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क्यों नाराज है एनसीआरटी से पूर्वोत्तर भारत ?

RAJEEV CHOUDHARY

जिन्होंने 1947 में मजहब के नाम पर अलग देश ले लिया उन्हें तो इस देश के पाठ्यक्रम ने पूरा सम्मान दिया और जिन लोगों 1962 में चाइना के साथ युद्ध में इस देश के लिए अपना बलिदान दिया उन्हें देश के स्कूली पाठ्यक्रम से बाहर फेंक दिया। कुछ दिन पहले ऐसा ही कुछ भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लोग कह रहे थे। सोशल मीडिया के एक प्लेटफार्म ट्विटर से उठे इस आन्दोलन का उद्देश्य एनसीईआरटी की किताबों में पूर्वोत्तर के राज्यों को लेकर एक अलग से अध्याय शामिल करवाना है, जिससे की देशभर में बाकी लोगों को नॉर्थ ईस्ट का इतिहास, जीवनशैली और देशभक्ति के बारे में पता चल सके।

देखते ही देखते इस स्टॉर्म से लोग जुड़ने लगे और कबांग नाम के एक यूजर ने इस ट्रेंड का समर्थन करते हुए लिखा, नॉर्थ ईस्ट इंडिया का एक आम नागरिक होने के नाते मैं गर्व के साथ इस ट्विटर स्टॉर्म से जुड़ रहा हूं। देश और पूरी दुनिया को हमारे इतिहास, भूगोल और संस्कृति के बारे में जानना चाहिए। एक अन्य ट्विटर हेंडल मीको साइकिया ने इस इस ट्रेंड का समर्थन करते हुए लिखा कि एनसीईआरटी की किताब में नॉर्थ ईस्ट इंडिया को लेकर सेक्शन शामिल होगा तभी तो हम इस बात को जान पाएंगे कि नागालैंड में भारत के आखिरी हैडहंटर ट्राइब्स पाए गए। इसके अलावा इस ट्रेंड में शामिल एक जेस्से चीशी नाम के एक ट्विटर यूजर ने इस ट्रेंड का समर्थन करते हुए लिखा हम अपने देश में ही एलियन बनकर नहीं रहना चाहते। एनसीईआरटी की किताब में नॉर्थ ईस्ट के लिए चैप्टर एड कीजिए।

दरअसल पिछले कुछ समय से उत्तर भारत समेत अनेकों जगह एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम को लेकर कई लोग मुखर है। उनके सवाल है कि किसी अध्याय में एनसीईआरटी रीना को लेटर लिखना सिखा रहा है कि अहमद को रीना लेटर कैसे लिखे, और बच्चों को सिखा रहा है कि दीवाली पर पटाखे जलाने से शोर होने के कारण दिवाली बुरा पर्व है, लेकिन बकरीद पर मासूम जानवर को हलाल करना उसके लिए अच्छा है। सिर्फ इतना ही नहीं एनसीईआरटी कक्षा एक के बच्चे के सामने मौलाना साहब को शिक्षित और कक्षा दो के बच्चे के सामने पंडितजी को हसोड़ बेवकूफ साबित करने में लगा है।

सिर्फ यही नहीं कई लोगों ने सवाल किया है आखिर छठी कक्षा के लिए प्रकाशित हिंदी की किताब में भारत के आराध्य श्री राम के खिलाफ घृणा और 12वी कक्षा के प्रकाशित राजनीति शास्त्र की किताब में मुस्लिम धर्म को हिंदू से बेहतर बताया गया है। इसके अलावा एनसीईआरटी अपने पाठ्यक्रम में अंडों को भी प्रोमोट कर रहा है।

असल में पिछले दिनों एक यूट्यूबर द्वारा अरुणाचल को चाइना का हिस्सा बताये जाने के बाद इस ट्विटर स्टॉर्म में देशभर के 30 स्टूडेंट्स यूनियन और ऑर्गनाइजेशन शामिल हुए। इस मूवमेंट का नाम ए चेप्टर फॉर नार्थ ईस्ट  रखा गया। जिससे की देशभर में एनसीईआरटी की किताबों से लोगों को नॉर्थ-ईस्ट राज्य का इतिहास, जीवनशैली, लाइफस्टाइल और देशभक्ति के बारे में पता चल सके।

हालाँकि पूर्वोत्तर भारत की देशभक्ति के बारे कुछ समय पहले किरण रिजिजू ने बताया था कि 1962 के युद्ध में चीनियों ने उनके गांव पर कब्जा कर लिया और असम तक पहुंच गए। जबकि नेहरू ने क्षेत्र के लोगों को आश्वासन दिया था कि हम आपको बचाएंगे। लेकिन बाद में उन्होंने आकाशवाणी पर चीन के सामने  आत्मसमर्पण की घोषणा कर दी थी। नेहरू ने टाटा, बाय-बाय कहा और हमें छोड़ दिया। लेकिन इसी नार्थ ईस्ट के देशभक्त लोगों ने उस समय जोर दिया कि भारत को समर्पण करने की जरूरत नहीं है। हम भारत नहीं छोड़ेंगे और भारत के साथ एकजुटता से खड़े रहेंगे।

अब सवाल ये है कि आखिर एनसीईआरटी पूर्वोत्तर के देशभक्त लोगों का गरिमामयी इतिहास उनका कल्चर क्यों नहीं जोड़ सकती और अभी एनसीईआरटी जो अब पढ़ा रहा है उससे कितना लाभ बच्चों को होगा? क्योंकि इनकी कविता देख लीजिये, ये लिखते है कि रात हुई तारीकी छाई मीठी नींद सभी को आई मुन्नू सोया अप्पा सोई अब्बा सोये अम्मी सोई। अब ये कविता एनसीईआरटी ने शामिल की या फिर 1947 के बंटवारे वाले उर्दूवुड ने आप खुद समझ सकते है!

यही नहीं सच्चर कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि देश में मुस्लिम समाज पिछड़ा है, दीन-हीन है। लेकिन एनसीईआरटी की किताबें इस बात को नहीं मानती वो तो बच्चों के दिमाग में भर रही है कि हिंदु समाज पिछड़ा है। अब यही बात हिन्दुओं को लेकर पाकिस्तान का पाठ्यक्रम कहता है तो दोनों देशों के पाठ्यक्रम में अंतर कैसे खोजे ?

क्योंकि एनसीईआरटी की किताबों में हरि नाम का हिन्दू लड़का लड़कियों को छेड़ता है, उन्हें चिकोटी काटता है और अब्दुल उन्हें बचाता है। कक्षा तीन और चार के गणित की किताबों में कुतुबमिनार और ताजमहल जैसी मजहबी जगहों को प्रमोट करता है। 2007 में तैयार की गई एक पुस्तक में द लिटिल बुली चैप्टर के माध्यम से छोटे बच्चों में नाम हरि के नाम पर एक ऐसे बच्चे की कहानी कही गई है जो लड़कियों पर धौंस जमाता है, सब बच्चे उससे डरते हैं और उससे नफरत करते हैं, उससे दूर रहते हैं और आखिर में एक केकड़ा उसे काटकर सबक सिखाता है। अब ये कहानी कहाँ से आई! इस बात को समझने के लिए द लिटिल बुली की मूल लेखक और उसकी मूल कहानी को तलाशना होगा। असल में यह कहानी मूल रूप से बच्चों की कहानी लिखने वाली ब्रिटेन की एनिड ब्लिटन के 1946 में प्रकाशित कहानियों के लोकप्रिय संग्रह चिमनी कॉर्नर स्टोरीज से ली गयी है। इस कहानी में मूल चरित्र का नाम है हेनरी बस फिर क्या था वहां से कहानी उठाई दे मारी एनसीईआरटी में और हेनरी बना दिया गया हरी।

असल में दा गेम्स ऑफ बुक के ट्विटर हेंडल ने एनसीईआरटी की पूरी कलाई खोल कर रख दी कि सरकारों ने शिक्षा क्षेत्र को दशकों से वामपंथियों के मानसिक दिवालियेपन को भेंट चढ़ा रखा है। अब पूर्वोत्तर के लोग थोड़े जागरूक हुए अपनी मांग लेकर सामने आये उनकी मांग है कि नॉर्थ ईस्ट का इतिहास पूरी तरह से धुल चुका है। अब एनसीईआरटी की किताबों में उनके इतिहास और डेमोग्राफी पर अध्याय शामिल किया जाए। जिससे की देशभर में उनके साथ रेसिज्म की घटना ना हो और उन्हें भी भारतीय समझा जाए।

साथ ही अब्दुल इन द गार्डन जैसी कहानियाँ और एनसीईआरटी के पाँचवीं तक के पाठ्यक्रम में लगभग हर विषय की किताब में बादशाह अकबर होता है और बहुत अच्छे रूप में आता है। ऐसा लगता है कि हिंदुस्तान में अकबर के अलावा कोई दूसरा राजा हुआ ही नहीं है। बच्चे अकबर को तो जानते हैं, लेकिन पाँचवीं क्लास तक के पाठ्यक्रम में न तो प्रताप हैं, न शिवाजी और न लक्ष्मीबाई, तो देश के लिए मरने मिटने वाले इन शूरवीरों के बारे में बच्चें कब जानेगे?

RAJEEV CHOUDHARY

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