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विजया दशमी (आश्विन सुदि दशमी)

हुआ प्रकृति का निर्मल जीवन, स्वच्छ गम्य सब पन्थ गए बन।
विमल व्योम में छिटके तारे, मुद्रित हुए है जिग्मिषु  सारे।।
-श्री गिरधरशर्मा  ‘नवरत्न’

विजयार्थी विजयार्थ चले है, व्यापारी भी चल निकले हैं।
विजया दशमी दुन्दुभि बाजी, नरपतियों से सेना साजी।।
क्षात्र-तेज से वीर भरे है, वे उत्साह शक्ति प्रेरे हैं। – श्री सिद्ध गोपाल काव्यतीर्थ, कविरत्न

जगतीतल में भारतवर्ष  ही एक ऐसा भूखण्ड है जहां वर्षा की ऋतु अन्य ऋतुओं से पृथक होती है अन्य देशों में शीत (जाड़ा ) और उष्ण (गरमी) दो ऋतुएं (मौसम) होती हैं। उन में ही समय-समय पर वर्षा भी होती रहती हैं किन्तु भारत में जाड़ा गरमी और बरसात के तीन मौसम वर्ष  के चार-चार मास रहते हैं। वर्षा  के चातुर्मास्य (चैमासा) में वर्षा का इतना प्राचुर्य रहता है कि उस में बंगाल आदि कई देशों  मे तो जल थल एक हो जाता है। भारत के अन्य प्रान्तों की नदियां भी बाढ़ से उमड़ पड़ती है। ताल-तलैया जल से परिपूर्ण हो जाते है। आने-जाने के सारे मार्ग कीचड़ और जलसे भरे रहते हैं। चार मास तक शकट (गाड़ी-तांगों) आदि वाहनों का यातायात प्रायः रूका रहता है। किसान अपनी गाड़ी तांगों को उड़ेल (पृथक-पृथक करके) रख देते हैं। प्राचीन भारत में तो, जब यहां  सड़को वा राजमार्गो की बहुतायात न थी, वर्षाकाल में यात्राएं बिलकुल ही बन्द रहती थीं। राजन्यवर्ग की  विजय यात्रा और वैश्यों  की व्यापार यात्रा वर्षा  के चातुर्मास्य में रूकी रहती थी। वर्षा  के अवसान पर जब शरद ऋतु  का प्रवेश  होता था तो इन अवरुद्ध यात्राओं का पुनः प्रारम्भ होता था।
अब नदियों को गाध (उथला) करती हुई और मार्ग के कीचड़ो को सुखाती हुई, शरदऋतु  का पदार्पण हो गया है। जलाशयों में कुमुदिनियां (कुई) खिल रही हैं। निर्वष्ट (बरसे) हुए हल्के मेघ सूर्य के मार्ग में से हट गए हैं, इसलिए उस का प्रताप चारों दिशाओ में फैलने लगा है। शरदऋतु की साम्राज्ञी कुमुदिनी के छत्र और कांस के चमर से शोभा पा रही है। स्वच्छ चांदनी आंखो को अतीव आनन्द देती है। स्थल पर हंसो की पंक्तियों, आकाश  में ताराओं और जलाशयों में कुमुदिनियों पर श्व़ेतता छाई हुई है। ईखे बढ़ कर लम्बी और सघन हो गई है और उन के खेतों की छाया में मेढ़ो पर बैठे हुए गोपालबाल मधुर गीत गा रहे हैं। अगस्त्य नामक तारे के उदय होते ही जलाशय स्वच्छ हो गए है। गाड़ियों  के बैल वर्षा  भर छूटे रह कर और यथेष्ट घास चर कर खूब तैयार हो गए है। उन के ठांठ मोटे होकर बड़े सुन्दर प्रतीत होते है। वे आनन्द से उन्मत होकर खोरू खोद रहे हैं-वप्रक्रीड़ा कर रहे हैं। सींगो से नदियों की ढांगो को ढ़ा रहे हैं। शारद (सप्तपर्ण) वृक्ष के पुष्प खिल रहे हैं और उन मे हाथी के मद की सी गन्ध आ रही है। चारों ओर शरत्- श्री विराज रही है। ऐसे समय मे ही, इन दिनों ही- दिग्विजय-यात्रा और व्यापार-यात्रा के पुनः प्रारम्भ की तैयारियां होती है। विजयादशमी उत्सव का ससमारोह समारम्भ होता है। बरसात में जंग लगे हुए योद्धाओं के खड्गादि शस्त्र और कवच संघर्षण द्वारा (सेकल करके) स्वच्छ और शाणित  किये जाते हैं, जिन की चमक आंखो में चकाचैंध उत्पन्न करती है। अश्वों और हाथियों की सज्जा सामग्री (वल्गा=लगाम, इयाण=पलाग) आभूषण और होदे संस्कार और सुधार किया जाता है। चतुरंगिणी सेनाएं  सुसज्जित की जाती है।

वैश्यों (कृषकों और व्यापारियों) के चार मास से उड़ले पड़े हुए शकटादि वाहन धावन (धोने और पौंछने) और तले मर्दनादि द्वारा बांध जोड़कर यात्रायोग्य सन्नद्ध किये जाते हैं । तथा व्यापारियों की दुकानों पर लेखनी मसिपात्र आदि लेखन उपकरण स्वच्छ किये जाते हैं, और नये बहीखाते और बस्ते बदले जाते हैं। संक्षेपतः प्रत्येक व्यवसायी अपने उपकरणों का परिमार्जन और सन्नहन (Equipping) करता है। इन सारे कार्यो की तैयारी आश्विन शुदि प्रतिपदा से आरम्भ करके आश्विन शुदि विजया दशमी तक पूरी हो जाती है। इस लघु लेखक को स्मरण है कि उस की बाल्यावस्था में उस के पिता के यहां विजया दशमी से एक सप्ताह पूर्व से शस्त्रों के सैकल का कार्य होता रहता था।

विजया दशमी के दिन यज्ञशाला के द्वार देश में सुसज्जित, सशस्त्र, चतुरंगिणी (अश्व, हाथी, रथ तथा पदाति) को क्रमबद्ध खड़ा करके उनकी नीराजना विधि (आरती) की जाती है। नीराजना विधि में स्वस्ति और शान्तिवाचन पूर्वक बृहत्होम यज्ञ होता है, जिस में क्षात्र धर्म के वर्णनपरक मन्त्रों से विशेष आहुतियां दी जाती हैं।

वैश्यवर्ण वा अन्य व्यवसायी भी इसी प्रकार अपने व्यवसाय के वाहन आदि उपकरणों को सुसज्जित और परिमार्जित रूप में यज्ञशालाओं में क्रमबद्ध  उपस्थित करके नीराजना का अनुष्टान  करते थे।यह कृत्य  पूर्वाह्न  में होता था। सांयकाल के समय राजन्य गण अपनी सज्जित सेना सहित सजधज के विजय-यात्रा का नियम बद्ध  उपक्रम करते थे। वैश्य  भी अपने वाहनों में बैठकर इसी प्रकार व्यापार यात्रा का   प्रारम्भ सूचक अनुष्टान करते थे। विजयादशमी के दिन से दिग्विजय यात्रा और व्यापार-यात्रा निर्बाध चल पड़ती  थी। इसी प्राचीन दिग्विजय-यात्राओं के स्मारक रूप में अवशेष आज तक सांयकाल के समय  ग्राम-सीमोल्लंघन यात्रा रूप से भारत के महराष्ट्र  आदि अनेक प्रान्तों में प्रचलित है।

इस अवसर पर प्रजाएं अपने प्रभुओं की सेवा से रोकड़ा रूपये के रूप में उपायन (भेंट) प्रस्तुत  करती थीं और वे भी उन को बहुमूल्य उपहार और पारितोषिकों से पुरस्कृत  करते थे।

जन साधारण में इस समय परस्पर एक-दूसरे के गृह  पर जाकर मिलने-भेंटने की प्रथा का भी प्रचार था। इस से जहां वर्ष  भर के मिथो मनोमालिन्य वा मनमुटाव को मेटना अभिप्रेत था। वहां दीर्घयात्रा पर जाने से पूर्व वयस्कों, सम्बन्धियों और सन्मित्रों का अन्तिम साक्षात्कार भी उद्दिष्ट  था।

प्राचीन काल में विजया दशमी का युद्ध स्वरूप इतना ही प्रतीत होता है। पीछे से इस पर्व के आनन्दावसर पर श्री रामचन्द्र के भव्याभिनय वा रम्य रामलीला के प्रदर्शन का प्रचार चल पड़ा और जिस ने कालान्तर मे विकृत रूप धारण किया।

दीर्घकाल से विजया दशमी के पर्व पर रामलीला के रचे जाने के कारण जनता में यह मिथ्या  धारणा बद्ध मूल हो गई  है कि विजया दशमी के दिन मर्यादा पुरषोत्तम  सूर्यवंशावतंस श्रीरामचन्द्र ने  राक्षसराज रावण का वध करके लंका पर विजय प्राप्त की थी। वाल्मीकि रामायण के अवलोकन से इस चिरकालीन कल्पना का नितान्त निराकरण होता है। उपर्युक्त ग्रन्थ के अनुसार श्री पण्डित हरिमंगल मिश्र  एम. ए. कृत  ‘प्राचीन भारत’ के परिशिष्ट  में जो रामचरित की घटनाओं की तिथियों की दो जन्त्रियां दी गईहै। उन से रावणवध की तिथियां क्रमश: वैशाख कृष्ण चतुर्दशी और उक्त ग्रन्थ में ही उद्धृत पं. महादेव प्रसाद त्रिपाठी कृत ‘भक्तिविलास’ के आधार पर फाल्गुन शुदि एकादशी गुरूवार ज्ञात होती हैं। श्री पण्डित हरिशंकर जी दीक्षित अपनी त्यौहार-पद्धति में इस विषय में इस प्रकार लिखते हैं कि रामायण का कथन इस विश्वास का विरोध करता है। वाल्मीकि रामायण में यह स्पष्ट  लिखा है कि आज के दिन महाराजा रामचन्द्र ने पम्पापुर से लंका की ओर प्रस्थान किया और चैत्र को अमावस्या को रावण का वध कहा गया है। इस से यह स्पष्ट  विदित होता है कि श्री महाराजा रामचन्द्र की विजय तिथि चैत्र कृष्णा अमावस है। आश्विन शुक्ला दशमी को श्री महाराज रामचन्द्र का विजय दिन मनाना वाल्मीकि रामायण से तो सिद्ध होता नहीं और न गोस्वामी तुलसीदास कृत रामायण से यह सिद्ध  होता है कि यह दशमी श्री रामचन्द्र जी की विजय तिथि हैं। भाषा  की रामायण से भी यह विदित होता है कि वर्षा ऋतु  के चार मास पर्यन्त रामचन्द्र जी का निवास पम्पापुर  ही में रहा। वर्षाऋतु के बीतने पर श्री हनुमान जी सीता देवी की  खोज में गए है। इसके पश्चात्  ही श्री रामचन्द्र जी का जाना विदित होता है। अतएव जनता का यह विश्वास  है कि श्री रामचन्द्र जी ने अश्विन शुक्ला दशमी को रावण का वध किया है, निर्मूल प्रतीत होता है।‘

उपर्युक्त अवतरणों से पूर्ण-प्रमाणित होता है कि कम से कम विजया दशमी रावण-वध और लंका-विजय की तिथि नहीं है।

विजय दशमी

विजया दशमी का पर्व आर्यो का एक पवित्र पर्व है क्योंकि इसी शुभ दिन मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने विजय यात्रा प्रारम्भ की थी और कुछ समय मे ही लंकापति रावण का वध कर असंख्य प्राणियों को उसके अत्याचारों से मुक्त किया था। राम की यह विजय धर्म की अधर्म पर अपूर्व विजय थी। राम ने रावण का राज्य छीनने के लिए लंका पर चढ़ाई नही की थी और न लंका की प्रजा को दास बनाकर उसका दोहन शोषण करने के लिए ही, अपितु आर्य परम्परा के अनुसार अत्याचार के उन्मूलन और धर्म की प्रतिष्टा के लिए की थी। उन्होनें अपनी विजय से सच्चे वीर का आदर्श उपस्थित करके आर्य प्रथानुमोदित क्षत्रिय धर्म की महिमा उपस्थित करके आर्य प्रथानुमोदित क्षत्रिय धर्म की महिमा का भव्य दिग्दर्शन कराया था। यूरोप और अमेरिका के वर्तमान युद्ध देवता  इस आदर्श को जितना शीघ्र अपनाकर क्रिया में लायें उतना ही विश्व शन्ति के लिए श्रेयस्कर है।

मर्यादा पुरूषोत्तम राम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए अयोध्या या मिथिला से सैनिक सहायता प्राप्त न की थी। उन्होंने स्वयम् अपने बल पर युद्ध किया था। विजयादशमी का दिन उस दिन का स्मरण कराता है, जब आर्य जाति का जाति-सुलभ तेज मौजूद था। जब वह अत्याचार के उन्मूलन और पीडि़तो के रक्षण के लिए शक्तिशाली अत्याचारी के मुकाबले में संगठनात्मक प्रतिभा के बल पर जंगली जातियों को ला खड़ा करना जानती थी। भगवान् राम का हम सत्कार करते है, क्योंकि उन्होनें आर्यजाति की मर्यादा के अनुरूप नेतृत्व और शौर्य प्रदर्शित किया और विश्वास की भावना को गौरवान्वित किया था।

राम हमारे पूज्य है, इसलिए नहीं कि वे भगवान् के अवतार थे। वे दुनिया को मन चाहा नाच नचा सकते थे। उन के नाम का जाप करने मात्र से मनुष्य भवसागर से तर जाता है। वह सूर्य को पश्चिम में उदय कर सकते थे। मुर्दे को जिला सकते थे। समुद्र को सुखा और सूर्य-चन्द्र को पृथ्वी पर उतार सकते थे इत्यादि इत्यादि। हम उन की पूजा इसलिए करते हें कि वे आदर्श पुरूष थे और आर्य संस्कृति के मूर्तिमान् प्रतीक थे।

इटली के पन्द्रहवी शताब्दी के कूटनीतिज्ञ मेकावेली ने अपने देश के सीजर बोर्जिया को आदर्श पुरूष बताया और अपनी संसार प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजा’ में तत्कालीन यूरोपीय शासको को उस का अनुकरण करने का परामर्श दिया।

इस के कई शताब्दियों बाद एक जर्मन दार्शनिक का जन्म हुआ जिस का नाम निट्शे था। इस ने भी सीजर बोर्जिया को आदर्श पुरुष माना और आशा प्रकट की कि जर्मन युवक उसके अनुरूप होगा। निट्शे ने नेपोलियन को भी संसार का आदर्श पुरूष बताया और कहा कि संसार में वही जाति अन्य जातियों के ऊपर शासन कर सकेगी जिस के युवकों में इन दोनों पुरूषों के गुण विद्यमान होंगे।

सीजर बोर्जिया और नैपोलियन में आकाश, पाताल का अन्तर हैं। नैपोलियन के प्रतिभावान योद्धा होने में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता, पर सीजर बोर्जिया अपने समय का सब से अधिक घृणित और पतित व्यक्ति था। उस ने अपने भाई को मरवा दिया था। एक महिला का सतीत्व नष्ट किया था और अपनी माता के अपमान का बदला लेने के लिए निर्दोष स्विस जनता को तलवार के घाट उतार दिया था। वह विष की उपयोगिता में विश्वाश रखता था और अपने शत्रुओं पर विजय पाने की चिन्ता में उचित और अनुचित का ध्यान रखना आवश्यक न समझता था। उस की तुलना अरबिस्तान के हसन बिन सब्बाह से की जा सकती है। जिस ने शत्रु से छुटकारा पाने के मामले में छुरे के उपयोग को धर्मोदेश कीर पवित्रता प्रदान की थी।

मेकावेली और निट्शे किसी व्यक्ति के आदर्श वा देवापम होने के लिए उस में जिन गुणों की उपस्थिति आवश्यक समझते थे, उन में भौतिक बल, कूटनीतिज्ञ, साम्राज्य लोलुपता और नृशंसता को विशेष रूप से महत्व दिया गया था। मैकावली स्वयं कूटनीतिज्ञ था, इसलिए उसे सीजन बोर्जिया को चरित्र विशेष रूप से रूचा। निट्शे का प्रादुर्भाव तब हुआ जब फ्रेडरिक महान् और उस के कृपण पिता के द्वारा प्रशिया में सैनिकवाद का प्रतिपादन हो चुका था। निट्शे को प्रूशियन सैनिक के कायदे कानून की पाबन्दी और निर्दयता विशेष रूप से रूचिकर लगी। और आशा प्रकट की कि संसार का भविष्य  प्रूशियन सैनिक के हाथ मे है। परन्तु चूंकि वह उसे पूर्णरूपेण देवोपम पुरूश के रूप में देखना चाहता था, इसलिए उस ने सीजन का मित्रघात करने को मनोवृति और नैतिक चरित्रहीनता को भी अपनाने की सलाह दी।

यह कहना आवश्यक है कि दूसरे महासमर के जर्मन नेताओं के कार्यकलाप विचार-बिन्दू पर निट्शे की गहरी छाप लगी हुई थी। परन्तु मैकावली ने यूरोप के शासकवर्ग को सीजर बोर्जिया के जिन गुणों को अपनाने की सलाह दी थी और निट्शे ने पू्शियन सैनिक को उस के जिन गुणों के कारण संसार का भावी शासक पूर्ण वा देवापम पुरूष समझा जाता था, वे गुण कहीं अधिक विकसित मात्रा में एशियायी विजेताओं में या मंगोल और तुर्क सैनिकों में विद्यमान थे।

आर्य संस्कृति के देवापम पुरूष की विभावना इन मध्य एषियायी इटालियन या प्रुशियन विभावनाओं से बिलकुल भिन्न प्रकार की रही है। सीजर बोर्जिया ने अपने पिता का अनुराग स्वयम् अपनाये रहने की इच्छा से अपने भाई की हत्या करवा दी। भरत ने राज्य मिलने पर भी उसे तिरस्कारपूर्वक ठुकरा दिया और भाई का अनुगामी रहकर ही सन्तोष किया। नेपोलियन ने रूस के तत्कालीन जार एलेक्जेण्डर से चिरकालीन मित्रता की सन्धि की (जिस प्रकार हिटलर ने स्टोलिन से अमर सन्धि की थी) और अवसर  पाते ही मित्र के साथ विश्वासघात किया। राम ने एक बहुत कमजोर आदमी का पक्ष ग्रहण किया और अन्त तक उस का साथ निभाया। औरंगजेब ने अपने पिता को कैद में डाला और भाइयों को मरवा दिया। ठीक उसी तरह जिस जिस तरह उनके पिता ने राज्य प्राप्ति के लिए अपने भाइयों को मरवाया था। राम ने अपने दुर्बल, शक्तिहीन और स्त्रैण पिता की आज्ञा का सहर्ष पालन किया और अपने भाई भरत के विरूद्ध षडयन्त्र करने के गन्दे विचार को भी मन में न आने दिया।

संसार का देवापम पुरुष होने के लिए किसी व्यक्ति के भीतर किस प्रकार के गुणों का उपस्थिति आवश्यक है? उन गुणों की जो उस की बर्बर प्रवृति को क्रीडा करने का अवसर देते हैं या उन गुणों की  जो व्यक्ति की सदवृति को विकसित करके समाज के नित्य और निर्धारित नियमों का पालन करने और उन में विकास करने की प्रेरणा देते है? सीजन ईसाई था, नेपोलियन भी ईसाई था। मूसा के दस आदेश वाक्य प्रत्येक ईसाई को उस समय भी मान्य थे जैसे आज मान्य हैं, परन्तु मेकावेली और निट्शे के आदर्श पुरूषों ने इन सभी आदेश वाक्यों के विरूद्ध आचरण किया। भारतीय समाज में भी नियम उपनियम समाज के सृजन के आरम्भकाल से चले आ रहे हैं। हम राम को परम श्रद्धा की दृष्टी से देखते है, क्योंकि उन्होनें उन नियमों का साधारण व्यक्ति की भांति पालन किया। उसी प्रकार हम बाली और रावण को घृणा और तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, क्योंकि उन में से एक ने अपने भाई की स्त्री पर अधिकार करके और दूसरे ने समाज की रक्षा करने के स्थान उल्लंघन किया। इस प्रकार जहां मेकावेली और निट्शे के दृष्टिकोण से बाली और रावण ही देवापम पुरूश सिद्ध होंगे। हमारी संस्कृति हमें ऐसे व्यक्तियों को समाज का शत्रु और ऐसे व्यक्तियों से समाज को मुक्त करने वाले व्यक्तियों को उस का रक्षक या पिता कहना सिखलाती है।

राम को आर्य संस्कृति की विशिष्ट देन कहने में जरा भी अत्युक्ति नहीं हैं। जहां आर्य संस्कृति में मानवी विकास को प्राधान्य दिया गया है, वहां अर्द्ध विकसित एशियायी और यूरोपीय समाज में भौतिक विकास और पुरुषबल को ही अपना आदर्श समझ गया है। यही कारण है कि अनेक तूफानों और बवंडरो की भयंकर चपेटों में से गुजरने के बाद भी आर्य संस्कृति आज जीवित है। कोई जाति तभी तक जीवित रह सकती है जब तक वह मानवी विकास के प्राकृतिक कार्यकलाप में योग देती रहे। इतिहास बताता है की जिन जातिओं ने हत्या, व्यभिचार और मक्कारों को त्यागकर आगे बढ़ने से इंकार किया और इन्हीं को अपनी उन्नति और तुष्टि का साधन समझा वे नष्ट हो गई।

आर्य संस्कृति के प्रतीक राम को हम नमस्कार करते हैं। हम पूज्य सीता के अज्ञात चरणों में भी अपनी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करते हैं, क्योंकि वे अपने आचरण की आर्य ललनाओं के चरित्र पर अमिट छाप छोड़ गई हैं। उन का पातिव्रत्य और त्याग आर्य ललना को अपना सारा जीवन ही त्यागमय बनाने को प्रोत्साहित करता आ रहा है। लक्ष्मण का संयम और भरत का भ्रातृप्रेम अब भी हम में चरित्रबल उत्पन्न करते और स्फूर्ति प्रदान करते हैं।

हमारा आदर्श पुरुष से सर्वथा भिन्न है। हमारा आदर्श पुरुष मानव-समाज के लिए मंगल, निस्पृहता और शान्ति का सन्देश लेकर आता है। हमें भगवान् राम का वह चित्र प्रिय लगता है जिस में वह अपने भाई और पत्नी के साथ नंगे शरीर वन की खाक छान रहे होते हैं। उन्हे वह चित्र अच्छा लगता है जिस में सीजर ने विष द्वारा किसी शत्रु को समाप्त किया हो या नैपोलियन किसी नगर पर तोप के गोलों की वर्षा कर रहा हो या प्रूशियन सैनिक आकाश की और टांगे फैकता हुआ आगे बढ़ रहा हो। यही अन्तर है और इसी अन्तर में हमारी जाति के अमरत्व का रहस्य छिपा हुआ है।

-रघुनाथप्रसाद पाठक

विजया दशमी के दिन अपराजिता देवी के पूजन की उद्भावना भी पौराणिक काल में ही हुई थी। इस का स्रोत स्यात् सरस्वती की वाग्देवी की आकृति के समान कविकल्पना-प्रसूता अपरोजय वा विजया की अपराजिता नाम्री देवी के रूप की मूर्ति की कल्पना में विद्यमान हो, क्योंकि पौराणिक षोंडशोपचार पूजा का सूत्रपात कविकल्पित रूपकों से ही हुआ। अपराजिता का अपभ्रंश पायता प्रतीत होता है जो विजया दशमी का नामान्तर प्रसिद्ध है। भारत के अज्ञानान्धकार काल में इस अपराजिता देवी ने चण्डी तथा कालिका आदि के अनेक नामों और रूपों से इतना प्राबल्य पाया कि उन की पूजा ने विजयादशमी के वास्तविक स्वरूप नीराजना विधि को बिल्कुल ढांप लिया और इस कपोल-कल्पित महाभंयकर कालिका चण्डी की रक्तपिपासा इतनी बढ़ी कि उस की मूर्ति के सामने इस पवित्र अवसर पर पुरूष से लेकर भैंसो और बकरो तक असंख्य प्राणियों की बलि होने लगी। विजया दशमी के दिन राजपूताने और महाराष्ट्र की भूमि निरपराध पशुओं के रक्त से लाला हो जाती थी। सन्तोश का विषय है कि दया धर्म के प्रचारकों के उद्योग से अब यह जघन्य अत्याचार कुछ रजवाड़ो और स्थानों में बंद हो गया है परन्तु आर्यधर्म के सेवकों के सामने अभी बहुत कुछ कार्य पूरा करने को शेष है। आर्य पुरूषो का परम कर्तव्य है कि वे संसार से विविध अत्याचारों का लोप करके विजया दशमी आदि पर्वो के शुद्ध और सनातनस्वरूप का जनता मे पुनः प्रचार करें और भारत के प्राचीन इतिहास का भी शोध करके वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं की शुद्ध तिथियों का जनसाधारण में प्रचारित करें। तभी वे अपने वैदिक धर्मावलम्बी आर्य नाम को सार्थक कर सकते हैं।

पद्धति

उसमें क्षात्र धर्म के द्योतक और यात्रा के लाभ के सूचक निम्नलिखित मन्त्रो से विशेष आहुतियों दो जायें।

ओ३म संशितं म इदं ब्रहा संशितं वीर्यं१ बलम्।
संशितं क्षत्रमजरमस्तु जिष्णुर्येषामस्मि पुरोहितः स्वाहा ।। १ ।।

समहमेंषा राष्ट्रं श्यामि समोजो वीर्यं१ बलम्।
वृश्चामि शत्रूणां बाहूननेन हविषाहम् स्वाहा ।।२।।

नोचैः पद्यन्तामधरे भवन्तु ये नः सूरिं मघवानं पृतन्यान्।
क्षिणामि ब्रह्मणामित्रानुन्नयामि स्वानहम् स्वाहा ।।३।।

तीक्ष्णीयांसः परशोरग्नेस्तीक्ष्णतरा उत।
इन्द्रस्य वज्रात्तीक्ष्णीयांसो येषामस्मि पुरोहितः स्वाहा ।।४।।

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