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संगीत विज्ञान और वेद

प्रायः सामान्य बोलचाल की भाषा में संगीत कहने से लोग केवल गायन को ही समझते हैं परन्तु संगीत की भाषा में यदि देखें तो गायन, वादन व नृत्य तीनों के समुह को संगीत कहते हैं। संगीत वो ललित कला है जिसमें स्वर और लय के द्वारा हम अपने भावों को प्रकट करते हैं। कला की श्रेणी में ५ ललित कलायें आती हैं- संगीत, कविता, चित्रकला, मूर्तिकला और वास्तुकला। इन ललित कलाओं में संगीत को सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
वेद के विषय में कहा जाता है कि – यह समस्त ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है ।
आईये आज हम विचार करते हैं कि संगीत विद्या के विषय में वेदों में क्या निर्देश प्राप्त हो सकते हैं ? संगीत का विशेष सम्बन्ध वेदों में सामवेद से ही है । सामवेद को संगीत प्रधान कहा जाता है । सामन् का अर्थ होता है गीति, गान अथवा संगीत, अर्थात् मन्त्रों का सस्वर पाठ करना ही सामन् है । बृहदारण्यक उपनिषद् में भी कहा है कि सामवेद का सार तो स्वर ही है ।
यजुर्वेद में एकत्र ही कहा है कि “स्वरश्च मे श्लोकश्च मे” स्वर अर्थात् संगीत और श्लोक अर्थात् कवित्व का युग्म होता है । संगीत की दृष्टि से सामवेद का दो भागों में विभाजन है – पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक ।

नारदीय शिक्षा में गान विद्या से सम्बद्ध कुछ उपयोगी तथ्य दिए गए हैं । जैसे कि – सातों स्वरों के नाम तथा संकेत इस प्रकार हैं – १. षड्ज (स), २. ऋषभ (रे), गांधार (ग), मध्यम (म), पञ्चम (प), धैवत (ध), निषाद (नि)।
महर्षि पतंजलि जी ने महाभाष्य में सामवेद को “सहस्रवर्त्मा सामवेद:” अर्थात् एक सहस्र मार्ग वाला कहा है । सामवेद में भी कहा है कि “गाये सहस्रवर्तनि” इस मन्त्र में कहा गया है कि मैं गायत्री, त्रिष्टुप और जगती छन्द वाले मन्त्रों को सहस्र प्रकार से गाता हूँ ।

यजुर्वेद में संकेत है कि – “गीताय शैलूषम्” अर्थात् गायन विद्या या संगीत से आजीविका चलानेवाले को शैलूष कहा गया है । वीणावादक के लिए “महसे वीणावादम्” कहा है अर्थात् वीणा बजानेवाले को वीणावाद कहा जाता है जो कि अत्यन्त शुभ माना जाता था और किसी विशेष अवसरों पर बजाया जाता था । इस प्रकार वेणु (मुरली) बजनेवाले, हाथों से ढोल, तबला आदि बजानेवाले के विषय में भी वेद में संकेत दिए गए हैं ।

इससे ज्ञात होता है कि सामवेद में ही नहीं किन्तु यजुर्वेद आदि में भी संगीत विद्या का मार्गदर्शन किया गया है । सांसारिक प्रत्येक विद्या वा विज्ञान की जानकारी के लिए हमें वेद के शरण में ही जाना आवश्यक है । वास्तव में संगीत सुनते ही हमारे मन में शान्ति, सुख, प्रसन्नता आदि की प्राप्ति होती है । यदि हम उचित रूप में संगीत विज्ञान को सिखकर प्रयोग करते हैं तो स्वयं सुख-शान्ति से युक्त होने के साथ-साथ दूसरों को भी सुख-शान्ति से युक्त करने में समर्थ हो सकते हैं ।

लेख – आचार्य नवीन केवली

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