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पहले मासूम बचपन बचाओं!!

देश के अन्दर रीति-रिवाज बचाने की बात होती है, प्रथाओं-कुप्रथाओं को बचाने के लोग भिड जाते है कोई मजहब बचाने की बात करता है कोई जाति या उनसे उत्पन्न विसंगतियां, लेकिन इस और किसी का ध्यान नहीं है कि पहले राष्ट्र का भविष्य, हमारी भावी पीढ़ी यानि आज का बचपन इसे बचाओं! आज राष्ट्र का भविष्य कहे जाने वाले बच्चों में नशा़खोरी की लत इस तेजी से बढ़ रही है कि दस वर्ष की आयु में प्रवेश करते ही ज्यादातर बच्चे विभिन्न प्रकार के नशीले और मादक पदार्थों का सेवन करने लगते हैं.

बच्चों में नशा़खोरी की लत का अध्ययन करने वालों का कहना है कि ज्यादातर बच्चों को नशे की लत उनके वयस्क या हमउम्र नशा़खोरों के जरिए ही लगती है. परिवार की उपेक्षा के कारण ये भोले-भाले बच्चे नशा कराने वाले को ही अपना मित्र और सच्चा हमदर्द मान लेते हैं और नशे की आदत में पड़कर हर तरह के शोषण का शिकार हो जाते हैं.

नशे की गिरफ्त में आए बच्चे जब मनचाहा नशा नहीं कर पाते हैं तो वे खून में बढ़ती मादक पदार्थो की मांग को पूरा करने के लिए शरीर के लिए घातक पदार्थों का भी सेवन करने लगते हैं, जैसे कि बोन फिक्स, क्यूफिक्स और आयोडेक्स. कई बच्चे तो पेट्रोल और केरोसिन सूंघकर नशे की प्यास बुझाते हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ के नारकोटिक्स नियंत्रण बोर्ड और  2013  की एक सरकारी रिपोर्ट से पता चला कि भारत में नशे के आदी हर पांच में से एक व्यक्ति की उम्र 21 साल से कम है.

विशेषज्ञों का मानना है कि अपने साथ के लोगों की देखादेखी, साथियों के दबाव और पढ़ाई की चिंता के कारण कई बच्चे तो 11 साल की उम्र से ही नशे के लिए ड्रग्स लेना शुरु कर देते  हैं. इनमें से करीब 5 फीसदी की उम्र 12 से 17 साल के बीच पाई गई.  बेघर बच्चों के बीच तो यह समस्या और भी गंभीर है. रिपोर्ट में पाया गया कि भारत के करीब दो करोड़ बेघर बच्चों में से 40-70 फीसदी किसी ना किसी तरह के ड्रग्स के संपर्क में आते हैं और इनमें से कई को तो पांच साल की उम्र से ही नशे की लत लग जाती है.

बात केवल एक शहर या स्थान की नहीं है राजधानी दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर नवी मुंबई के अनेकों कोनों में स्कूली यूनिफॉर्म पहने बच्चों को अक्सर घास रूपी नशीले पदार्थ खरीदते देखा जा सकता है. नशे वाले ये पौधे वहीं उगाए जाते हैं और चोरी-छिपे उन्हें बेचा जाता है. बच्चों को 50 से 100 रुपये अदा करने पर कई दिन के लिए नशे की यह सामग्री मिल जाती है और आजकल इतनी रकम पाना बच्चों के लिए आम बात है.

मांग बढऩे के साथ ही इन नशीली चीजों में भी मिलावट की जाती है  और इसमें रसायन, कीटनाशक पदार्थ और यहां तक की जूतों की पालिश भी मिलाकर बच्चों को दे दी जाती है. यह बेहद खतरनाक है और इन चीजों से और भी ज्यादा नशा होता है. ज्यादा समझने के लिए आमतौर पर किसी भी परचून या पान दुकान की से भोला गोली 2 से 5 रुपये में मिल जाती है, जो असल में भांग से ही बनती है. लड़कियां धूम्रपान करने में हिचकती हैं ऐसे में उनके लिए गांजे का पेस्ट होता है ‘वे इसे मसूढ़ों पर रगड़ती हैं और यह खून में मिल जाता है. इसकी खुशबू भी माउथ फ्रेशनर की तरह होती है, इसलिए लड़कियां पकड़ में भी नहीं आतीं.’ जब बच्चों में इस तरह के नशीले पदार्थ की लत बढ़ती है तो उनकी जेबखर्च की मांग भी बढ़ जाती है. लेकिन सभी माता-पिता बच्चों की अधिक जेबखर्च की मांग पूरी नहीं करते. ऐसे में बच्चे चोरी करने लगते हैं. कई बार तो नशीले पदार्थ बेचने वाले लोग शुरुआत में बच्चों को मुफ्त पैकेट देते हैं और बाद में नशे के लिए अधिक रकम वसूलते हैं क्योंकि उन्हें पता चल जाता है कि लत लगने के कारण बच्चे कहीं से भी पैसे का इंतजाम कर ही लेंगे.

नशे के गुलाम ये बच्चे या तो बेमौत मर जाते हैं या फिर अपराध की अंधी दुनिया में प्रवेश कर समाज और देश के लिए विकट समस्या बन जाते हैं. सरकार और समाज बच्चों को नशे की आदत से बचाने के जो भी उपाय कर रही हैं, वे पर्याप्त और प्रभावी नहीं हैं. इसलिए जरूरी है कि देश के भविष्य को पतन के रास्ते से बचाने के लिए परिवार से उपेक्षित, गरीब, अशिक्षित और बाल मजदूरी करने वाले बच्चों को नशे से बचाने के लिए गंभीरता से प्रभावी और कारगर उपाय किए जाने चाहिए.

इस विषय पर यदि शोधकर्ताओं की माने तो इसका सबसे बड़ा कारण संयुक्त परिवार के खत्म होने और एकल परिवार में माता-पिता दोनों के नौकरीपेशा होने की वजह से कई घंटे तक बच्चे किसी की निगरानी में नहीं रहते हैं और बच्चों की जिंदगी से स्थायित्व हटने लगता है. ऐसे में बच्चे अकेले में वहीं सब कुछ करना चाहेंगे जो उन्हें पसंद आता हो.  ऐसी स्थिति में बच्चे अपने दोस्तों और इंटरनेट पर ज्यादा निर्भर रहने लगते हैं, जहां उन्हें गलत सूचना भी मिलती है, मसलन पोर्न मूवी से लेकर भांग और गांजे के लाभ की सूचना.

अधिकांश बच्चे इन बातों पर भी गौर करते हैं कि उनके अभिभावक भी धूम्रपान कहते हैं तो इसका मतलब यह सब कुछ सामाजिक मान्यता प्राप्त कार्य है. इसमें कोई बुराई नहीं है. बीड़ी- सिगरेट, शराब आदि की लत बच्चों में कैसे पड़ती है, इस विषय पर मनोवैज्ञानिकों ने खूब अध्ययन किया है और वे बड़े विचित्र नतीजों पर पहुंचे हैं. उनका कहना है कि छोटा बच्चा जल्दी से जल्दी बड़ा होना चाहता है. आप बड़ों को सुहाने बचपन के गीत गाते सुनेंगे, मगर यथार्थ में ऐसा है नहीं. कोई बच्चा खुश नहीं है बच्चा होने से. उसको लगता है- मैं शक्तिहीन हूं, स्वयं कोई निर्णय नहीं ले सकता. छोटी सी छोटी चीजों के लिए दूसरों से पूछना पड़ता है, मेरी कोई स्वतंत्रता नहीं है. बड़े लोग स्वतंत्र हैं. इसलिए, बच्चा जल्दी बड़ा होना चाहता है. लेकिन वह यह भूल जाता है उम्र में बड़ा होने की यह चाहत उसकी उम्र की खत्म कर रही है.

विनय आर्य

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