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प्रयाग राज कुम्भ में आर्य समाज

भारत देश आध्यात्मिक देश है धर्म की थाती है और अनेकों पन्थो मतो का उदगम स्थल भी है। आध्यात्म का ज्ञान यहाँ से प्रसारित हुआ साथ ही अनेकों महापुरुषों ने इसी धराधाम पर जन्म भी लिया। यहाँ कई उत्सव, त्यौहार मनाए जाते हैं तो साथ ही धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन बहुत ही भव्य व आस्था के साथ मनाए जाते हैं। कुंभ मेला भी इन्ही आयोजनों में से एक है, इसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इस बार 2019 में कुंभ मेले का आयोजन प्रयागराज में किया जा रहा है। प्रयागराज में अर्धकुंभ 15 जनवरी 2019 से प्रारंभ हो जाएगा और 04 मार्च 2019 तक चलेगा।

कुम्भ का पर्व एक महान अवसर हैं सम्पूर्ण देश के साथ विदेशों से करोड़ों व्यक्तियों का धार्मिक भावना से एकत्र होना अपने आप में हिन्दू संस्कृति के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि हैं। यह एक ऐसा आयोजन होता है जिसमें करोड़ों श्रद्धालु, जिज्ञासु, संत, महात्मा विद्वान और तपस्वी गण भाग लेते है। भला देश के अन्दर एक विशाल भू-भाग पर इतना बड़ा आयोजन हो और आर्य समाज की भूमिका न हो यह कैसे संभव हो सकता है। किन्तु इससे भी बड़ा सवाल यह है कि इस महान आयोजन का आध्यात्मिक लाभ आर्य समाज किस तरह लोगों तक पहुंचा सकता है। मन में इसी सवाल के साथ सैंकड़ों वर्ष पूर्व महर्षि दयानन्द सरस्वती ने हरिद्वार कुम्भ मेले में पाखण्ड खंडिनी पताका फहराकर हजारों व्यक्तियों तक वैदिक विचारधारा को पहुँचाया था।

भले ही पौराणिक कहानियों में कुम्भ के आयोजन को लेकर अनेकों कथाएं प्रचलित हो जिनमें से सर्वाधिक मान्य कथा देव-दानवों द्वारा समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत कुंभ से अमृत बूँदें गिरने को लेकर है, किन्तु यह सिर्फ एक प्रचलित कथा हैं। असल में भारत ज्ञान की भूमि थी और कुम्भ जैसे आयोजन करने का उद्देश्य हमारे पूर्व विद्वानों का यह था कि ऐसे आयोजन में विचारों का मंथन करके ज्ञान का अमृत निकाला जाये। इसमें विश्व भर के विद्वान अपने ज्ञान, तर्क मान्य एवं अमान्य विषयों पर विचारों का मंथन किया करते थे। अंत में जो सत्य होता उसे मान्यता प्रदान करते और उस सत्य को अमृत समझ जीवन में उतारते।

इस महान व्यवस्था और आयोजन को समय के साथ कलंकित सा होना पड़ा जब पौराणिक कथाओं को सत्य मानकर अनेकों ढोंगियों, बाबाओं के वेश में जादू दिखाकर इसे अपनी धार्मिक शक्ति बताकर अंधविश्वास को प्रोत्साहित कर कुम्भ जैसे महान अवसर को सिर्फ गंगा स्नान और पूजा प्रार्थना तक सिमित कर दिया। इससे उनका व्यक्तिगत लाभ पता नहीं कितना हुआ पर आमजन सनातन वैदिक धर्म के सत्य स्वरूप से दूर होता चला गया।

जब स्वामी जी यह सब देखा तो उनका मन द्रवित हो गया गुरु से धर्म प्रचार की प्रतिज्ञा करके निकले स्वामी दयानन्द जी ने विचार किया कि छोटे-छोटे स्थानों में पांच-सात लोगों को समझाने से बेहतर है कि एक जगह इकठ्ठा हुए सभी विद्वानों संतों से धर्म चर्चा करके विचारों का मंथन करके क्यों न उन्हें वैदिक धर्म के सत्य स्वरूप का अमृत पिलाया जाये ताकि देश भर में एक ही बार में वैदिक सिद्धांतो की चर्चा फैल जाये। इस विचार से समाज को सत्य का सन्देश देने हेतु 1866 में जब स्वामी जी हरिद्वार कुम्भ में पहुंचे तो अपार भीड़ साधुओं के विशाल अखाड़ों को देखा तो उनका साहस टूटने लगा। किन्तु उनकी अंतरात्मा ने आवाज दी कि साहस मत तोड़ सब कार्य पूर्ण होगा क्या एक अकेला सूर्य संसार के सभी अंधकार को दूर नहीं कर देता?

आवाज सुनते ही उस दिव्य आत्मा ने अपने निवास स्थान के आगे एक झंडे पर पाखण्ड खंडिनी पताका लिखकर दिया, पाखंडों, अंधविश्वासों अवतारों श्राद्ध आदि पर जब स्वामी जी ने बोलना आरम्भ किया उस धार्मिक जन समुदाय में एक प्रकार की हलचल मच गयी अनेकों लोग धर्म की सच्चाई के सम्बन्ध में विचार करने लगे। अकेले स्वामी जी का यह प्रताप था कि सत्य ने असत्य को और ज्ञान ने अज्ञानता को हिलाकर रख दिया था।

स्वामी के निर्वाण के बाद इस कार्य को आर्य समाज के महानुभावों ने समय-समय पर संचालित रखा और इसे गति देने का कार्य किया. पंडित लेखराम जी, स्वामी श्रद्धानन्द ने ऐसे अवसर पर ही हरिद्वार में पाखण्ड-खण्डिनी पताका गाड़ कर अपने महान् और विशाल मिशन की विजय-दुंदुभि बजाई थी। वर्तमान समय में धर्म-कर्म और ईश्वर के नाम पर भटक कर अशांत जीवन जी रहे है या फिर ढोंगियों के चंगुल में फंसकर धन आदि की हानि करते नजर आ रहे है। यही एक ऐसा अवसर है जब हम अपनी प्राचीन वैदिक संस्कृति, वैदिक धर्म के सन्देश और हमारे विद्वान वैज्ञानिक ऋषियों की विचारधारा को करोड़ों के बीच प्रसारित कर सकते है। क्योंकि आज भी सत्य ज्ञान के आभाव में अंधविश्वास, पाखण्ड कुरीतियाँ और तरह-तरह के धर्म और भगवान उत्पन्न होते जा रहे है।

इसलिए इस अवसर पर सत्य ज्ञान एवं वैदिक विचारधारा को प्रवाहित करने हेतू पुन: प्रयागराज कुम्भ में वैदिक विद्वान् सन्यासी, विदुषी आचार्य, गुरुकुल के विद्यार्थियों समेत आमंत्रित किया गया है. इसके साथ ही देश विदेश से आर्यजनों की उपस्थिति में कार्यक्रम स्थल पर वैदिक साहित्य एवं सामग्री हेतु भव्य स्टाल सुन्दर आकर्षक यज्ञशाला एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रस्तुत कर ओ३म ध्वज और पाखंड खंडिनी पताका को फहराया जायेगा।.. लेख-विनय आर्य

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