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श्रद्धा से प्रगति व मुक्ति

लेख प्रस्तुति कर्ता – आचार्य नवीन केवली  Girl-with-Arms-Raised

जीवन में किसी भी कार्य को,किसी भी क्रिया-व्यवहार को,किसी भी सम्बन्ध को उत्कृष्ट बनाना चाहते हैं अथवा हम जिस किसी क्षेत्र में भी यदि सफलता को या अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते हैं तो अवश्य ही उस व्यक्ति के प्रति,उस सम्बन्ध के प्रति,उस वस्तु के प्रति, उस विषय के प्रति या उस लक्ष्य के प्रति अपने मन में श्रद्धा को अन्तर्भावित कर लेना चाहिए, अपने हृदय में स्थापित कर लेना चाहिए। यह एक ऐसा साधन है जो कि एक सामान्य स्तर के व्यक्ति को भी आदर्श व महान् बना देता है।
शास्त्रों में श्रद्धा की बहुत ही महिमा कही गयी है। श्रद्धा का सामान्य सा अर्थ यह है कि सत्य को धारण करना। वेद में कहा कि – ‘दृष्ट्वा रुपे व्याकरोत्  सत्यानृते प्रजापतिः। अश्रद्धामनृतेऽदधाच्छ्रद्धां सत्ये प्रजापतिः’।(यजु.19.77)  अर्थात् ईश्वर ने सत्य और असत्य दोनों को पृथक-पृथक देख कर झूठ में अश्रद्धा को धारण कराया और श्रद्धा को सत्य में स्थापित किया। योग दर्शन के भाष्य में ऋषि ने कहा है कि ‘श्रद्धा चेतसः सम्प्रसादः’ अर्थात् मन की सम्यक प्रसन्नता ही श्रद्धा है।
किसी के प्रति आदर-सत्कार,मान-सम्मान,रूचि-प्रेम,समर्पण-निष्ठा तथा आज्ञापालन की भावना, अपने मन में बनाये रखना श्रद्धा कहलाती है । जब हम किसी के प्रति इस प्रकार की भावना रखते हैं तो स्वाभाविक है कि उसकी बातों को ध्यान से सुनते हैं,उसके आदेशों का ठीक-ठीक पालन करने का प्रयत्न करते हैं,उसको आदर्श मानकर उसके व्यवहारों के अनुरूप भी अपना व्यवहार करने का प्रयास करते हैं । यदि हम किसी उत्तम गुरु को अथवा उत्तम व्यक्ति को अपना आदर्श बना लेते हैं तब तो अपना कल्याण हो जाता है लेकिन इसके विपरित यदि हमारा चुनाव ठीक न हो और किसी गलत-व्यक्ति,गलत-समाज,गलत-परम्परा,गलत-सिद्धान्त,गलत-शास्त्र, या गलत-गुरु आदि को हम अपना आदर्श बना लेते हैं तो वहाँ उन्नति के स्थान पर हमारा पतन सुनिश्चित हो जाता है क्योंकि हमने सत्य के स्थान पर असत्य को धारण कर लिया अर्थात् श्रद्धा की जगह अश्रद्धा हो गयी।
     अधिकतर तो यही होता है कि हमें सच्चा शास्त्र,सच्चा गुरु या सच्चा सिद्धान्त मिलना ही कठीन हो जाता है और यदि बड़े सौभाग्य से,पुण्य कर्माशय के प्रताप से,ईश्वर की कृपा से,अत्यन्त घोर तपस्या के फल स्वरुप अथवा किसी प्रकार के संयोग से हमें कोई सच्चा गुरु,शास्त्र या सिद्धान्त आदि मिल भी जाएँ तो उनके प्रति हमारा विश्वास ही नहीं बन पाता,हम उनमें श्रद्धा ही उत्पन्न नहीं कर पाते जिसके कारण उनसे होने वाले लाभों से वंचित रह जाते हैं । अतः हमारा कर्त्तव्य यह है कि सबसे पहले तो हम सच्चा गुरु अथवा शास्त्र का परीक्षण पूर्वक चयन कर लें,फिर उनके प्रति सर्वात्मना समर्पण के साथ सच्ची श्रद्धा भाव रखें तभी हमारा वास्तविक कल्याण सम्भव है। जिसके अन्दर श्रद्धा होती है उसकी उन्नति में माता-पिता,गुरु,मित्र तो क्या सारी दुनिया ही एकजुट हो जाती है। चाहे वो श्रीराम हों चाहे श्रीकृष्ण, चाहे वह गुरुदत्त विद्यार्थी हो चाहे स्वामी श्रद्धानन्द या फिर स्वामी दयानन्द ,वह चाहे एकलव्य हो चाहे अर्जुन हो या फिर कर्ण सभी महान व्यक्तित्व के पीछे श्रद्धा ही एक अदृश्य रीढ़ की हड्डी है।चाहे माता-पिता कि सेवा में स्वयं को समर्पित करने वाले ऋषि श्रवणकुमार हो, चाहे गुरु के आज्ञाकारी शिष्य आरुणि हो, इन जैसों को ऋषित्त्व प्राप्त कराने में भी श्रद्धा का ही योगदान रहा है। योग दर्शन के भाष्य में महर्षि व्यास जी ने कहा है कि – ‘यद्यपि ही तत्तत् शास्त्रानुमानाचार्योपदेशैरवगतमर्थतत्वं सद्भुतमेव भवति एतेषां यथाभूतार्थप्रतिपादनसामर्थ्यात्, तथापि यावदेकदेशोऽपि कश्चिन्न स्वकरणसंवेद्यो भवति, तावत्सर्वं परोक्षमिवापवर्गादिषु सूक्ष्मेषु अर्थेषु न दृढां बुद्धिमुत्पादयति तस्माद् शास्त्रानुमानाचार्योपदेशोपद्वलनार्थमेव  कश्चित् अर्थविशेषः प्रत्यक्षीकर्तव्यः एकदेशप्रत्यक्षत्वे सति सर्वं सूक्ष्मविषयमापवर्गाच्छ्रद्धीयते। तथा च सति श्रद्धावीर्यस्मृतिसमधयोऽस्याप्रतिबन्धेन भविष्यन्तीति’। अर्थात् वैदिक शास्त्रों वा आर्ष ग्रन्थों में जो बातें बताई गयी हैं, अनुमान प्रमाण से जिन बातों का ज्ञान होता है अथवा सदगुरुओं के उपदेश से जो हम जानते हैं वे सब बातें सत्य ही होती हैं क्योंकि उनमें यथार्थता को प्रतिपादन करने का सामर्थ्य होता है। परन्तु हम सामान्य-जनों को इन सब सूक्ष्म बातों में विश्वास ही नहीं होता जब तक कि हम उनके किसी एक भी उपदेश को सत्य सिद्ध होता हुआ न देख लें। इसीलिए उनकी पुष्टि के लिए हमें किसी भी एक विषय का स्वयं प्रत्यक्ष करके देख लेना चाहिए। जब हम एक भी बात को प्रत्यक्ष करके देख लेते हैं कि यह सत्य है तो उपदिष्ट अन्य बातों के ऊपर भी विश्वास हो जाता है। सूक्ष्म से सूक्ष्म ईश्वर, पुनर्जन्म, मोक्ष आदि अदृष्ट विषयों में भी विश्वास होने लग जाता है। इन सब विषयों में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है।श्रद्धा के होने से उत्साह बढ़ता है और उस व्यक्ति को तीव्र स्मृति शक्ति की भी प्राप्ति होती है तथा बिना व्यवधान के उसे समाधि की प्राप्ति हो जाती है। ‘श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्’ (योग.-1.20) यहाँ सामान्य स्तर वाले योगाभ्यासियों के लिए निर्देश है जो कि विभिन्न प्रकार के उपायों को करते हुए समाधि तक पहुंचना चाहते हैं, उनके लिए श्रद्धा एक प्रमुख साधन है। इस प्रकार श्रद्धा से ही व्यक्ति उन्नति के शिखर को भी स्पर्श कर लेता है। शास्त्र में कहा भी है कि ‘श्रद्धावान् लभते ज्ञानं’अर्थात् श्रद्धालु व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त कर पाता है और ‘ज्ञानान्मुक्ति’ अर्थात् ज्ञान से ही मुक्ति होती है इसका तात्पर्य यह है कि श्रद्धा से ही व्यक्ति मोक्ष को भी प्राप्त कर सकता है।
सामवेद में कहा है कि – ‘श्रद्धा माता मनुः कविः’ (साम -90 ) अर्थात् श्रद्धा मेरी माता है। माता के समान योगाभ्यासी का कल्याण करने वाली श्रद्धा ही होती है इसीलिए ऋषि व्यास जी ने भी कहा कि – ‘सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति’। यह श्रद्धा पहला ही पड़ाव है समाधि तक पहुँचने के लिए। और भी श्रद्धा की महिमा वेद में गाई गयी है। ‘श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हूयते हविः’ (ऋ.-10.151.1) श्रद्धा के साथ ही अग्नि प्रदीप्त की जाती है और श्रद्धा से ही यज्ञ में आहुति दी जाती है अर्थात् प्रत्येक उत्तम कर्मों में हमारी श्रद्धा होनी चाहिए। ‘श्रद्धां प्रातर्हवामहे श्रद्धां….श्रद्धे श्रद्धापयेह नः’ (ऋ.-10.151.5) अर्थात् हे श्रद्धा! हम सबको जीवन में दिन भर के व्यवहारों में सदा श्रद्धा से ही युक्त कर दो। तैतेरीय उपनिषद् में कहा कि – ‘श्रद्धया देयम्’ अर्थात् हम कुछ भी दान करें तो श्रद्धा पूर्वक ही करें और वेद में भी कहा है कि – ‘प्रियं श्रद्धे ददतः प्रियं श्रद्धे दिदासतः(ऋ.10.151.2)  अर्थात् श्रद्धायुक्त हो कर देने वाले का कल्याण हो और देने कि इच्छा से युक्त व्यक्ति का भी कल्याण हो, श्रद्धायुक्त हो कर भोजन करने-कराने वालों का भी प्रिय हो और यज्ञ करने-कराने वालों का भी प्रिय या भला हो। इसीलिए यदि हम अपना भला चाहते हैं, कल्याण चाहते हैं, उन्नति-प्रगति वा सफलता चाहते हैं तो अवश्य ही श्रद्धा देवी को धारण करना चाहिए,और इसका ध्यान रखें कि श्रद्धा के स्थान पर अश्रद्धा या अन्धश्रद्धा के वशीभूत न हो जाएँ ।

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