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पाकिस्तान में शिक्षा के नाम पर नफरत

भारत में मुस्लिम आक्रान्ताओं की मजारों पर चादर चढाई जा रही है और पाकिस्तान में मंदिरों से लेकर हिन्दू संतों की समाधि में तोड़फोड़ की जा रही है। हाल ही में एक बार फिर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत जिसे केपीके भी कहा जाता है वहां कोहाट के करक जिले में भीड़ द्वारा एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की गई है। बड़ी संख्या में शांतिप्रिय समुदाय के लोग आये और समाधि में तोड़फोड़ कर दी। ये समाधि हिंदू संत श्री परम हंस जी महाराज की है साल 1919 में यहीं पर उनकी अंत्येष्टि की गई थी। उनके अनुयायी यहां पूजा-पाठ के लिए हर साल आते रहे थे। साल 1997 में ये सिलसिला उस वक्त रुक गया जब ये मंदिर ढहा दिया गया। इसके बाद हिंदू संत श्री परम हंस जी महाराज के अनुयायियों ने मंदिर के पुननिर्माण की कोशिशें शुरू कीं. हिंदू समुदाय के लोगों का आरोप था कि एक स्थानीय मौलवी ने सरकारी ट्रस्ट की प्रोपर्टी होने के बावजूद इस पर कब्जा कर लिया था।

खैर इस मामले भी पाकिस्तान सरकार चेक एंड बेलेंस वाले मोड़ में आई और मुंह उठाकर निंदा कर दी जैसे पहले से ही तय हो कि तुम तोड़ दो हम निंदा कर देंगे। साथ में दो चार मौलाना और मौलवी भी पकड़ लेंगे जो ये कह देंगे कि यह मजहब ए इस्लाम के खिलाफ है। असल में यह सब क्यों होता है क्या कारण है कि इस्लाम में किसी दुसरे मत सम्प्रदाय के धर्म स्थल से लेकर उपासना तक सब कुछ गिद्ध नजर से देखा जाता है? इसमें पहली तो है आसमानी किताब दूसरा इन इस्लामिक देशों का पाठ्यक्रम जो वहां बच्चों के दिमाग में ठूसा जाता है। असल में पाकिस्तान के स्कूलों में हिंदुओं, यहूदियों और बलोचों शिया अह्मदियाँ के प्रति घृणा पैदा करने वाले पाठ बच्चों को पढ़ाए जाते है। इससे अल्पसंख्यकों के प्रति पाकिस्तान में माहौल तैयार होता है। ये पाठ केवल मदरसों में ही नहीं बल्कि वहां की सेना द्वारा चलाए जा रहे उच्च स्तरीय कैडेट कॉलेज में बच्चों को जो पहला पाठ पढ़ाया जा रहे है, उसमें बताया गया है कि हिंदू काफिर होते हैं और यहूदी इस्लाम के दुश्मन होते हैं। इसलिए दोनों समुदाय के लोग मौत के हकदार होते हैं। इसमें सेना की वर्दी पहनने वाले शिक्षक बच्चों को बताते हैं कि हमें बंदूकों और बमों से प्यार करना चाहिए- उन्हें इज्जत देनी चाहिए, क्योंकि वे हिंदू माताओं को मारने के काम आते हैं। ये हिंदू औरतें ही हिंदू बच्चों को जन्म देती हैं. यह बात हम नहीं बल्कि पिछले दिनों बलोचों के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे मुनीर मेंगल ने संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा स्थित कार्यालय में कही थी।

अब हम ठहरे धर्मनिरपेक्ष देश हमारे बच्चों को तो पढाया जाता है कि सब धर्म बराबर होते है अकबर महान था, ओरंगजेब उदार शाशक था जहांगीर ने सडक बनवाई किसी ने कुआँ खोदा किसी ने पहाड़। सिर्फ यही नहीं हम तो इतने धर्मनिरपेक्ष है कि उत्तरप्रदेश के सरकारी स्कूलों में जब ग से गणेश पढाया जाता था तो धर्मनिरपेक्षता खतरें में आ गयी थी इसके बाद ग गधा और गमला किया गया मतलब गणेश जी साम्प्रदायिक थे गधा और गमला धर्मनिरपेक्ष बन गये।

लेकिन पाकिस्तान में ऐसा कुछ नहीं है उनके लिए हिन्दू अधम होते है पाकिस्तान की एक लेखिका है जुनैरा साकिब इस लेखिका ने पाकिस्तान में पनपते आतंक और हिन्दुओं, सिखों अहमदियों और बलूचों पर बढ़ते हमले जानने के लिए अनेकों सरकारी स्कूलों का दौरा किया वहां के पाठ्यक्रम देखे एक पुस्तक मुतालिआ-ए-पाकिस्तान किताब का हवाला देते हुए बताया कि उक्त किताब हिन्दू और यहूदी विरोध से भरी पड़ी है इसके अलावा जुनैरा ने देखा स्कुल में जब टीचर ने बच्चों से पूछा हम सब कौन हैं?

बच्चें बोलते है मुसलमान। तभी एक बच्चा खड़ा होकर कहता है “लेकिन टीचर मैं तो मुसलमान नहीं” मैं तो वो यानि अपने शब्द पुरे भी नहीं कर पाया था कि टीचर बोल उठा चुप! भंगी कहीं का चुप रह! यहां रहना है तो चुप रह। टीचर फिर अगला सवाल पूछता है हिन्दू कौन है? बच्चें बोलते है हिंदू इंडिया में रहने वाले रजील लोग हैं। ये हमारे दुश्मन हैं। आपको बता दे रजील का हिंदी अर्थ होता है अधम, कमीना, नीच।

अब इस सवाल पर वहां पढने वाला एक बच्चा बोल उठा लेकिन टीचर मैं तो हिन्दू हूं। मैं तो पाकिस्तानी हूं, तो टीचर बोलता है हिंदू हो तो हिंदुस्तान जाओ ना!! इसके बाद जुनैरा साकिब एक दूसरे स्कुल में गयी वहां पढाया जा रहा था यहाँ टीचर पूछता है बच्चों सब से अच्छा मजहब कौन सा है?” बच्चें बोलते है सब से अच्छा मजहब इस्लाम है। एक बच्चा चुप रहा टीचर ने उससे पूछा क्यूं बे तू नहीं बोल रहा है, बच्चा बोला जी मेरा मजहब तो कुछ और है। अब टीचर की आँखों में मानो खून उतर आया उसने कहा इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान है। ये इस्लामी जम्हूरिया. समझा क्या? सब से अच्छा मजहब इस्लाम, बाकी सब बकवास। और आगे कहता है कि दो कौमी नजरिया ये है कि हिंदू और मुसलमान दो अलग अलग कौमें हैं और ये मिल कर नहीं रह सकतीं. इसीलिए हमने पाकिस्तान बनाया।

इसके बाद जुनैरा साकिब ने एक और स्कूल का दौरा किया यहाँ मास्टर पूछ रहा था कि जिहाद क्या होता है तो बच्चें बोलते है जिहाद अल्लाह की राह में काफिरों के खिलाफ जंग को कहते हैं। टीचर कहता है शाबास अच्छा अब ये बताओ काफिर कौन होता है? बच्चें बोलते है जो मुसलमान न हो। टीचर खुश होकर कहता है बहुत बढ़िया पाकिस्तानी हिंदू, ईसाई, यहूदी, कादियानी, शिया, सब काफिर हैं उन के खिलाफ जिहाद हमारा फर्ज है।

ये केवल एक जुनैरा साकिब की बात नहीं है पिछले कुछ समय पहले पाकिस्तान की कायदे आजम यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर परवेज हुदबोय तो इस मुद्दे को टीवी पर लेकर बोले थे खुल कर कहा था कि पाकिस्तान में विज्ञानं या अन्य विषयों पर अक्ल का प्रयोग करना जुर्म है। यहाँ कालिजो में प्रोफेसर को जब रखा जाता है यदि वो नमाज पढना जानता हो उसके बाद उसका मजहब और जाति देखी जाती है। भौतिक हो या रसायन विज्ञानं हर जगह इस्लामिक शिक्षा इस कदर घुसेड दी गयी है कि कोई बच्चा ना चाहते हुए भी उसका सामना इस्लामिक शिक्षा से हुए बगेर नही रह सकता। वो आगे लिखते है कि पाकिस्तान की दसवीं जमात की फिजिक्स की किताबों में इस कदर बिना मतलब के सवाल भर रखे है कि पता ही नहीं चलता ये भोतिक विज्ञानं है या कोई रूहानी किताब? जैसे दसवी कक्षा की किताबों में लिखा है कि दोखज का क्षेत्रफल कितना है? नमाज के शबाब की गणना यानि के केल्कुलेट कैसे करे? यही नहीं नोवी कक्षा की फिजिक्स की किताब में पूछा है कि जिन और शैतान का वजूद क्या है, क्या इनसे बिजली पैदा की जा सकती है? दसवी जमात की बायोलोजी की किताब में लिखा है कि जब वसल्लम साहब पर बही नाजिल हुई तो उसे जन्नत के मुताबिक क्या कहा गया? किताब में आगे एक प्रश्न पूछा गया कि इस्लामी तामील हासिल करना मर्दों का एक फर्ज एक बुनयादी उसूल है, सही या गलत?  ऐसी न जाने कितनी रूहानी बातों से पाकिस्तान के पाठ्यक्रम भरे पड़े है।

बात यही खत्म नहीं होती पाकिस्तान के पंजाब टेक्स्ट बोर्ड में भी इसी तरह की नफरत फैलाने वाली शिक्षा है। मसलन हर एक अध्याय में हिन्दू व् अन्य धर्म पर कटाक्ष लिखा है. परवेज आगे पूछते है पाकिस्तान का बच्चा इन पुस्तकों को पढ़कर क्या बनेगा कोई बता सकता है? अपनी मजहबी सनक के कारण पाकिस्तान के हुक्मरान अपने बच्चों अपने देश के भविष्य को अंधकार में भेज रहे है, अंधकार से निकले ये मजहबी लोग मंदिर चर्च और गुरूद्वारे तोड़ रहे है।

लेख-राजीव चौधरी

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