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हनुमानादि बन्दर नहीं थे…

मित्रो ! आज वीर ब्रह्मचारी हनुमान की जयंती है I परंतु उनके विषय मे अनेक भ्रांतियाँ प्रचलित है जिसके वजह से लोग उनके वास्तविक स्वरूप को ही भूल गयेI

हनुमानादि बन्दर नहीं थे…

वानर-वने भवं वानम्, (रा आदाने) गृह्णाति ददाति वा। वानं वन सम्बन्धिनं फलादिकं गृह्णाति ददाति वा-जो वन में उत्पन्न होने वाले फलादि खाता है वह वानर कहलाता है। वत्र्तमान में जंगलो व पहाड़ो में रहने और वहाँ पैदा होने वाले पदार्थो पर निर्वाह करने वाले ‘गिरिजन’ कहाते हैं। इसी प्रकार वनवासी और वानप्रस्त वानर वर्ग में गिने जा सकते हैं। वानर शब्द से किसी योनि विशेष, जाति, प्रजाति अथवा उपजाति का बोध नहीं होता।
जिसके द्वारा जाति एवं जाति के चिन्ह्नोें को प्रकट किया जाता है, वह आकृति है। प्राणिदेह के अवयवों की नियत रचना जाति का चिन्ह्न होती है। सुग्रीव, बालि आदि के जो चित्र देखने में आते हैं उनमें उनके पूँछ लगी दिखाई जाती है, परन्तु उनकी स्त्रियों के पूँछ नहीं होती। नर-मादा में इस प्रकार का भेद अन्य किसी वर्ग में देखने में नहीं आता। इसलिए पूँछ के कारण हनुमान आदि को बन्दर नहीं माना जा सकता।
हनुमान से रामचन्द्र जी की पहली बार भेंट ऋष्यमूक पर्वत पर हुई थी।
दोनों में परस्पर बातचीत के बाद रामचन्द्र जी लक्ष्मण से बोले-

नानृग्वेदविनीतस्य नायजुर्वेदधारिणः।
नासामवेदविदुषः शक्यमेदं प्रभाषितुम्।।
नूनं व्याकरणं कृत्समनेन बहुधा श्रुतम्।
बहुव्याहरतानेन न कििचदप्रशब्दितम्।।
सस्कारससंपन्नामद्रु तामविलम्बिताम्।
उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयहारिणीम्।।
कि0 3/28, 29, 32

ऋग्वेद के अध्ययन से अनभिज्ञ और यजुर्वेद का जिसकी बोध नहीं है तथा जिसने सामवेद का अध्ययन नहीं किया है, वह व्यक्ति इस प्रकार परिष्कृत बातें नहीं कर सकता। निश्चय ही इन्होंने सम्पूर्ण व्याकरण का अनेक बार अभ्यास किया है, क्योंकि इतने समय तक बोलने में इन्होंने किसी भी अशुद्ध शब्द का उच्चारण नहीं किया है। संस्कारसंपन्न, शास्त्रीय पद्धति से उच्चारण की हुई इनकी कल्याणी वाणी हृदय को हर्षित कर रही है।
वस्तुतः हनुमान अनेक भाषाविद् थे। वह अवसर के अनुकूल भाषा का व्यवहार करते थे, इसका संकेत हमें सुन्दर काण्ड में मिलता है। लंका में पहुंच कर हनुमान ने सीता को अशोक वाटिका में राक्षसियों के बीच बैठे देखा। वृक्षों की शाखाओं के बीच छुपकर बैठे हनुमान सोचने लगे-

यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम्।
रावणं मन्यमाना मां सीता मीता भविष्यति।।
सेयमालोक्य मे पं जानकी भाषितं तथा।
रक्षोमिस्त्रासिता पूर्व भूपस्त्रासं गमिष्यति।।
ततो जातपरित्रासा शब्दं कुर्यान्मनिस्विनी।
जानाना मां विशालाक्षी रावणं कामपिणम्।।
सुन्दर 30/18, 20

यदि द्विजाति (ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य) के समान परिमार्जित संस्कृत भाषा का प्रयोग कँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भय से सवस्त हो जाएगी। मेरे इस वनवासी प को देखकर तथा नागरिक संस्कृत को सुनकर पहले ही राक्षसों से डरी हुई यह सीता और भयभीत हो जाएगी। मुझको कामपी रावण समझ कर भयातुर विशालाक्षी सीता कोलाहल आरम्भ कर देगी। इसलिए-

अहं त्वतितनुश्चैव वानरश्च विशेषतः।
वाचं चोदहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम्।। 17

मैं सामान्य नागरिक के समान परिमार्जित भाषा का प्रयोग कँगा।
इससे प्रतीत होता है कि लंका की सामान्य भाषा संस्कृत थी, जबकि जन-साधारण संस्कृत से भिन्न, किन्तु तत्सम अथवा तद्भव, शब्दों का व्यवहार करते थे। कुछ टीकाकारों के अनुसार हनुमान ने अयोध्या के आस-पास की भाषा से काम लिया था।
बालिपुत्र अंगद के विषय में बाल्मीकि ने लिखा है-

बुद्धया ह्मष्टायायुक्तं चतुर्बलसमन्वितम्।
चतुर्दशगुणं मेरे हनुमान् बालिनः सुतम्।। कि0 54/2
हनुमान् बालिपुत्र अंगद को अष्टा बुद्धि से संपन्न, चार प्रकार के बल से युक्त और राजनीति के चैदह गुणों से युक्त मानते थे।

अष्टांग बुद्धि-
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारण तथा।
ऊपापोहार्थ विज्ञान तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः।।
सुनने की इच्छा, सुनना, सुनकर धारण करना, ऊहापोह करना, अर्थ या तात्पर्य को ठीक-ठीक समझना, विज्ञान व तत्त्वज्ञान-बुद्धि के ये आठ अंग है।
चतुर्बल-साम, दाम, भेद, दण्ड। शत्रु को वश में करने के लिए नीति-शास्त्र में चार उपाय बताए गए हैं, उन्हीं को यहाँ चार प्रकार का बल कहा गया है। किन्ही-किन्ही के मत से बाहुबल, मनोबल, उपाय और बन्धुबल-ये चार बल है।

चतुर्दश गुण-
देशकालज्ञता दाढ्र्यं, सर्वक्लशसहिष्णुता,
सर्वविज्ञानता दाक्ष्यमूर्जंः संवृत्तमन्त्रता।
अविसंवादिता शीयॅ भक्तिज्ञत्वं कृतज्ञता,
शरणागतवात्सल्यममर्षित्वमचापलम्।।

1. देशकाल का ज्ञान, 2. दृढ़ता, 3. कष्टसहिष्णुता, 4. सर्वविज्ञानता, 5. दक्षता, 6. उत्साह, 7. मन्त्रगुप्ति, 8. एकवाक्यता, 9. शूरता, 10. भक्तिज्ञान, 11. कृतज्ञता, 12. शरणागतवत्सलता, 13. अमषित्व्अधर्म के प्रति क्रोध और 14. अचपलतागम्भीरता।
और बालि की पत्नी एवं अंगद की माता तारा को बाल्मीकि ने ‘मन्त्रवित्’ बताया है (कि0 16/12)। मरते समय बालि ने तारा की योग्यता का बखान करते हुए सुग्रीव को परामर्श दिया-

सुषेणदुहिया वेयमर्थंसूक्ष्मविनिश्चये।
औत्पातिके व विविधे सवंतः परिनिष्ठिता।।
यदेषा साध्विति ब्रूयात् कार्य तन्मुक्तसंशयम्।
न हि तारामत किंचिदन्था परिवर्तते।।
कि0 23/13-14
सुषण (जिनकी चिकिप्सा से मृतप्राय लक्ष्मण जीवित हो गए थे-संजीवनी वाले वैद्य) की पुत्री यह तारा सूक्ष्म विषयों के निर्णय करने तथा नाना प्रकार के उत्पातों के चिन्ह्नोें को समझने में सर्वथा निपुण है। जिस कार्य को यह अच्छा बताए, उसे निःसंग होकर करना। तारा की किसी सम्मति का परिणाम अन्यथा नहीं होता।
बालि की अन्त्येष्टि के समय सुग्रवी ने आज्ञा दी-”औध्र्वदेहिकमार्यस्य क्रियतामनुकूलतः“ (कि0 25/30)-मेरे ज्येष्ठ बन्धु आर्य का संस्कार राजकीय नियम के अनुसार शास्त्रानुकूल किया आए।

तदनन्तर सुग्रीव के राजतिलक के समय सोलह सुन्दर ‘कन्याएँ’ अक्षत, अंगराज, गोरोचन, मधु, घृत आदि लेकर आई और वेदी पर प्रज्वलित अग्नि में-”मन्त्रपूतेन हविषा हुत्वा मन्त्रविदोजनः“ (26/10) मन्त्रोच्चारणपूर्वक हविष्म के द्वारा मन्त्रविद् विद्वानों ने हवन किया।
इस सारे वर्णन और विवरण को बुद्धिपूर्वक पढ़ने के बाद कौन मान सकता है कि हनुमान् और तारा आदि मनुष्य न होकर पेड़ों पर उछल-कूद मचाने वाले बन्दर-बन्दरिया थे?

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