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अटल बिहारी और आर्य समाज

आर्य समाज के आंगन में पले बढे किसी महानुभाव के प्राण जब महायात्रा पर निकलते है तब कवि की कुछ पंक्ति जेहन में ताजा हो उठती है कि-
कलम आज उनकी जय बोल.
जो जला अस्थियाँ बारी-बारी,
छिटकाई जिनने चिनगारी,
जो चढ़ गए पुण्य वेदी पर,
लिए बिना गरदन का मोल.
कलम आज उनकी जय बोल.
जो अगणित लघु दीप हमारे,
तूफानों में एक किनारे,
जल-जलकर बुझ गए किसी दिन,
माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल
कलम आज उनकी जय बोल.
बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी, देश के पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न कवि और राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी जिन्होंने अपने सार्वजनिक राजनितिक जीवन में कई बड़ी चुनौतियों का सामना किया. भारतीय राजनीति के मंच पर विशालकाय व्यक्तित्व के रूप में छाये रहे. देश के 72 वें स्वतंत्रता दिवस के अगले दिन देश की इस आजादी के सिपाही के प्राण अपने 93 वर्ष पुरे करने के पश्चात महायात्रा पर निकल गये. ये एक अपूर्ण क्षति है जिसे शतकों तक पूर्ण करना कठिन होगा.
25 दिसम्बर 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में माता कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था. एक कवि घर जन्म लेने वाले इस नन्हे बच्चें के जीवन को कितने लोग जानते है कि इस दीपक से क्रांति की मशाल किसने बनाया? माना कि डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में अटल जी ने राजनीति का पाठ पढ़ा. पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का कार्य भी कुशलता पूर्वक करते रहे लेकिन अन्तस् में वह पीड़ा कहाँ से आई जो उन्हें इस देश और समाज के लिए मर मिटने के लिए मजबूर कर उठी?

अटल जी जब अपने बचपन में थे तब इनके पिताजी स्व कृष्ण बिहारी उंगली पकड़कर उन्हें आर्य समाज के वार्षिकोत्सव में ले जाते थे. धीरे-धीरे आर्य विद्वानों के उपदेश अटल जी को प्रभावित करने लगे. भजनों और उपदेशो के साथ स्वतंत्रता संग्राम की बातें भी उन्हें सुनने को मिलने लगीं. तत्कालीन आर्य उस समय देश वासियों की विचारधारा नहीं बल्कि समूचे राष्ट्र की सत्ता तक बदलने के लिए आमादा था बस यही वो विचार थे जो एक सामान्य से बच्चें अटल को पुरुष से महापुरुष बनने तक खींच लाये. प्रारम्भिक शिक्षा के उपरांत अटल जी दयानंद एंग्लो-वेदिक कॉलेज, कानपुर गये जहां वाजपेयी को उच्च शिक्षा मिली राजनीति विज्ञान में परास्नातक डिग्री ली जब वह छात्र थे तो तब आर्य समाज देश की तंत्रिका का केंद्र था.

आर्य समाज स्वामी दयानन्द जी द्वारा स्थापित विचारों को जब अटल जी ने आत्मसात किया तो हिन्दू राष्ट्रवाद की प्रतिबद्धता की भावना उनके मन में जगी और जल्द ही ग्वालियर में आर्य समाज की एक युवा शाखा आर्य कुमार सभा के महासचिव नियुक्त हो गये. इसलिए वाजपेयी जी की असली पहचान का आकलन करने के लिए आर्य समाज में अपने वैचारिक पालन-पोषण को भी ध्यान में रखना चाहिए इस बात को बाजपेयी जी स्वयं स्वीकार करते हुए कहते थे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से तो मेरा प्रथम संपर्क 1939 में हुआ और वह भी आर्य समाज की युवा शाखा, आर्य कुमार सभा के माध्यम से उन दिनों ग्वालियर रियासत थी, जो किसी भी प्रांत का हिस्सा नहीं थी. एक कट्टर सनातनी परिवार से होने के बाद भी मैं आर्य कुमार सभा के साप्ताहिक सत्संग में सम्मिलित हुआ करता था, जोकि प्रति रविवार को प्रातः काल हुआ करता था. एक दिन आर्य कुमार सभा के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता और महान विचारक व कुशल संगठक श्री भूदेव शास्त्री ने अटल जी से पूछा, आप शाम को क्या करते हैं?

अटल जी ने कहा, कुछ नहीं इस पर उन्होंने उन्हें संघ की शाखा में जाने का आग्रह किया और इस प्रकार ग्वालियर में उनका शाखा जाने का क्रम प्रारंभ हुआ. यही उनका आरएसएस के साथ पहला परिचय था. किन्तु संघ के पेड़ पर लगने वाला यह वटवृक्ष बहुत पहले पौधे के रूप में आर्य समाज की क्यारी में ही देशभक्ति के गीतों और विचारों से सींचा गया था. वाजपेयी जी हिंदू जीवन और कुप्रथाओं और रूढ़िवादी विचारों को तोड़ने के लिए आर्य समाज के बहुत ऋणी रहे. अटल जी का मानना था कि देश की बंटी हुई राजनीति को जोड़ने की आवश्यकता है. यह केवल सत्ता के लिए ही नहीं, बल्कि विघटनकारी शक्तियों से लोहा लेकर राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने के लिए भी जरूरी है.
आर्य समाज के पालने में, पला बढे अटल जी जीवन के उच्च आदर्शों को स्थापित करते हुए आगे बढ़ते चले गये, देश के शीर्ष पद तक जा पहुंचे अटल जी से जब आर्य समाज के बारे में पूछा गया तब उन्होंने कहा था कि अगर आर्यसमाज न होता तो भारत की क्या दशा हुई होती इसकी कल्पना करना भी भयावह है. आर्यसमाज का जिस समय काम शुरु हुआ था कांग्रेस का कहीँ पता ही नही था. स्वराज्य का प्रथम उद्धोष महर्षि दयानन्द ने ही किया था यह आर्यसमाज ही था जिसने भारतीय समाज की पटरी से उतरी गाड़ी को फिर से पटरी पर लाने का कार्य किया. अगर आर्यसमाज न होता तो भारत-भारत न होता. अटल जी विचारों को इस उत्तुंग शिखर पर ले जाने में आर्य समाज का जो योगदान रहा वह कभी भुलाया नहीं जा सकता इस कारण लेख के अंत मैं दावे के साथ कह सकता हूँ अगर आर्य समाज ना होता तो अटल बिहारी बाजपेई जी भी अटल बिहारी बाजपेई जी न होते….
लेख-राजीव चौधरी

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