग के लिए हर समय खतरा है. इनके खिलाफ बोलने वालों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखते हैं. इस तरह की अवधारणा के पीछे कोई बुनियाद हो या न हो पर पूरी दुनिया इस बात से परिचित है कि बीते कुछ सालों में बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष लेखकों, ब्लॉगरों, प्रोफेसर, समेत अब तक दर्जनों लोगों की हत्या हो चुकी है.

बात केवल धार्मिक स्थानों तक सिमित नहीं है कभी बांग्लादेश की नींव भी भारत की तरह धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर रखी गई थी. वहां की आजादी के लिए हिन्दुओं के बलिदान काम नहीं थे. लेकिन बहुत कम समय में ही वहां साम्प्रदायिकता इस कदर हावी हुई कि अक्टूबर, 2001 जब पूर्णिमा रानी के घर पर करीब 30 लोगों ने हमला किया. उनका कुछ लोगों से जमीन को लेकर विवाद था. जिसकी कीमत मासूम पूर्णिमा ने चुकाई. हमलावरों ने माता पिता के सामने ही पूर्णिमा को हवस का शिकार बनाया था. जब दर्द से तड़फती बेटी की हालत को देख एक मां को भी एक कट्टरपंथी से कहना पड़ा, था “अब्दुल अली” मैं तुमसे रहम की भीख मांगती हूं, जैसा तुमने कहा मै मुसलमान न होने की वजह से अपवित्र हूं लेकिन मेरी बच्ची पर रहम करो. मै तुम्हारे पांव पडती हूं, वह अभी 14 साल की है, बहुत कमजोर है. अपने अल्लाह के लिए कम से कम एक-एक कर बलात्कार करो. यही नहीं अप्रैल, 2003 में एक किशोरी विभा सिंह स्कूल जाने के लिए घर से निकली थी जहाँ से उसका अपहरण कर लिया और अगले छह दिन तक खुलना शहर में उसे तीन अलग-अलग घरों में रखा गया जहां बड़ी निर्ममता से उसको शारीरिक यातनाएं दी गईं. इतना ही नहीं, गुंडों ने बर्बरता की सभी सीमाएं लांघीं और उसके शरीर के विभिन्न अंगों पर ब्लेड और चाकू से चीरा लगाया. न जाने इन देशो में ऐसी कितनी घटना धर्म के नाम पर होती है. लेकिन भारत के बहुत पढ़े लिखे और अत्यधिक शिक्षित कथित धर्मनिरपेक्षवादी, अभिव्यक्ति के नाम पर छाती कूटने वाली सेकुलर जमात को इन मासूमों की सिसकियाँ सुनाई नहीं देती.

लेख-राजीव चौधरी

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