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केरल के बाद लद्दाख निशाने पर

किसी समुदाय को जब अपना अस्तित्व बचाना होता है तो तो वह उसके लिए शांत रहने का समय नहीं होता कुछ इसी वजह से आज बुद्ध के अहिंसा-शांति के उपदेशों के रास्ते को छोड़कर आक्रमण की नीति अपनाने को मजबूर हो रहा बोद्ध समुदाय. मोक्ष की साधना आखिर शांतिमय वातावरण चाहती है. किन्तु अपनी परम्परा अपनी संस्कृति और समुदाय को बचाने के कई बार अन्य रास्ते भी तलाश करने पड़ते है. शायद इसी कारण पुरे बर्मा के बाद आज लद्दाख के बौद्ध उग्र हो रहे है. उन्होंने साफ कहा कि अब यदि हमें इंसाफ नहीं मिला तो देश से बौद्धों का सफाया हो जाएगा और लद्दाख मुस्लिम देश हो जायेगा.

इन दिनों जब भारत रोहिंग्या मुस्लिमों को टकराव का मैदान बना है इसी बीच कुछ घटना ऐसी भी घट रही है जिनपर सोचना और आवाज उठाना जरूरी बन गया है. हाल ही में लद्दाख में बौद्ध लड़कियां लव जिहाद का शिकार बनायी जा रही हैं ताकि लद्दाख को भी मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनाया जा सके. खबर के मुताबिक इस मामले को लेकर लद्दाख बुद्धिस्ट एसोशिएशन अब प्रधानमंत्री मोदी से मिलने की सोच रहा है ताकि लद्दाख में बौद्ध महिलाओं और लड़कियों को बचाया जा सके. बुद्धिस्ट एसोसिएशन का कहना है मुस्लिम नौजवान खुद को बौद्ध बताकर लड़कियों से जान पहचान बढ़ाते हैं और शादी कर लेते हैं. बाद में पता चलता है कि वो बौद्ध नहीं मुस्लिम हैं.

लद्दाख में लेह और करगिल दो जिले हैं और यहां की कुल आबादी 2,74,000 है. यहां मुस्लिमों की आबादी 49 फीसदी है. जबकि लद्दाख में बौद्धों की आबादी 51 फीसदी है एलबीए की आपत्ति इस बात पर है कि राज्य प्रशासन कथित तौर पर बौद्ध लड़की के धर्म परिवर्तन के मामले की अनदेखी कर रहा है. . 1989 में, यहां बौद्धों और मुस्लिमों के बीच हिंसा हुई थी. इसके बाद एलबीए ने मुस्लिमों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया, जो 1992 में हटा था.

दरअसल जम्मू-कश्मीर के भारत में शामिल होने के फैसले के ठीक बाद लद्दाख के बौद्ध राज्य में शेख अब्दुल्ला और कश्मीर के प्रभुत्व का विरोध करने लगे. 1947 के बाद कश्मीर के पहले बजट में लद्दाख के लिए कोई फंड निर्धारित नहीं किया गया. और तो और, 1961 तक इस क्षेत्र के लिए अलग से कोई योजना नहीं बनाई गई थी. मई 1949 में एलबीए के अध्यक्ष चेवांग रिग्जिन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक प्रस्ताव भेजकर अपील की कि कश्मीर में मतदान संग्रह में यदि बहुमत का फैसला पाकिस्तान के साथ विलय के पक्ष में जाता है तो यह फैसला लद्दाख पर नहीं थोपा जाना चाहिए. उन्होंने सुझाव दिया कि लद्दाख का प्रशासन सीधे भारत सरकार के हाथों में हो या फिर जम्मू के हिंदू बहुल इलाकों के साथ मिलाकर इसे अलग राज्य बना दिया जाना चाहिए अथवा इसे पूर्वी पंजाब के साथ मिला दिया जाना चाहिए. उन्होंने दबी जुबान में यह चेतावनी भी दे डाली कि ऐसा न होने पर लद्दाख तिब्बत के साथ अपने विलय पर विचार करने को मजबूर हो सकता है.

आजादी के 70 वर्ष बाद एक बार फिर बोद्ध उसी प्रार्थना की ओर दिख रहे है. हो सकता लद्दाख का लव जिहाद पाकिस्तान की ही एक नीति का हिस्सा हो क्योंकि पाकिस्तान चाहता है कि जब कभी कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की नजरो तले जनमत संग्रह हो तब तक कश्मीर का धार्मिक संतुलन इस्लाम के पक्ष में हो ताकि इससे लोगो को इस्लाम की दुहाई देकर वो आसानी से उसे अपने हिस्से में मिला सके. उसकी इसी योजना का शिकार 90 के दशक में कश्मीरी हिन्दू बन चुके है.

फिलहाल जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने प्रशासन से इस जोड़े को परेशान न करने को कहा है. जबकि बुद्धिस्ट एसोसिएशन का कहना कि जम्मू सरकार बौद्धों को खत्म करना चाहती है लेकिन हम अपने खून की आखिरी बूंद तक लड़ेंगे. यहाँ मुस्लिम लड़कों ने खुद को बौद्ध बताकर उन्हें अपने झांसे में लिया. शादी के बाद लड़कियों को पता चलता है की वे मुस्लिम हैं. इसके बाद समझोते और पछतावे के अलावा क्या बचता है, 2003 से अब तक यहां पर 45 से ज्यादा लड़कियों को लव जिहाद का शिकार बनाया गया और हमेशा की तरह दावा यही किया गया कि उन्होंने ऐसा अपनी इच्छा से किया है. जब केरल, बंगाल और उत्तर प्रदेश से  लव जिहाद की खबरें आ रही हैं कि पापुलर फ्रंट आफ इंडिया के लोग हिन्दू और ईसाई व मतो की लड़कियों को लव जिहाद का शिकार बना रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद अब इस मामले की जांच एनआईए को सौंपी गयी है. एनआईए ने अपनी शुरुआती जांच में इन आरोपों को सही पाया है और अब केन्द्र सरकार पापुलर फ्रंट आफ इंडिया और उससे जुड़े संगठनों को बैन करने की तैयारी कर रहा है.

हलांकि इन घटनाओं पर पूर्व की भांति राजनीति होगी और राजनीति का एक धडा इस कथित अल्पसंख्यक समुदाय की ढाल बनकर खड़ा दिखाई देगा. लेकिन शायद अल्पसंख्यक कौन होते है कैसे होते है यह बात इराक का यजीदी समुदाय और पाकिस्तान के हिन्दू समुदाय से बेहतर कौन जान सकता है. लेकिन प्रकृति पूजक, बौद्ध तंत्र तथा बौद्ध मत को मानने वाला यह समुदाय ह न तो घृणा फैलाने में विश्वास रखते हैं और न हिंसा के समर्थक हैं, लेकिन कब तक मौन रहकर सारी हिंसा और अत्याचार को झेलते रह सकते हैं?

-राजीव चौधरी

 

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