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पतन होते वैवाहिक संबंध: ये चिंतन आज जरुरी है !!

हाल ही में तलाक की याचिका पर सुनवाई करने के दौरान केरल उच्च न्यायालय बढ़ते वैवाहिक संबंध विच्छेद (तलाक) पर चिंता व्यक्त की है। उच्च न्यायालय ने कहा कि आज कल वैवाहिक संबंध उपयोग करो और फेंक दो यूज एंड थ्रो की कल्चर से प्रभावित लग रहा है। न्यायालय ने कहा कि लिव-इन संबंधों में वृद्धि और तलाक का विकल्प चुनने की प्रचलित प्रवृत्ति इसका स्पष्ट प्रमाण है। साथ ही उच्च न्यायालय ने भी कहा हिया कि युवा पीढ़ी स्पष्ट रूप से विवाह को एक बुराई के रूप में देखती है।

वि-वाह विवाह अर्थात सनातन परम्पराओं में इसका सामाजिक, सांस्कृतिक और पारम्परिक रूप शाब्दिक अर्थ होता है विशेष रूप से उत्तरदायित्व वहन करना, विवाह को पाणिग्रहण भी कहा जाता है। इसका भी शब्दिक अर्थ यही कि हाथ को स्वीकार करना। आसान भाषा में कहें अपनी जिम्मेदारी निभाना और ये जिम्मेदारी पति और पत्नी दोनों मिलकर वहन करते है। यानि विवाह भारतीय समाज में परम्परा के रूप एक महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सा रहा है। बल्कि ये कहिये कि विवाह एक जन्म का नहीं बल्कि सात जन्मों का पवित्र बंधन भी माना जाता रहा है। साथ ही विवाह एक नवयुवक एवं एक नवयुवती के साथ रहने जीने आगे बढ़ने का संबध ही नहीं बल्कि यह दो परिवारों के बीच बहुमूल्य सम्बन्ध भी स्थापित करता चला आ रहा हैं।

किन्तु आज की भागती दौडती जिन्दगी की तेज रफ्तार में यह रिश्ता बेहद कमजोर होता जा रहा है। यदि आंकड़ों पर नजर डाले तो इसके टूटने की संख्या पश्चिम के देशों मुकाबले कुछ कम रह गयी हैं। यह भी कह सकते है कि आज के आधुनिक समय में विवाह का महत्व दिन पर दिन कम होता जा रहा हैं। यदि गंभीरता से इस विषय पर चर्चा की जाये तो यह एक ऐसी समस्या का बनती जा रही है जो आने वाले समय में समाज औरपरिवारों की तबाही का बड़ा कारण बनेगी। क्योंकि दिन पर दिन आपसी संबध एक वैचारिक परमाणु विस्फोट का शिकार हो रहे है। आज हो ये रहा है कि इस आधुनिक सदी में एक तो नौजवान युवक-युवती विवाह के लिए आसानी से तैयार नहीं हो रहे और जो हो रहे है उनमें से अधिकांश के जल्द ही वैवाहिक संबध विच्छेद (तलाक) के मामले कोर्ट में खड़े मिल रहे हैं।

जबकि सामाजिक व्यवस्था में शादी अथवा विवाह बंधन का महत्वपूर्ण स्थान है। पश्चिमी देशों से लिव इन परंपरा का अनुसरण भारत के मेट्रो शहरों में तो लंबे समय से प्रारंभ हो गया था किंतु यह स्थिति कमोबेश हर राज्य में वर्तमान में हो चुकी है। तेजी से बढ़ रही तलाक दर, युवा पीढ़ी में विवाह के प्रति अरुचि और लिव इन रिलेशन के प्रति रुझान चिंताजनक है जो सामाजिक ताने-बाने समाप्त कर एक पारिवारिक अराजकता का माहौल उत्पन्न करने का संकेत दे रहे हैं। एक रिसर्च में सामने आया है कि तलाक के कारण मुख्यतः नगरीकरण, आधुनिकीकरण, मोबाइल, इंटरनेट, ससुराल पक्ष का व्यवहार व बढ़ता मतभेद, वैचारिक तालमेल का न मिलना कानूनों का दुरुपयोग इत्यादि सामने आया है। दहेज प्रताड़ना (धारा 498) के केस लगने के बाद परिवार फिर से जुड़ पाना बहुत ज्यादा मुश्किल हो जा रहा है।

दूसरा जहाँ तेजी से बदलते समय में आज कई चीजें बदली वहां कुछ सामाजिक प्रतिष्ठा के रूप भी बदल गये हैं। मसलन कुछ समय पहले तक लडकें-लड़कियां मां-बाप की इच्छा के अनुसार विवाह करके घर गृहस्थी बसाकर संतुष्ट हो जाया करते थे। लेकिन आज ऐसा बहुत कम देखनें को मिल रहा हैं। बदलते इस दौर की बात करें तो स्वतंत्रता के साथ लड़कियों को अपने न सिर्फ पंख मिले, बल्कि उन पंखों को फैलाने के लिए आसमान भी मिला। ऐसे में शादी करके घर बसाने के कथन में बदलाव आ गया। अब सामाजिक रूप से स्थापित होने का मतलब शादी करके बच्चे पैदा करना नहीं रह गया, बल्कि एक अच्छी नौकरी,व्यवसाय या आर्थिक संपन्नता से हो गया हैं।

इसी विषय को यदि पलटकर लड़कों के मामले में देखें तो अधिकांश लड़के भी इससे बचने की कोशिश करते हुए लिव इन रिलेशनशिप जैसे रिश्तों को प्राथमिकता दे रहे है। दिन पर दिन दहेज के बढ़ते झूठे सच्चें मुकदमों ने कानून का किसी एक पक्ष में ज्यादा झुकना और दूसरे पक्ष को इसके खतरनाक नुकसान झेलने देना भी शादी का चलन घटने का बड़ा कारण है। ऐसा कतई नहीं है कि विवाह की संस्था खोखली हो गयी है और समाज को इससे किनारा करने की जरूरत है। नहीं बल्कि यह जो कमी हो रही है आज इसमें सुधार करने की जरूरत हैं। आज जब किसी युवा से शादी के बारे में चर्चा की जाती है तो वह नकारत्मक भाव प्रकट करते हैं यानि वह इस पवित्र संस्था को एक गुलामी जिन्दगी बताकर इससे बचने का प्रयास करते हैं।

आज से 10 वर्ष पहले हुई शादी और पिछले दो से तीन वर्षों में हुई शादियों में काफी अंतर देखने को मिलता है। मसलन दस वर्ष माता-पिता और परिवारों की सहमति से हुई शादियाँ जिनमें लड़का-लड़की, दो परिवार, रिश्तेदारों के साथ जितने सैकड़ों-हजार परिवार शामिल होते थे। सभी एक तरह से इसके साक्षी बन जाते थे। ऐसे में जब कभी इस रिश्ते में कुछ समस्या उत्पन्न होती थी तो पूरा परिवार और समाज इसे बचाने की कोशिश में जुट जाता था। किन्तु प्रेम विवाह या कुछ समय में एक दूसरे से आकर्षित होकर की गयी शादियाँ जल्द टूट रही हैं।

तीसरा जो सामाजिक प्रतिष्ठा का भय जो हमेशा रिश्ता बचाने में मदद करता था, आज वह पूरी तरह से गायब होता जा रहा हैं। अगर अभी वर्तमान समय की बात किया जाए, तो अगर सामने वाला लड़का हो या लड़की अगर किसी से प्रेम कर लेता है, फिर वह विवाह के बंधन मे बंधने के बाद जरा सी बात पर रिश्ता तोड़ देते हैं। पिछले दिनों में ऐसे कई रिश्ते देखें एक लड़की के तलाक का कारण सिर्फ इतना था कि शादी के बाद लड़के ने उसके मुंह पर थप्पड़ मार दिया था। लड़की ने यह बात बर्दास्त नहीं की और तलाक की अर्जी डाल दी।

पिछले दिनों ऐसी बड़ी संख्या में न्यूज़ सामने आई कि वैवाहिक जोड़े ने सिर्फ इस बात पर संबध समाप्त किया (तलाक) लिया कि पत्नी देर रात तक सोशल मीडिया फेसबुक आदि पर अपने मित्रों से चेट किया करती थी। यानि आजकल के लोगों की धारणा संकीर्ण विचारधारा जैसी हो गई है, क्योंकि उन्हें आपसी स्नेह, प्रेम क्या होता है, विवाह क्या होता है और इसकी पवित्रता क्या होती है मानों  बारे में यह अभी तक अनभिज्ञ है। पहले के समय और आज के समय में यही अंतर है कि पहले के लोग विवाह को एक पवित्र रिश्ता मानकर हर सुख- दुख,उतार- चढ़ाव मैं साथ चल कर अपने रिश्ते को एक मंजिल तक पहुंचाते थे। परंतु आजकल के विवाह में अगर थोड़ा भी एक दूसरे को रोक- टोक किया या एक दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति ना कर पाए तो फिर यह रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता, और तलाक की नौबत आ जाती है। इसीलिए  आजकल की युवा पीढ़ी द्वारा विवाह को मजाक बनाया जा रहा है, एहसास और रिश्ता अब पूर्ण रूप से समाप्ति की ओर जा रहा है। अगर समय रहते बच्चों विवाह शब्द और रिश्ते का महत्व या उत्तरदायित्व नहीं समझाया गया तो आने वाले समय यह एक बहुत बड़े सांस्कृतिक पतन के रूप में देखने को मिलेगा।

विनय आर्य (महामंत्री)

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